मां नर्मदा की परिक्रमा पर निकले कई संतों की मां नर्मदा से अलग-अलग कामना होती है। कोई संत सिद्धि के लिए, तो कोई मुक्ति के लिए, तो कोई ज्ञान प्राप्ति के लिए मां नर्मदा की परिक्रमा कर रहे है। मां नर्मदा की प्ररिक्रमा करने के लिए सबकी कामनाएं अलग-अलग है लेकिन इस वर्ष मां नर्मदा की परिक्रमा पर निकली है महामंडलेश्वर साध्वी सत्यप्रिया गिरी, जिनकी नर्मदा परिक्रमा की कामना काशी में नंदी को अपने परमेश्वर भगवान शिव से मिलाने

के कामना के साथ चल रही है। इनकी यात्रा का उद्देश्य काशी में नंदी को भगवान शिव से मिलाना है जिसके लिए यह पुरे नर्मदा मार्ग पर जहां-जहां भी जाती है वहां नर्मदा भक्तों को काशी में नंदी को ज्ञानवापी में कैद भगवान शिव के शिवलिंग से मिलाने की बात कहती है। वैसे आध्यात्तिम जगत में तो भगवान शिव से नंदी को कोई भी दूर नहीं कर सकता है लेकिन कलयूग में जिस तरह से आक्रांताओं ने हिंदू मंदिर को तोड़ कर हमारे धर्म का जिस तरह से अपमान किया है उसी धर्म की पताका को फिर से फहराने का मुख्य उद्देश्य लेकर साध्वी सत्यप्रिया गिरी मां नर्मदा की परिक्रमा पर निकली है।

कौन है साध्वी सत्यप्रिया गिरी?
साध्वी सत्यप्रिया गिरी, प्रसिद्ध हिंदुत्व वक्ता और फायर ब्रांड नेता साध्वी ऋतम्भरा की शिष्या हैं, जिन्हें हाल ही में कुंभ मेले के दौरान निरंजनी अखाड़े द्वारा महामंडलेश्वर बनाया गया है। वह अपने गुरु की शिक्षाओं और आध्यात्मिक यात्रा का अनुसरण करती हैं और सनातन परंपराओं के प्रचार-प्रसार में सक्रिय भूमिका निभा रही हैं। महामंडलेश्वर की पदवी मिलने के बाद साध्वी सत्यप्रिया गिरी ने कहा कि उनकी गुरु ने जिस तरह से अयोध्या में राम मंदिर के संघर्ष कर अंत में कोर्ट के फैसले से हिंदुओं को उनका हक दिलवाया है. उसी तरह से वो काशी और मथुरा में भव्य शिव और कृष्ण के मंदिर के निर्माण को जल्द पूरा करवाने के लिए लड़ाई लड़ेंगी. उनका कहना है कि काशी-मथुरा के लिए अब लंबी लड़ाई लड़ने का वक्त नहीं बचा हुआ है. अब समय है कि जल्दी से वहां भव्य कृष्ण और शिव मंदिर का निर्माण पूरा हो सके.
काशी के नंदी और ज्ञानवापी का ऐसा है मामला
ज्ञानवापी वह जगह है जहाँ काशी में शिव का आदिस्थान माना गया है। जहाँ शिव स्वयं अविमुक्तेश्वर लिंग रूप में इस तरह से विराजमान हैं कि आक्रांताओं द्वारा कई बार की कोशिशों के बावजूद भी उसे हिलाया तक नहीं जा सका। वर्तमान में जहां नंदी की प्रतिमा है उससे मात्र 40 फीट की दूर पर शिवलिंग है। लेकिन उस शिवलिंग को मस्जिद का वजूखाना बना दिया है। बता दें कि पुराणों में शिव और पार्वती के आदि स्थान काशी विश्वनाथ को प्रथम लिंग माना गया है। इसका उल्लेख महाभारत में भी किया गया है। वहीं औरंगजेब से पहले जाएँ तो 11वीं सदी तक यह मंदिर अपने मूल रूप में बना रहा, सबसे पहले इस मंदिर के टूटने का उल्लेख 1034 में मिलता है। इसके बाद 1194 में मोहम्मद गोरी ने इसे लूटने के बाद तोड़ा। काशी वासियों ने इसे उस समय अपने हिसाब से बनाया लेकिन वर्ष 1447 में एक बार फिर इसे जौनपुर के सुल्तान महमूद शाह ने तुड़वा दिया। फिर वर्ष 1585 में राजा टोडरमल की सहायता से पंडित नारायण भट्ट ने इसे बनवाया था लेकिन वर्ष 1632 में शाहजहाँ ने एक बार फिर काशी विश्वनाथ मंदिर को तुड़वाने के लिए मुग़ल सेना की एक टुकड़ी भेज दी। लेकिन हिन्दुओं के प्रतिरोध के कारण मुग़लों की सेना अपने मकसद में कामयाब न हो पाई। हालाँकि, इस संघर्ष में काशी के 63 जीवंत मंदिर नष्ट हो गए।

