Events

शहर में भूजल प्रदूषण की स्थिति गंभीर खतरे का संकेत – डॉ. शर्मा

इंदौर(विनोद गोयल)।   हम पानी के मामले में क्वालिटी के बजाय क्वांटिटी पर जोर देते आ रहे हैं। इंदौर की बसाहट गंगा बेसिन के दक्षिण भाग के सबसे ऊँचे हिस्से में दर्ज है। इस अंचल में होने वाली वर्षा का पूरा जल बहकर गंगा में चला जाता है। लगभग 6 करोड़ वर्ष पुरानी चट्टानों की विभिन्न परतों में मौजूद जल भंडार से हमें भूजल की उपलब्धता होती रही है। सिमरोल घाट से नीचे, महाराष्ट्र की ओर जाने वाले क्षेत्र में उपलब्ध जल ही हमारे भूजल का मुख्य स्त्रोत है। हमारी भूवैज्ञानिक संरचना बहुत विशिष्ट है लेकिन शहर में भूजल प्रदूषण की स्थिति, जल आपूर्ति और जल संतुलन के लिए गंभीर खतरा बन सकती है क्योंकि नाइट्रेट, क्लोराइड, अमोनिया, टीडीएस एवं कंडक्टिविटी जैसे मानदंडों की नियमित जाँच से ही जल प्रदूषण को रोका जा सकता है।

पेयजल संरक्षण पर हमारा ध्यान ही नहीं
हम इंदौर के लोग इस मायने में भाग्यशाली हैं कि हमें पानी तो पर्याप्त मिल रहा है लेकिन उसके सदुपयोग एवं बर्बादी को रोकने की तरफ हमारा कोई विशेष ध्यान ही नहीं है। यही स्थिति रही तो आने वाली पीढ़ी के लिए हमें शुद्ध और स्वच्छ पेयजल उपलब्ध कराना बड़ी चुनौती बन जाएगा।
भारत सरकार की ओर से पेय जल सुरक्षा के लिए नियुक्त पूर्व राष्ट्रीय नोडल अधिकारी डॉ. सुधीन्द्र मोहन शर्मा ने रविवार को इंदौर प्रेस क्लब के राजेंद्र माथुर सभागृह में संस्था सेवा सुरभि द्वारा ‘भूजल स्त्रोतों की शुद्धि और पुनर्भरण में सावधानी’ विषय पर आयोजित परिचर्चा के दौरान मुख्य वक्ता के रूप में शहर की पेयजल की स्थिति पर ऐसी अनेक महत्वपूर्ण बातें बताई।

वर्षा जल समुद्र तक नहीं पहुंचे इसका प्रयास  है जरूरी
सांसद शंकर लालवानी ने कहा कि सेवा सुरभि ने इस ज्वलंत मुद्दे पर परिचर्चा का आयोजन कर अच्छा सन्देश देने का प्रयास किया है। शहर की आबादी, पर्यावरण और जलवायु परिवर्तन को देखते हुए इंदौर जिले में 75 तालाबों के लक्ष्य के मुकाबले 101 तालाब बनवाए गए हैं और उनकी नियमित मानिटरिंग भी हो रही है। नगर निगम ने पूर्व में महापौर कैलाश विजयवर्गीय के कार्यकाल में पेयजल की मानिटरिंग के लिए एक विशेष सेल भी बनाया था जिसमें अनेक तकनीकी विशेषज्ञ शामिल थे।

नगर निगम आयुक्त क्षितिज सिंघल ने कहा कि हमारी आबादी और जीवनशैली में बदलाव के कारण पेयजल की खपत बढती जा रही है। तेजी से दोहन करने के कारण भूजल का स्तर भी घट रहा है। अब राज्य सरकार की जल प्रबन्धन के माध्यम से हमें पेयजल स्त्रोत के रिचार्ज, शुद्धिकरण एवं अन्य मापदंडों को देखकर काम करने की जरूरत है। हमारा वर्षा जल समुद्र तक नहीं पहुंचे, इसके लिए सबको प्रयास करना होंगे। हम ग्राउंड वाटर पर ज्यादा निर्भर होते जा रहे हैं। इसके लिए नागरिकों और संस्थाओं को आगे आकर जल गंगा संवर्धन जैसी योजनाओं में सहयोग करना चाहिए।

