विश्व प्रसिद्ध नाथद्वारा में विराजित श्रीजी बाबा को आज छप्पन भोग लगाए गए। आज मंदिर में वैष्णव परिवार के द्वारा श्रीजी बाबा को छप्पनभोग का मनोरथ कराया गया। मनोरथ वैष्णव परिवार अपनी कोई भी मनोकामना पुरी होने पर कराते है। उक्त जानकारी देते हुए मंदिर में सेवारत्त राहुल पुरोहित ने बताया कि –
मार्गशीर्ष पूर्णिमा पर लगता है छप्पनभोग
मंदिर के नियम (घर) का छप्पनभोग वर्ष में केवल एक बार मार्गशीर्ष पूर्णिमा को ही होता है. इसके अतिरिक्त विभिन्न खाली दिनों में वैष्णवों के अनुरोध पर श्री तिलकायत की आज्ञानुसार मनोरथी द्वारा छप्पनभोग मनोरथ आयोजित होते हैं. इस प्रकार के मनोरथ सभी वैष्णव मंदिरों एवं हवेलियों में होते हैं जिन्हें सामान्यतया ‘बड़ा मनोरथ कहा जाता है.

ऐसे होती है तैयारी
बड़ा मनोरथ के भाव से श्रीजी मंदिर के सभी मुख्य द्वारों की देहरी को पूजन कर हल्दी से लीपी जाती हैं एवं आशापाल की वंदनमाल बाँधी जाती हैं. आज दो समय की आरती थाली की आती हैं. मणिकोठा, डोल-तिबारी, रतनचौक आदि में छप्पनभोग के भोग साजे जाते हैं अतः श्रीजी में मंगला के पश्चात सीधे राजभोग अथवा छप्पनभोग (भोग सरे पश्चात) के दर्शन ही खुलते हैं.
सिद्ध केंसर से बनता है बालभोग
श्रीजी को गोपीवल्लभ (ग्वाल) भोग में विशेष रूप से दूधघर में सिद्ध की गयी केसर युक्त बासोंदी की हांडी व शाकघर में सिद्ध चार विविध प्रकार के फलों के मीठा अरोगाये जाते हैं.
राजभोग में होता है यह खास
राजभोग की अनसखड़ी में दाख (किशमिश) का रायता एवं सखड़ी में मीठी सेव, केसरयुक्त पेठा व पाँच-भात (मेवा-भात, दही-भात, राई-भात, श्रीखंड-भात, वड़ी-भात) अरोगाये जाते हैं. छप्पनभोग दर्शन में प्रभु सम्मुख 25 बीड़ा सिकोरी (सोने का जालीदार पात्र) में रखे जाते है.
राजभोग दर्शन में यह होता है कीर्तन
मदन गोपाल गोवर्धन पूजत l
बाजत ताल मृदंग शंखध्वनि मधुर मधुर मुरली कल कूजत ll 1 ll
कुंकुम तिलक लिलाट दिये नव वसन साज आई गोपीजन l
आसपास सुन्दरी कनक तन मध्य गोपाल बने मरकत मन ll 2 ll
आनंद मगन ग्वाल सब डोलत ही ही घुमरि धौरी बुलावत l
राते पीरे बने टिपारे मोहन अपनी धेनु खिलावत ll 3 ll
छिरकत हरद दूध दधि अक्षत देत असीस सकल लागत पग l
‘कुंभनदास’ प्रभु गोवर्धनधर गोकुल करो पिय राज अखिल युग ll 4 ll
ऐसा होता है श्रीजी बाबा का साज-श्रंगार
साज – आज श्रीजी में श्याम रंग की धरती (आधार वस्त्र) पर श्वेत ज़री से गायों, बछड़ों के चित्रांकन वाली एवं श्वेत ज़री की लैस के हांशिया वाली पिछवाई धरायी जाती है. गादी, तकिया एवं चरणचौकी के ऊपर सफेद बिछावट की जाती है.
वस्त्र – श्रीजी को आज फ़िरोज़ी ख़िनख़ाब का बड़े बूटा का सूथन, चोली एवं चाकदार वागा धराया जाता है. ठाड़े वस्त्र लाल रंग के धराये जाते हैं.
श्रृंगार – श्रीजी को आज वनमाला (चरणारविन्द तक) का हल्का श्रृंगार धराया जाता है. स्वर्ण के सर्व आभरण धराये जाते हैं.श्रीमस्तक पर फ़िरोज़ी ख़िनख़ाब के टिपारा के ऊपर पीले सलीदार ज़री का गौकर्ण, सुनहरी ज़री का घेरा एवं बायीं ओर शीशफूल धराया जाता है.श्रीकर्ण में हीरा के मकराकृति कुंडल धराये जाते हैं.चोटीजी मीना की बायीं ओर धरायी जाती है.कमल माला धरायी जाती हैं. श्वेत एवं गुलाबी पुष्पों की दो सुन्दर मालाजी धरायी जाती हैं.स्वर्ण के वेणुजी और दो वेत्रजी धराये जाते हैं.पट फ़िरोज़ी व गोटी सोना की बाघ-बकरी की आती है.


