नई दिल्ली। रूस से तेल खरीदने को लेकर भारत पर दबाव बनाने वाला अमेरिका अब अपने रुख में बड़ा बदलाव दिखा रहा है। कुछ महीने पहले तक अमेरिकी प्रशासन भारत से रूस से तेल खरीद बंद करने की मांग कर रहा था और यहां तक कि दबाव बनाने के लिए 25 प्रतिशत अतिरिक्त टैरिफ लगाने की चेतावनी भी दी गई थी। लेकिन बदलते वैश्विक हालात में अब वही अमेरिका भारत की भूमिका को बेहद अहम मानने लगा है।
तेल बाजार संतुलन में भारत की बड़ी भूमिका
दरअसल पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव और वैश्विक ऊर्जा बाजार में अस्थिरता के बीच अमेरिका को अब यह समझ आ रहा है कि तेल बाजार को संतुलित रखने में भारत की बड़ी भूमिका है। भारत में अमेरिका के राजदूत सर्जियो गोर ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर कहा कि भारत वैश्विक तेल कीमतों को स्थिर बनाए रखने में एक अहम साझेदार बनकर उभरा है। उनका कहना है कि दुनिया के सबसे बड़े तेल उपभोक्ताओं और रिफाइनिंग देशों में शामिल भारत के साथ मिलकर काम करना वैश्विक बाजार की स्थिरता के लिए जरूरी है।
कच्चे तेल की कीमतों पर दबाव कम करना
इधर अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने भी हाल ही में कहा कि भारत को रूस से तेल खरीदने की जो छूट दी गई है, उसका मकसद अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों पर दबाव कम करना है। यह बयान ऐसे समय आया है जब ईरान पर अमेरिका और इजरायल की कार्रवाई के बाद वैश्विक तेल बाजार में अनिश्चितता बढ़ गई है और आपूर्ति को लेकर चिंताएं गहरा गई हैं।
तेल बाजार में इस उथल-पुथल का असर दुनिया भर के देशों पर पड़ रहा है। अमेरिका को भी चिंता है कि अगर कीमतें बहुत ज्यादा बढ़ती हैं तो उसकी नीतियों का विरोध तेज हो सकता है। इसलिए अब वह उन देशों की भूमिका को अहम मान रहा है जो वैश्विक बाजार में मांग और रिफाइनिंग के जरिए संतुलन बनाए रखते हैं।
रूस से तेल ना खरीदने का बनाया था पहले दबाव
कुछ समय पहले तक ट्रंप प्रशासन भारत पर रूस से तेल खरीद बंद करने का दबाव बना रहा था। पश्चिमी देशों के प्रतिबंधों के बाद अमेरिका चाहता था कि भारत जैसे बड़े खरीदार रूसी तेल से दूरी बना लें। इसी के तहत 25 प्रतिशत अतिरिक्त टैरिफ लगाने की चेतावनी भी दी गई थी और संभावित “नकारात्मक परिणामों” की बात कही गई थी।
हालांकि अब स्थिति बदल चुकी है। भारत में अमेरिका के पूर्व राजदूत एरिक गार्सेटी भी पहले कह चुके हैं कि भारत को रूस से तेल खरीदने की छूट इसलिए दी गई है ताकि वैश्विक तेल बाजार में कीमतें स्थिर बनी रहें। उनका मानना है कि अगर भारत जैसे बड़े खरीदार अचानक बाजार से हट जाएं तो अंतरराष्ट्रीय तेल बाजार में भारी उथल-पुथल मच सकती है।
तीसरा सबसे बड़ा तेल उपभोक्ता भारत
भारत दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा तेल उपभोक्ता देश है। देश में रोजाना करीब 55 से 56 लाख बैरल तेल की खपत होती है, जो वैश्विक खपत का लगभग 5 से 6 प्रतिशत है। ऐसे में भारत की खरीद का असर सीधे अंतरराष्ट्रीय बाजार पर पड़ता है। अगर भारत अचानक किसी बड़े स्रोत से तेल लेना बंद कर दे तो वैश्विक मांग का बड़ा हिस्सा एक साथ दूसरे सप्लायरों की तरफ मुड़ जाएगा। इससे कीमतों में तेज उछाल आ सकता है और कई देशों के सामने आपूर्ति संकट खड़ा हो सकता है।
रिफाइनिंग हब है इंडिया
भारत केवल बड़ा उपभोक्ता ही नहीं बल्कि एक बड़ा रिफाइनिंग हब भी है। यहां की रिफाइनरियां आयातित कच्चे तेल को प्रोसेस कर पेट्रोल, डीजल और अन्य पेट्रो उत्पाद बनाती हैं और एशिया व यूरोप के कई देशों को निर्यात करती हैं। इसी वजह से भारत वैश्विक ऊर्जा सप्लाई चेन का महत्वपूर्ण हिस्सा बन चुका है।
पश्चिम एशिया में बढ़ते संघर्ष और तेल आपूर्ति मार्गों पर खतरे के कारण ऊर्जा बाजार पहले से ज्यादा संवेदनशील हो गया है। ऐसे में अमेरिका भी अब समझ रहा है कि भारत की भागीदारी के बिना वैश्विक तेल बाजार को स्थिर रखना आसान नहीं है। जिस रूस से तेल खरीद को लेकर पहले भारत को चेतावनी दी जा रही थी, अब वही खरीद वैश्विक बाजार की स्थिरता के लिए जरूरी बताई जा रही है।