किताब ‘मासिर -ए-आलमगीरी में है मंदिर तोड़ने का उल्लेख
इसके बाद सबसे बड़ा विध्वंश औरंगजेब ने करवाया जो काशी के माथे पर सबसे बड़े कलंक के रूप में आज भी विद्यमान है। साक़ी मुस्तइद खाँ की किताब ‘मासिर -ए-आलमगीरी’ के मुताबिक़ 16 जिलकदा हिजरी- 1079 यानी 18 अप्रैल 1669 को एक फ़रमान जारी कर औरंगजेब ने मंदिर तोड़ने का आदेश दिया था। साथ ही यहाँ के ब्राह्मणों-पुरोहितों, विद्वानों को मुसलमान बनाने का आदेश भी पारित किया गया था।
मंदिर से औरंगजेब के ग़ुस्से की एक वजह यह थी यह परिसर संस्कृत शिक्षा बड़ा केन्द्र था और दाराशिकोह यहाँ संस्कृत पढ़ता था। और इस बार विश्वनाथ मंदिर की महज एक दीवार को छोड़कर जो आज भी मौजूद है और बिना किसी सर्वे के भी साफ दिखाई देती है, समूचा मंदिर संकुल ध्वस्त कर दिया गया। मुग़ल इतिहासकारों के अनुसार ही 15 रब- उल-आख़िर यानी 2 सितम्बर 1669 को बादशाह औरंगजेब को खबर दी गई कि मंदिर न सिर्फ़ गिरा दिया है, बल्कि उसकी जगह मस्जिद की तामीर भी करा दी गई है।
इसे औरंगजेब के समय अंजुमन इंतजामिया जामा मस्जिद नाम दिया गया था लेकिन बाद में ज्ञानवापी कूप के कारण इसका नाम भी ज्ञानवापी मस्जिद ही रहा। वहीं मंदिर के खंडहरों पर ही बना वह मस्जिद बाहर से ही स्पष्ट दीखता है जिसके लिए न किसी पुरातात्विक सर्वे की जरुरत है न किसी खुदाई की। लेकिन अभी सर्वे के बाद मिले शिवलिंग और दूसरे प्रमाणों की वजह से हिन्दुओं की स्थिति और भी मजबूत हुई है।
शिवलिंग को तहस-नहस करने की कोशिश
मुगलों द्वारा कई बार के हमलों में मूल शिवलिंग को नष्ट करने और अपने साथ ले जाने की कई कोशिशें हुईं लेकिन हर बार आक्रांताओं की तमाम कोशिशें क्यों नाकाम हुईं। इसका एक उत्तर शिवमहापुराण के 22वें अध्याय के 21वें श्लोक में मिलता है। यह इन दिनों चर्चा का विषय है। काशी विद्वत परिषद ने भी इस बात का जिक्र करते हुए बताया कि मुग़ल आक्रांताओं की नजर हमेशा से काशी के देवालयों पर रही और कई बार के हमलों में उन्होंने कई सदियों तक समय-समय पर नुकसान भी पहुँचाया। सभी ने अपने-अपने काल में काशी विश्वनाथ मंदिर पर भी आक्रमण किए। मंदिर का खजाना लूटा लेकिन लाख कोशिश के बाद भी विश्वेश्वर शिवलिंग को अपने साथ नहीं ले जा सके।