भूजल की शुद्धता और मानिटरिंग पर ध्यान देने की है आवश्यकता
भूजल विशेषज्ञ और मुख्य वक्ता डॉ. सुधीन्द्र मोहन शर्मा ने प्रोजेक्टर की मदद से शहर की जल आपूर्ति और भूवैज्ञानिक संरचना को प्रदर्शित करते हुए कहा कि कम गहराई वाले भूजल भंडार वर्षा के जल से तेजी से रिचार्ज हो सकते हैं लेकिन उतनी ही तेजी से प्रदूषित भी हो जाते हैं। इंदौर गंगा बेसिन के दक्षिणी भाग के सबसे ऊँचे वाले हिस्से में बसा है। 6 हजार करोड़ वर्ष पुरानी चट्टानों की परतों के बीच मौजूद भूजल भंडार से हमें पानी मिल रहा है।
जल प्रदूषण की स्थिति इसलिए बन रही है कि सीवर ड्रेनों, अस्वच्छ नालियों, प्रदूषित नदियों, उद्योगों से निकलने वाले अनुपचारित और अपशिष्ट जल तथा वायुमंडल में मौजूद गैसों और छतों तथा नालियों की नियमित सफाई नहीं होने से भी भूजल प्रदूषण की सम्भावना बढ़ जाती है। इसके लिए भूजल की शुद्धता और मानिटरिंग पर सबसे ज्यादा ध्यान देने की जरूरत है। पानी को शुद्ध करने के लिए जो केमिकल्स मिलाए जाते हैं वे तो अपनी जगह पर ठीक हो सकते हैं लेकिन अन्य कारणों से जो रासायनिक तत्व और कचरा, प्लास्टिक, भारी धातु एवं उद्योगों के अनुपचारित और प्रदूषित जल के कारण भी हमारे पेयजल की व्यवस्था प्रदूषित हो सकती है।

हाइड्रोलॉजी को समझकर ही करें जल प्रबन्धन
इंदौर की सेटेलाइट इमेज के आधार पर प्रदूषित पानी वाले स्थानों की मानिटरिंग की जरूरत बताते हुए डॉ. शर्मा ने कहा कि शहर की हाइड्रोलॉजी को समझकर ही जल प्रबन्धन किया जाना चाहिए। पहले पूर्वजों के समय में 8 फीट गहराई पर ही पानी मिल जाता था लेकिन ग्राउंड वाटर और भूजल की प्राकृतिक व्यवस्था से छेड़छाड़ का ही नतीजा है कि हमें आज बहुत गहराई तक उतरकर पानी प्राप्त करने सहित अनेक समस्याओं का सामना करना पड़ रहा है। भारत सरकार द्वारा कराए गए सर्वेक्षण के आंकड़ों का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि इंदौर जिले में 57 हजार करोड़ लीटर पानी प्रतिवर्ष प्राकृतिक रूप से मिलता है। शहर के लोगों को वर्षा से औसतन 12 लाख लीटर पानी प्रति व्यक्ति मिल रहा है। शहर में बगीचों के लिए ट्रीटमेंट प्लांट्स में शुद्ध किया हुआ पानी उपयोग में लिया जा रहा है,

यह देश में अनोखा उदाहरण है। हम पानी की जरूरतों को कम करने के मामले में बहुत पीछे हैं। हमारा ग्राउंड वाटर प्रदूषित हो गया तो उसे साफ और शुद्ध करना बहुत जटिल है। हमारा भूमिगत जल ख़राब हो रहा है। हमारी दोनों नदियों का पानी भी औद्योगिक क्षेत्रों, कचरे, प्लास्टिक और अन्य तत्वों की मिलावट के कारण दूषित बना हुआ है। अनेक भारी धातुओं के कारण भी हमारा जल प्रदूषित होता रहा है। भागीरथपुरा में भी यदि समय-समय पर पेयजल की शुद्धता की जाँच होती रहती तो शायद यह हादसा नहीं होता। इससे अब सबक लेने की जरूरत है। समाजसेवी किशोर कोडवानी ने भी शहर की पेयजल स्थिति, नर्मदा से मिलने वाले जल, लीकेज, फिजूलखर्ची, बगीचों के पानी सहित विभिन्न मुद्दों पर आंकड़ों सहित अपनी बात रखी।

