जैसलमेर(हैमंत पालीवाल) जैसलमेर से लगभग 18 किलोमीटर दूर स्थित कुलधरा आज भले ही उजड़ा हुआ गांव कहलाता हो, कुलधरा जिसे भूतिया गाँव माना जाता है कि आज भी कुलधरा में आत्माएं भटकती हैं और यहाँ अनजानी आवाजें और रहस्यमयी गतिविधियां होती हैं लेकिन यहां जीवन और हलचल पूरी तरह खत्म नहीं हुई है। गांव के चारों ओर छोटी-मोटी बस्तियां आज भी आबाद हैं। दिन के समय पर्यटकों की आवाजाही के कारण आसपास अस्थायी बाजार और फास्ट फूड के ठेले चलते रहते हैं, जो इस सुनसान पहचान के बिल्कुल उलट तस्वीर पेश करते हैं।

विरान कुलधरा लेकिन फिर भी होती है हलचल
जैसलमेर से लगभग 18 किलोमीटर दूर स्थित कुलधरा आज भले ही उजड़ा हुआ गांव कहलाता हो, लेकिन यहां जीवन और हलचल पूरी तरह खत्म नहीं हुई है। गांव के चारों ओर छोटी-मोटी बस्तियां आज भी आबाद हैं। दिन के समय पर्यटकों की आवाजाही के कारण आसपास अस्थायी बाजार और फास्ट फूड के ठेले चलते रहते हैं, जो इस सुनसान पहचान के बिल्कुल उलट तस्वीर पेश करते हैं।
कुलधरा एक व्यवस्थित गांव का आईना
कुलधरा में प्रवेश करते ही पुराने पत्थरों से बने खंडहर ध्यान खींचते हैं। अधिकतर मकान समय के साथ टूट चुके हैं, लेकिन उस दौर के सरपंच का घर आज भी सहेज कर रखा गया है। इसे ठीक-ठाक हालत में रखा गया है ताकि पर्यटक उस समय की सामाजिक संरचना और जीवनशैली को समझ सकें। सरपंच के घर के चारों ओर कई अन्य खंडहर आज भी मौजूद हैं, जो बताते हैं कि यह गांव कभी सुनियोजित और व्यवस्थित रहा होगा। गांव के भीतर एक प्राचीन मंदिर भी है, जहां आज किसी भी प्रकार की मूर्ति स्थापित नहीं है। माना जाता है कि यह मंदिर भगवान विष्णु से जुड़ा हुआ था।
जल प्रबंधन का अदभूत प्रबंधन कुलधरा
इसके पास ही एक पुरानी बावड़ी है, जो उस समय के जल प्रबंधन की समझ को दर्शाती है। रेगिस्तान के बीच पानी की व्यवस्था अपने आप में इस बस्ती की तकनीकी समझ को उजागर करती है। गांव से थोड़ी दूरी पर एक तालाब स्थित है, जिसे उसी समय बनवाया गया था जब कुलधरा आबाद था।
गांव का धार्मिक इतिहास हो उठता है जीवंत
तालाब के आसपास सती स्थलों और उस काल में पूजे जाने वाले स्थानीय देवताओं के स्थान भी मौजूद हैं। ये स्थल आज भी गांव के सामाजिक और धार्मिक इतिहास की परतें खोलते हैं, भले ही अब वहां पूजा-पाठ नियमित रूप से नहीं होता।
पालीवाल समाज का है गौरव
कुलधार आज भी हर पालीवाल समाज के परिवार की यादों में बसी है। पता नहीं आज भी पुरा पालीवाल समाज यहां कभी गया नहीं फिर भी इतिहास की स्मृतिया मानों समाजजनो को खींचती है। कुलधरा का नाम आते ही आज भी पालीवाल परिवारों के वंशजों में एक रोमांच जाग उठता है जो सदियों पुराने उस दर्द को जगा देती है जो उस समय में पूर्वजो ने झेला था।
शरीर में आज अजीब कंपन होता है जब भी कुलधरा का नाम आता है। वैसे तो पूर्वजों ने कुलधरा को श्राप दिया है कि यह जमीन कभी दोबार बस नही पाएंगी लेकिन इतिहास के पन्नों में मुगल काल में शायद यहां का इतिहास कही दबा दिया गया है। वर्तमान में प्रशासन की ओर से कुलधरा में प्रवेश के लिए टिकट व्यवस्था लागू है, हालांकि पालीवाल समाज के लोगों के लिए यहां आज भी टिकट नहीं लिया जाता। यह निर्णय इस बात की ओर इशारा करता है कि कुलधरा सिर्फ एक पर्यटन स्थल नहीं, बल्कि एक जीवित सामाजिक स्मृति भी है।

