इंदौर(विनोद गोयल& भारती जोशी)। रंगपंचमी की गेर की बात आते ही टोरी कार्नर का नाम अपने आप सामने आ जाता है। कभी इंदौर की सबसे जीवंत और पारंपरिक गेर का केंद्र रहा है टोरी कार्नर इसकी ऐतिहासिक पहचान आज भी कायम है।
बुजूर्गों का रहा बड़ा योगदान
गेर संयोजक शेखर गिरी व शिव गुप्ता ने बताया कि टोरी कार्नर की गेर जब शुरू हुई तो सबसे पहले बड़े बड़े कड़ाव लगाए जाते थे जिसमें रंग का पानी भरा जाता था फिर जो सबसे बड़े बुजूर्ग होते थे वह कढ़ाव में डूबकी लगाते थे उसके बाद गेर में शामिल होने के लिए तैयार होते थे। इसी तरह सभी जो भी व्यक्ति गेर में शामिल होता था वह कढ़ाव में डूबकी लगाता था। तब ऐसा भी कहा जाता था कि जिसने लगाई डूबकी वह हुआ गेर का
साइकल में हवा भरने वाले पंप से उड़ाते थे रंग
होळकर काल में जनउत्सव के रूप राजवाड़ा पर पहले राजपरिवार के लोग नगरवासियो से रंग खेलते थे। उसके बाद टोरी कार्नर पर वर्तमान संयोजक के ताऊजी स्व. बाबुलाल जी गिरी और इनके पिता छोटो लाल जी गिरी दोनो मिल कर गेर का आयोजन करते थे। सन 1984 से शेखर गिरी ने गेर निकालने की परंपरा को अपने हाथ में लिया।
तब पिचकारियां नहीं हुआ करती थी तो साइकल में हवा भरने वाले पंप में नोजल लगा कर रंग उड़ाया जाता था जब टोरी कार्नर से गेर राजवाड़ा की और बढ़ती थी तो रास्ते के दोनों किनारों पर रहने वाले परिवार और आमजन घरों की छतों से से रंगीन पानी फैंक कर स्वागत करते थे। वह आत्मियता और आनंद होता था। जो कि लोकसंस्कृति की सच्ची अभिव्यक्ति थी। ढोल-नगाड़ों की थाप, अबीर-गुलाल की बौछार और फाग गीतों के बीच आमजन की सहभागिता इस गेर की खास पहचान थी।
आधुनिक स्वरूप की हुई गेर
समय के साथ गेर का स्वरूप बदलता गया साइकल के पंप से दवाई छिंड़ने वाले पंप फिर बैलगाडी पर ड्रम भर कर रंग फैंकने का चलन शुरू हुआ। उसके बाद टैक्ट्रर ट्राली में डीजल पंप आए फिर बोरिंग मशीन आ गई उससे रंग उड़ाने की पंरपरा शुरू हुई जो वर्तमान में बड़े-बड़ें टैंकरो और मिसाइल से रंग उडाने तक आधुनिक हो गई।
सांप्रदायिक एकता पेश करते थे लोग
गेर में हिंदु मुस्लिम सिख इसाई सब समाज के लोग शामिल हो जाते थे। मानों सब एक रंग हो गए। वह आत्मियता जो गेर में थी उसने गेर को स्वरूप को हर साल भीड़ को बढ़ा दिया। फिर दुसरी गेर भी शामिल होने लगी और गेर का स्वरूप बढ़ता गया। पहले महिलाओं की भागीदारी कम होती थी वह भी धीरे-धीरे बढ़ने लगी।
टीवी कलाकारों को देखने उमड़ पड़ते थे लोग
टोरी कार्नर की गेर में फिर टीवी कलाकारों को लाने का सिलसिल चालू हुआ कभी सास भी बहू का मिहर उपाध्याय तो कभी स्मृति ईरानी के साथ जब वह गेर में शामिल हुआ तो कई लोगो ने उसे छू कर देखा क्योकि वह सिरियल में मर चुका था तो महिलाएं उसे देख कर हैंरत में पड़ गई कि वह तो जिंदा है।
इसके बाद जिस देश में निकला चांद सिरीयल के वरुण बडोला, बीएसएफ का जवान मंगल सिंग फिर कई ऐसे बच्चों के लिए सर्कस के कलाकारों सहित लोगों को गेर में उत्साह बढाने के लिए अतिथि के रूप में आमंत्रित किया जाता था जिन्हें देखने के लिए लोग गेर में शामिल होते थे। अब तो युवा गेर में उमड़ते हुई भीड़ और उत्साह के देखने और मस्ती,उत्साह मनाने के लिए गेर में शामिल होते है जिनकी संख्या लाखों में पहुंच गई है

गैरों को अपना बनाती ‘गेर’
गेर में हुंडदंग होना आम बात होती है जब तक वह शालीनता से की जाएं। जब वह सीमाएं तोड़ देती है तो वह गलत है। गेर में सभी अनजान होते है जब एक-दूसरे को रंग लगाते है। तो मानों गैरों को अपना बनाते है। गेर संयोजक का कहना है कि गेर में पुलिस प्रशासन मुस्तैदी से तैनात रहता है। टोरी कार्नर की गेर सुबह 10.30 पर शुरू हो जाती है ऐसे में गेर में किसी प्रकार की कोई हुड़दंग या विवाद नहीं होते है बाकि मस्ती का त्योहार है जहां गैरों को भी अपना बनाया जाता है। हमारी गेर बहुत आनंद और मस्ती के साथ निकलती है जिसमें हुंडदंग के साथ शालीनता होती है बाकि पुलिस प्रशासन का पूरा सहयोग रहता है।
इंदौर की सांस्कृतिक विरासत को सहेजती गेर
हालांकि, टोरी कार्नर की गेर का महत्व आज भी कम नहीं हुआ है। यह क्षेत्र गेर की जड़ों का प्रतीक माना जाता है और पुराने इंदौर की सांस्कृतिक विरासत को संजोए हुए है। बुजुर्गों और स्थानीय नागरिकों के लिए टोरी कार्नर की गेर आज भी स्मृतियों और परंपरा से जुड़ा एक भावनात्मक अध्याय बनी हुई है।


