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भेल के अफसरों को ‘आवारा श्वान’ से पंगा पड़ा भारी, 8 दिन तक छुट्टी लेकर खेत-खलिहानों में करते रहे तलाश

भोपाल।  शहर की एक कॉलोनी में घटी यह घटना किसी फिल्मी कहानी से कम नहीं है। एक आवारा श्वान को कॉलोनी से भगाने का फैसला इतना भारी पड़ गया कि सरकारी कंपनी के कर्मचारियों को अपनी होली और रंगपंचमी की छुट्टियां सड़कों और खेतों में उसे ढूंढते हुए बितानी पड़ीं।

अवधपुरी इलाके का मामला
राजधानी भोपाल के अवधपुरी इलाके की एक कवर्ड कॉलोनी इन दिनों इसी अजीबोगरीब मामले को लेकर चर्चा में है। यहां रहने वाले कुछ पदाधिकारियों ने कॉलोनी में घूमने वाले आवारा श्वान को हटाने का निर्णय लिया। इसी दौरान एक श्वान को भी कॉलोनी से बाहर कर दिया गया, जिसे कॉलोनी में रहने वाली एक महिला रोज खाना खिलाया करती थी। श्वान के गायब होने से नाराज महिला ने मामला बड़ा बना दिया।

महिला ने कॉलोनी के पदाधिकारियों के खिलाफ शिकायतों की झड़ी लगा दी। शिकायतें न सिर्फ भेल प्रबंधन और पुलिस आयुक्त तक पहुंचीं, बल्कि प्रधानमंत्री कार्यालय, नगर निगम और पशु अधिकारों के लिए काम करने वाले संगठनों तक भी भेज दी गईं। मामला तब और गंभीर हो गया जब पूर्व केंद्रीय मंत्री Maneka Gandhi ने भी इस मामले में हस्तक्षेप करते हुए पत्र लिख दिया।

आवार श्वान को खोजने की चली मूहिम
कॉलोनी के अध्यक्ष, सचिव और कोषाध्यक्ष सहित कई पदाधिकारी दरअसल Bharat Heavy Electricals Limited के कर्मचारी थे। शिकायतों का दबाव इतना बढ़ा कि प्रबंधन ने भी कर्मचारियों को निर्देश दे दिया कि कुतिया को खोजकर वापस कॉलोनी में लाया जाए। इसके बाद शुरू हुआ एक अनोखा ‘ऑपरेशन डॉग सर्च’।

होली और रंगपंचमी के त्योहार के बीच, जब पूरा शहर रंगों के जश्न में डूबा था, तब ये पदाधिकारी छुट्टी लेकर कुतिया की तलाश में शहर की गलियों से लेकर दूर खेतों तक भटकते रहे। सातवें दिन कुतिया एक दूरस्थ खेत में नजर आई, लेकिन पकड़ में नहीं आई।

इसके बाद शुरू हुई ‘नॉन-वेज डिप्लोमेसी’। श्वान को काबू करने के लिए पदाधिकारी बिस्कुट, ब्रेड और मछली-मुर्गे का मांस लेकर उसके पीछे-पीछे घूमते रहे, ताकि लालच देकर उसे पकड़ा जा सके।

आठ दिन में मिली सफलता
आखिरकार आठ दिन की मशक्कत के बाद पदाधिकारियों को सफलता मिली। कुतिया को सुरक्षित पकड़कर वापस कॉलोनी लाया गया। तब जाकर शिकायत करने वाली महिला का गुस्सा शांत हुआ और प्रशासनिक स्तर पर मामला ठंडा पड़ा। अब कॉलोनी में लोग दबी जुबान में यही कह रहे हैं कि कुत्तों को कॉलोनी से बाहर निकालना तो आसान था, लेकिन कानून और रसूख के जाल से निकलना उतना ही मुश्किल साबित हुआ

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