रहस्यमयी है यहां के टुटे मकानों की चमक
रेगिस्तान होने के कारण कुलधरा और उसके आसपास की ज़मीन पर दिन भर एक अलग तरह की सुनहरी चमक बनी रहती है। सूरज की रोशनी जब टूटे मकानों और पत्थरों पर पड़ती है, तो यह जगह और भी रहस्यमय लगने लगती है। शायद यही वजह है कि डर, इतिहास और दृश्य सौंदर्य—तीनों एक साथ यहां लोगों को खींच लाते हैं।
रहस्य जो आज तक बरकरार है
कुलधरा आज भले ही वीरान कहा जाता हो, लेकिन यह पूरी तरह खाली नहीं है। यहां पर्यटक हैं, आसपास रहने वाले लोग हैं और रेत में दबी एक ऐसी कहानी है, जो हर आने वाले को अपने-अपने तरीके से कुछ न कुछ सोचने पर मजबूर कर देती है। कुलधरा की मिट्टी मानो कुछ कहती है। जिसे सुनना हर किसी के लिए संभव नही है लेकिन कुलधरा का नाम सुनते ही जब पालीवाल समाज के कई लोगों रोमांच की अनुभूति होती है मानो वह मिट्टी और वहां पर बसा रहस्य आज भी चीख-चीख कर कुछ बताना चाहता हो। यह वहीं मिट्टी है जिसने समाज के गौरव के लिए अपना सबकुछ दांव पर लगा दिया। आज भी प्रश्न कौंधता है कि आखिर उस समय क्या हुआ था? कि रातों रात पूरा गांव खाली हो गया था मानो आज भी वहां बसी कोई शक्ति पालीवाल समाज को खींचती है।

कुलधरा की कहानी
कुलधरा जैसलमेर के पास एक समृद्ध पालीवाल ब्राह्मण गाँव की है, जिसे लगभग 200 साल पहले एक क्रूर दीवान सालम सिंह के अत्याचारों और एक सुंदर कन्या पर उसकी बुरी नज़र के कारण सभी 5000 परिवारों ने एक रात में खाली कर दिया था; जाते समय उन्होंने गाँव को श्राप दिया कि यह कभी बस नहीं पाएगा, और आज भी यह एक वीरान और भूतिया जगह है, जहाँ रात में चीखें सुनाई देने की बातें कही जाती हैं, जो सत्ता के अहंकार और लोगों के स्वाभिमान की कहानी बताती हैं।
समृद्ध गाँव था कुलधरा
कुलधरा एक संपन्न गाँव था, जिसे पालीवाल ब्राह्मणों ने सरस्वती नदी के किनारे बसाया था और यह व्यापार के लिए महत्वपूर्ण था।
दीवान सालम सिंह का अत्याचार- जैसलमेर के दीवान सालम सिंह की नज़र गाँव के मुखिया की बेटी पर पड़ी और वह उसे पाने के लिए गाँव वालों पर दबाव डालने लगा, अपने सम्मान और बेटी की रक्षा के लिए, गाँव के सभी 5000 परिवारों ने एक रात में गाँव छोड़ने का फैसला किया और जाते समय गाँव को श्राप दिया कि यह कभी फिर से नहीं बसेगा दीवान के जाने के बाद, कुलधरा हमेशा के लिए वीरान हो गया और आज भी यह खंडर के रूप में खड़ा है।


