Eternal Hinduism

धर्म का योद्धा जूना अखाड़ा, मुगलों से राममंदिर निर्माण तक की लड़ाई में दिया योगदान!

हमारे इतिहास में कभी यह नहीं पढ़ाया गया कि मुगल काल के दौरान धर्म की लड़ाई कौन लड़ रहा था। कौन थे वह लोग जो धर्म की लड़ाई में मैदान संभाल रहे थे। राजा-महाराजा ने तो मुगलों से अपने राज्य के लिए युद्ध किया।  लेकिन उस समय धर्म की ध्वजा फहराने के लिए कौन लड़ाई लड़ रहा था? वह कौन लोग थे?  जिन्होने हिदुत्व की लड़ाई की थी। इस बात के कोई ठोस प्रमाण तो नहीं मिलते है क्योंकि अंग्रेजों ने हमारे धार्मिक गंथों को नष्ट करके हमारे पुरातन इतिहास को तहस-नहस कर दिया। लेकिन धर्म का लड़ाई एक अखाड़े ने लड़ी जो कभी किसी इतिहास में नहीं छपा, एक अखाड़ा है जो धर्म के लिए लड़ाई करता है। हमारे ऋषि मुनी, साधु-संतो ने भी धर्म के लिए लड़ाई है। इसकी शुरूआत बोद्ध धर्म के भारत में प्रवेश के साथ शुरू हो गई थी।
क्यों अखाड़ों की जरूरत पड़ी?
कुछ ऐसी भी जनश्रुतियां हैं कि जब देश में बौद्ध धर्म का प्रचार-प्रसार बढ़ने लगता था, शैव और वैष्णव मत के मानने वाले लोगों का उत्पीड़न होने लगा, सनातन धर्म ही संकट में आने लगा, तब इन अखाड़ों ने आदि शंकराचार्य के दिग्विजय रथ को संभाला। कहते हैं कि शस्त्र और शास्त्र दोनों में पारंगत इन अखाड़े के साधुओं ने सनातन धर्म को संभाले रखा।

अखाड़ों का काम क्या था?
अखाडों का मूल अर्थ है योद्धाओं का संगठन। अखाड़े के संत हथियारों से लैस होते थे। अलग-अलग संकटपूर्ण स्थितियों में राष्ट्र और सनातन धर्म की रक्षा के लिए ये अखाड़े आगे आए हैं। इसमें सबसे मजबुत जूना अखाड़े के साधु रहे है। जिन्होने शास्त्र और शस्त्र दोनों से दीक्षा लेकर धर्म की रक्षा कि बागडोर संभाली।

कैसे अस्तित्व में आया जूना अखाड़ा?
7 वीं शताब्दी के आसपास संन्यासियों के 52 संतों ने दत्तात्रेय अखाड़ा बनाया। इसे एक और नाम मिला भैरव अखाड़ा। बाद में इसका नाम बदला तो जूना अखाड़ा कहा गया। जूना का अर्थ पुराना होता है। इसे आप ‘प्राचीन मंडल’ भी कह सकते हैं।

कब शुरू हुआ जूना अखाड़ा?
जूना अखाड़ा इतना पुराना है कि इसकी ठीक-ठीक तिथि बताना कठिन है। सनातन धर्म वैदिक सभा के पदाधिकारी बताते हैं कि जूना अखाड़े के पहले मठ स्थापना 1145 ईस्वी में उत्तराखंड में हुई थी। पहला मठ कर्ण प्रयाग में है।

मठों की रक्षा के लिए मुगलों से लिया लोहा
कहा जाता है कि सनातन धर्म की रक्षा के लिए जूना अखाड़े ने सबसे बड़ी सेना खड़ी की. इस अखाड़े के नागाओं ने मंदिरों-मठों की रक्षा के लिए मुगलों से लोहा लिया. शस्‍त्र विद्या में निपुण नागा संन्‍यासियों ने अफगान शासक अहमद शाह अब्‍दाली को आगे बढ़ने से रोका था. ऐसा भी कहा जाता है कि मथुरा-वृंदावन के बाद गोकुल फतह करने के इरादे से अहमद शाह अब्‍दाली ने कूच किया लेकिन जूना अखाड़े के नागाओं ने उसके कारवां को आगे नहीं बढ़ने दिया.

जहांगीर को भोंकी थी कटारी
एक कथा ये भी प्रचलित है कि जब प्रयागराज कुंभ मेला था तब वहां मुगल बादशाह जहांगीर आने वाला था. तब साधु संन्यासियों की इतनी दिशा नहीं थी कि वे उसके खिलाफ सीधा युद्ध लड़ पाएं. ऐसे में वैष्णव और शैव साधुओं ने मिलकर एक पिरामिड बनाया था. यह एक छद्म युद्ध था जहां पिरामिड पर चढ़कर एक साधु योद्धा ने जहांगीर को जाकर कटारी भोंक दी थी. यह संन्यासी क्रांति का उच्चतम स्वरूप था. भारत की अखंडता ने साधु संतों ने एक सन्यासी सैनिक बनकर अपनी भूमिका निभाई और भारत की क्रांति को जन्म दिया जिसे हम आजादी की प्रथम क्रांति के रूप में जानते हैं
जूनागढ़ के निजाम को चटाई धूल
जूनागढ़ के निजाम को भी भीषण युद्ध में नागाओं ने धूल चटा दी थी. उन्होंने जंग के दौरान अपने युद्ध कौशल से प्रभावित किया. आखिरकार जूनागढ़ के निजाम को घुटने टेकने पर मजबूर होना पड़ा. संन्यासियों के पराक्रम का आलम ये था कि जूनागढ़ के निजाम को संन्यासियों को संधि करने के लिए बुलाना पड़ा

आज तक कर फहरा रहा है पताका
जूना अखाड़ा ने राम मंदिर निर्माण तक अयोध्या के राम मंदिर आंदोलन में हिस्सा लिया है। भारत में जब-जब हिंदू धर्म की चर्चा छिड़ती है, अखाड़ों का जिक्र आ ही जाता है। हिंदू धर्म के मान्यता प्राप्त 13 अखाड़े हैं। अब इसमें किन्नर अखाड़ा जुड़ गया है। इसमें जूना अखाड़ा सबसे ताकतवर और संख्या बल में सबसे मजबूत अखाड़ा है। ‘जूना अखाड़ा’ में लगभग 5 लाख साधु संत जुड़े हुए है। जो कभी नजर तो नहीं आते लेकिन सिंहस्थ में इनकी झलक अवश्य देखी जाती है।

स्वयं का पिंडदान करके होते है शामिल
जूना अखाड़े में लगभग 5 लाख सदस्य हैं। ये लोग संन्यासी संत हैं, जिन्होंने अपना पिंडदान करके समाज से विरक्ति ले ली है। जिन नागा संन्यासियों की कठिन साधना को लोग आज भी देखकर सन्न रह जाते हैं, उनके बनने की नियमावली भी यहीं अखाड़ा तय करता है।

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