Narmada

जहां अरब सागर में समा जाती है मां नर्मदा, वहां से शुरू हुई संत श्री अवधेश चैतन्य ब्रह्मचारी जी की उत्तरी तट पर परिक्रमा

अद्भुत छण था वो जब नर्मदा माई अपना भौतिक स्वरूप खोते हुए शांत स्वभाव से अथाह समुद्र मे विलीन हो जाती है। अमरकंटक से सागर तक माई कही रौद्र, कही उग्र है| कही प्रेम,वात्सल्य बिखेरती है तो कही नि:शब्द हो जाती है मां नर्मदा के कई रूप दिखाई देते है। ऐसे ही रुपों को देखते हुए संतश्री अवधेश चेतन्य ब्रह्मचारी महाराज की परिक्रमा ने दक्षिण तट के एक हिस्से की परिक्रमा तय करते हुए उत्तरी तट पर आज से परिक्रमा शुरू की।

संतश्री ने की मां नर्मदा के विलिन होते स्वरूप की अर्चना
नर्मदा परिक्रमा के दौरान मां नर्मदा के अरब सागर मे विलिन होने के साक्षी बनते हुए संतश्री अवधेश चैतन्य जी महाराज ने मां नर्मदा और अरब सागर की पुजा-अर्चना की। संत श्री ने भरूच पहुंच कर मीठी तलाई पर भक्तो से मुलाकात की इसके बाद नाव में सवार होकर संतश्री, नर्मदा के उत्तर तट पर पहुंचे। सागर के रास्ते में संतश्री ने सबसे पहले सागर में विलिन हुई मां नर्मदा की पुजा अर्चना की इसके बाद यहां पर उड़ने वाले पक्षियों को भोजन दिया। यह अद्भुद क्षण थे। जब संतश्री ने मां के विलिन होते स्वरूप के दर्शन करते हुए उनकी आराधना की। इसके साथ ही पृथ्वी पर मां नर्मदा के भौतिक स्वरूप को विलिन होते हुए देखा।

मां नर्मदा के गुस्से से शुरू हुई यात्रा का शांत अंत
मीठी तलाई (गुजरात) नर्मदा नदी के मुहाने के पास एक महत्वपूर्ण स्थान है जहाँ नर्मदा नदी अरब सागर में मिलती है, और यहाँ तट परिवर्तन का अर्थ है नर्मदा परिक्रमा के दौरान दक्षिणी तट से उत्तरी तट पर समुद्र पार करके जाना, जिससे नदी का स्वरूप (उत्तर तट की परिक्रमा) बदल जाता है, यह स्थान श्रद्धालुओं के लिए महत्वपूर्ण है जहाँ नर्मदा नदी सागर में विलीन होती है, एक अद्भुत और शांत अनुभव होता है, और परिक्रमा का अगला नया चरण शुरू होता है। देश की सभी बड़ी नदियां बंगाल सागर में मिलती हैं लेकिन गुस्से के कारण नर्मदा अरब सागर में समा गई।

मानवीय संवेदना महसूस कराती मां नर्मदा
मां नर्मदा मानवीय संवेदनाओं को जगाती हैं क्योंकि उनका जल शारीरिक-मानसिक शांति, कष्ट मुक्ति, और आंतरिक शुद्धि का अनुभव कराता है, जो जीवन के ‘नर्म’ (सुख) देने के उनके नाम ‘नर्मदा’ (नर्म + दा) के अर्थ को चरितार्थ करता है; उनकी परिक्रमा और दर्शन से भक्त स्वयं को प्रकृति और आध्यात्मिकता से जोड़कर, अपने भीतर के प्रवाह (स्वधर्म) को महसूस करते हैं और जीवन के मोह-माया से ऊपर उठकर आत्म-ज्ञान की ओर बढ़ते हैं, जिससे मानवीय भावनाओं और आध्यात्मिक गहराई का अनुभव होता है।

नर्मदा की कथा जनमानस में कई रूपों में प्रचलित है लेकिन चिरकुवांरी नर्मदा का सात्विक सौन्दर्य, चारित्रिक तेज और भावनात्मक उफान नर्मदा परिक्रमा के दौरान हर संवेदनशील मन महसूस करता है। कहने को वह नदी रूप में है लेकिन चाहे-अनचाहे भक्त-गण उनका मानवीयकरण कर ही लेते है। पौराणिक कथा और यथार्थ के भौगोलिक सत्य का सुंदर सम्मिलन उनकी इस भावना को बल प्रदान करता है और वे कह उठते हैं नमामि देवी नर्मदे…. !

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