दलाल बाग पर राष्ट्रसंत प.पू. सुधासागर म.सा. के सानिध्य में 4-5 अक्टू. को राष्ट्रीय स्तर पर जैन महिला अधिवेशन में आएंगी 5 हजार मातृशक्ति
देश के 97 शहरों से आने वाली महिलाएं करेंगी विभिन्न सामयिक विषयों पर विचार मंथन- 5 अक्टूबर को निकलेगा भव्य जुलूस
इंदौर वीआईपी रोड स्थित किला मैदान, दलाल बाग परिसर में निर्मित विद्या-सुधा मंडप में राष्ट्रसंत मुनिश्री सुधासागर म.सा. के सानिध्य में चल रहे चातुर्मास महोत्सव में आगामी 4-5 अक्टूबर को राष्ट्रीय स्तर पर जैन महिला अधिवेशन होगा जिसमें देश के 97 शहरों से 3800 से अधिक महिलाएं शामिल होंगी। इसे महिलाओं का महाकुम्भ नाम दिया गया है और यह देश में 31वां महिला अधिवेशन होगा। दो दिवसीय इस सम्मेलन में आने वाली मातृशक्तियों का 5 अक्टूबर को शहर में भव्य जुलूस भी निकाला जाएगा और देश के विभिन्न राज्यों की संस्कृति एवं परम्पराओं को दर्शाने वाली सांस्कृतिक प्रस्तुतियां भी होंगी। दोनों दिन महिलाओं से जुड़े विभिन्न सामयिक और ज्वलंत विषयों पर विचार मंथन होगा।
सकल दिगम्बर जैन धर्म प्रभावना समिति के तत्वावधान में आयोजित होने वाले इस अधिवेशन में देश के गुजरात, राजस्थान, महाराष्ट्र, छग एवं मध्यप्रदेश सहित चार राज्यों के 97 शहरों से 3800 महिलाओं के पंजीयन अब तक हो चुके हैं जबकि इस पूरे आयोजन में 5 हजार से अधिक महिलाओं की प्रतिभागिता होने की उम्मीद है। आयोजन से जुडी महिला मंडलों की ओर से महिला प्रकोष्ठ जैन सामाजिक संसद की अध्यक्ष साधना दगडे, रूचि गोधा एवं संगीता बाकलीवाल ने बताया कि इस महाकुम्भ में शहर के महिला मंडलों से जुडी मातृशक्ति भी शामिल होंगी और अपनी-अपनी प्रस्तुतियां भी देंगी। इस दौरान महिलाओं के लिए आकर्षक एवं अनूठी स्पर्धाएं भी होंगी तथा उत्कृष्ट प्रदर्शन करने वाले श्रेष्ठ 10 महिला मंडलों को चयनित कर उन्हें पुरस्कृत भी किया जाएगा। बाहर से आने वाली मातृशक्तियों के लिए शहर के विभिन्न स्थानों पर उनके आवास, भोजन, परिवहन आदि की अमुचित व्यवस्थाएं सकल दिगम्बर जैन धर्म प्रभावना समिति के मार्गदर्शन एवं सहयोग से की गई हैं।
धर्मसभा में प्रवचन – राष्ट्रसंत प.पू. सुधासागर म.सा. ने गुरुवार सुबह दलाल बाग पर नियमित धर्मसभा में आशीर्वचन देते हुए कहा कि आज मंदिरो में भीड़, पूजा पाठ, व्रत. स्वाध्याय और धार्मिक आयोजन हो रहे हैं लेकिन ऐसे में हमें स्वयं से प्रश्न करना चाहिए कि मैं यह धर्म किस भाव से कर रहा हूँ और सच में मैं यह धर्म कर रहा हूँ या धर्मात्मा बनने की दिशा में बढ़ रहा हूँ? केवल धार्मिक क्रियाएँ कर लेना पर्याप्त नहीं है। धर्म के पीछे हमारा भाव शुद्ध होना चाहिए। यदि हम भगवान को अपनी इच्छाओं की पूर्ति, संकट दूर करने, बीमारी से मुक्ति या अन्य किसी समस्या के समाधान का माध्यम बना लेंगे तो यह भक्ति नहीं, अपेक्षा और स्वार्थ कहलाएगा। भगवान से सौदा नहीं समर्पण होना चाहिए। सच्चा भक्त भगवान से नहीं कहता कि “मेरी इच्छा पूरी कर दीजिए” बल्कि वह तो यह भाव रखता है कि “आपकी इच्छा में मेरी इच्छा मिल जाए”।
धर्मसभा का शुभारंभ मंगलाचरण एवं पादप्रक्षालन से हुआ। देशभर से आए साधकों एवं अन्य श्रेष्ठिजनों की अगवानी चक्रवर्ती अध्यक्ष नवीन गोधा, सामाजिक संसद के अध्यक्ष आनंद गोधा, मनीष गोधा, महोत्सव अध्यक्ष अशोक डोसी, महामंत्री हर्ष जैन, सुनील भैया, प्रिंसपाल टोंग्या, संजय पाटोदी, संजय सामरिया, हुकमचंद जैन काका, गिरीश जैन गिन्नी, अक्षय कासलीवाल, रमेश जैन, धर्मेन्द्र जैन, प्रदीप ब्रह्मचारी, विनोद भैया, विजय दुर्र, सौरभ बडजात्या, राहुल सेठी एवं भूपेंद्र भोपाली सहित अनेक सहयोगी बंधुओं ने की।
राष्ट्रसंत ने कहा कि धर्म केवल दुःख, बीमारी, संकट या विपत्ति को दूर करने के लिए नहीं किया जाना चाहिए। धर्म तब सार्थक होता है जब वह व्यक्ति की आदत नहीं बल्कि उसका स्वभाव और जीवन मूल्य बन जाए। हमारी धार्मिक पहचान और जीवन पद्दति का हिस्सा धर्म ही होना चाहिए। मंदिर जाने के बाद हमें स्वयं से पूछना चाहिए कि मैं कितना बदला। प्रतिदिन स्वयं से पूछना चाहिए कि मैं मन्दिर क्यों जाता हूँ, गुरु के पास क्यों जाता हूँ, पूजा पाठ क्यों करता हूँ, धर्म से क्या चाहता हूँ और यदि मेरी इच्छा पूरी न हो तो क्या फिर भी मेरी श्रद्धा बनी रहेगी। यदि धर्म करने के बाद भी राग, द्वेष, मोह, क्रोध, लोभ बने रहें तो हमें अपने भावों की भी परीक्षा करना चाहिए। धर्म आदत नहीं आत्म जागरण का कारण बनना चाहिए।

