Eternal Hinduism

अपनी वाणी को वीणा में बदलने का प्रयास करें, यही हमारे धर्म आचरण का प्रमाण होगा – पं. शास्त्री

इंदौर। भगवान कहीं और नहीं हमारे अंतर्मन में ही विराजित है लेकिन उन्हें अनुभूत करने के लिए मन को मथना जरूरी है। जिस तरह मक्खन को मंथन के बाद घी में बदला जाता है उसी तरह मन का मंथन भी किसी न किसी रूप में हमें परमात्मा की अनुभूति कराता है। भक्ति में संपूर्णता, निष्ठा और श्रद्धा होना चाहिए। अहंकार की प्रवृत्ति मनुष्य का स्वभाव है। देव भी इस प्रवृत्ति से बच नहीं पाते हैं। बालक ध्रुव और प्रहलाद जैसी निश्छल और निःस्वार्थ भक्ति से ही भगवान प्रसन्न होंगे। भगवान ने हमें वाणी दी है, यह कई बार बेकाबू होकर बाण बन जाती है। इस वाणी को वीणा में बदलने का प्रयास करें, यही हमारे धर्म आचरण का प्रमाण होगा।

जूनी इंदौर मुक्ति धाम सेवा समिति के तत्वावधान में चल रहे भागवत ज्ञानयज्ञ में भागवताचार्य पं. श्याम सुंदर शास्त्री ने रविवार को उक्त प्रेरक विचार व्यक्त किए। कथा शुभारम्भ के पूर्व रणजीत सोनकर पहलवान, गोविंद राठी, अनिल राठोर, प्रमोद खटोड, राहुल सोनकर, रुपेश सोनगरा, मनोरमा शर्मा, सरस्वती बाई सहित अनेक भक्तों ने व्यास पीठ का पूजन किया। विद्वान वक्ता की अगवानी पवन गोयल, रामेश्वर कुमावत, हीरालाल गोयल, सुरेश राठोर, रामनिवास भराणी, अनिल राठोर एवं ओमप्रकाश राठोर सहित सैकड़ों भक्तों ने की। अनेक श्रद्धालु प्रतिदिन महामृत्युंजय मंदिर में बैठकर पूजा अर्चना भी कर रहे हैं।

मोक्ष धाम परिसर स्थित महामृत्युंजय मंदिर में पं. राजेश तिवारी एवं अन्य विद्वानों द्वारा भागवत का मूल पारायण भी किया जा रहा है। संगीतमय कथा 29 जनवरी तक प्रतिदिन दोपहर 1 से 4 बजे तक होगी। सोमवार को राष्ट्र वन्दना के पश्चात कथा प्रसंगानुसार राम एवं कृष्ण जन्मोत्सव भी मनाए जाएँगे। 30 जनवरी को मोक्ष धाम पर रखी हुई दिवंगतों की अस्थियों का शास्त्रोक्त विधि से विसर्जन कर दिया जाएगा। समिति की ओर से दिवंगतों के परिजनों से आग्रह किया गया है कि वे अपने प्रियजनों, स्वजनों की अस्थियाँ 30 जनवरी के पहले मोक्ष धाम से ले जाएँ।

पं. शास्त्री ने कहा कि हमारे आचरण में जब तक धर्म का समावेश नहीं होगा, हमारी वृत्तियां भी मुख्य लक्ष्य से भटकती रहेंगी। आचरण में धर्म का प्रवेश शुचिता और पवित्रता के साथ ही संभव है। मलीनता और मन के विकारों से मुक्ति पाने के लिए धर्म का आश्रय जरूरी है। भक्ति मन से होती है। बालक ध्रुव और प्रहलाद की तरह यदि हमने निष्काम भाव से परमात्मा को अपना लक्ष्य मान लिया तो निश्चित ही भक्ति का रंग कभी उतरेगा नहीं बल्कि नवरंग बन जाएगा।

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