भूजल रिचार्जिंग के प्रभावी प्रयास की आवश्यकता
आरआर केट के वैज्ञानिक सेवानिवृत्त वरिष्ठ वैज्ञानिक डॉ. निकेतन सेठी ने भी केट परिसर में किए गए जल प्रबन्धन की सफलता का उदाहरण देते हुए कहा कि जल प्रबन्धन, दूषित जल उपचार, रेन वाटर हार्वेस्टिंग और भूजल रिचार्जिंग के प्रभावी प्रयासों का ही नतीजा है कि वहां पिछले 40 वर्षों में प्रदूषित पेयजल की कोई समस्या नहीं आई। शहर के जल वितरण के मामले में भी इसी तरह की सावधानी बरतना होगी।

कार्यक्रम की अध्यक्षता कर रहे डॉ. अजीत सिंह नारंग ने कहा कि हम सौभाग्यशाली है कि 70 किलोमीटर दूर से करोड़ों रुपए खर्च करने के बाद हमें अपने घर बैठे नर्मदा का पानी मिल रहा है लेकिन यह हम सबका दायित्व है कि हम पानी की बर्बादी को रोकें। नासा की रिपोर्ट में कहा गया है कि पानी के दुरूपयोग के मामले में हम बहुत आगे हैं क्योंकि 122 देशों में हम 120 वें क्रम पर हैं। दुनिया के अन्य देशों में 118 प्रतिशत पेयजल स्त्रोतों का रिचार्ज होता है लेकिन भारत में यह आंकड़ा केवल 58 प्रतिशत है। दुनिया के 12 देशों में ऐसी व्यवस्था है कि जितने पानी की आपूर्ति लोगों को की जाती है, उतना ही पैसा लोगों से लिया जाता है लेकिन हमारे यहाँ पानी की बर्बादी रोकने का कोई इंतजाम नहीं है वहीं 80 प्रतिशत बीमारियाँ जलजन्य होने के बावजूद भी हम पानी की शुद्धता की मानिटरिंग के मामले में बहुत पीछे हैं। इस तरह के आयोजन से इंदौर में भूजल संरक्षण और जल गुणवत्ता सुधार के प्रयासों को नई दिशा मिल सकेगी।

अतिथियों ने बढ़ाई कार्यक्रम की गरिमा
सांसद शंकर लालवानी के मुख्य आतिथ्य और इंदौर नगर निगम के आयुक्त, आईएएस क्षितिज सिंघल, आरआर केट के सेवानिवृत्त वरिष्ठ वैज्ञानिक निकेतन सेठी और शहर के जागरूक नागरिक अजीत सिंह नारंग ने भी इस अवसर पर अपने विचार व्यक्त किए। प्रारंभ में संस्था सेवा सुरभि की ओर से पर्यावरणविद डॉ. ओपी जोशी, रामेश्वर गुप्ता, नेमीचंद जैन, गौतम कोठारी, अरविन्द जायसवाल, भोलेश्वर दुबे ने सभी अतिथियों का स्वागत किया। स्मृति चिन्ह संस्था के पंकज कासलीवाल, कैलाश मित्तल, दिलीप वाघेला ने भेंट किए। अतिथियों ने संस्था के संयोजक ओमप्रकाश नरेडा के साथ दीप प्रज्वलन कर इस परिचर्चा का शुभारंभ किया। संचालन किया मेघा बर्वे ने।
इस अवसर पर लोक स्वास्थ्य यांत्रिकी विभाग के पूर्व अभियंता वीके जैन, विनोद नीमा, पंकज कासलीवाल, अतुल शेठ, पीथमपुर औद्योगिक संगठन के अध्यक्ष गौतम कोठारी, समाजसेवी ईश्वर बाहेती, रमेश गुप्ता, मुरलीधर धामानी सहित बड़ी संख्या में प्रबुद्धजन उपस्थित थे।

Shares:
Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *