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भोजशाला पर हिंदू समाज की चेतावनी, बसंत पंचमी पर नही रोकी जाएंगी पूजा, प्रशासन की मुसीबत-तनाव का टेंशन

मध्यप्रदेश के धार जिले की भोजशाला की मुक्ति और उसके गौरव की पुनर्स्थापना के लिए हिंदू समाज संकल्पित है। 23 जनवरी को बसंत पंचमी पर्व मनाया जाना है। ऐसे में महज दो मंगलवार ही शेष हैं और दो ही सत्याग्रह होना है। इसके बाद 23 जनवरी को बसंत पंचमी पर मां वाग्देवी का जन्मोत्सव भक्तिभाव से मनाया जाएगा। जैसे-जैसे बसंत पंचमी नजदीक आती जा रही है, वैसे-वैसे सत्याग्रह में हिंदुओं की संख्या में बढ़ोतरी दर्ज की जा रही है। इसी कड़ी में नियमित सत्याग्रह किया जा रहा है। इस दौरान बड़ी संख्या में हिंदू समाज के लोग भोजशाला में मां वाग्देवी के दर्शन के लिए पहुंचे है।

बसंत पंचमी पर अखंड पूजा होकर रहेगी
वर्ल्ड हिंदू फेडरेशन के प्रदेश अध्यक्ष संजय अग्रवाल ने सत्याग्रह में आए हिंदुओं से कहा- बसंत पंचमी पर मां वाग्देवी की पूजा सूर्योदय से सूर्यास्त तक होगी। किसी भी परिस्थिति में परिसर खाली नहीं किया जाएगा। भोजशाला केवल एक ऐतिहासिक स्थल नहीं, बल्कि सनातन परंपरा, विद्या और आस्था का केंद्र है। बसंत पंचमी मां वाग्देवी की उपासना का पर्व है और इस दिन पूजा-अर्चना करना हिंदू समाज का स्वाभाविक और संवैधानिक अधिकार है। ये निर्णय भावनाओं में नहीं, बल्कि आस्था और परंपरा के आधार पर लिया गया है।

इस बार शुक्रवार को बसंत पंचमी
इस बार बसंत पंचमी शुक्रवार को पड़ रही है, जिस कारण विषय को लेकर अलग-अलग चर्चाएं हो रही हैं, लेकिन हिंदू समुदाय किसी भी भ्रम या दबाव में आने वाला नहीं है। वर्षों से चली आ रही आस्था और परंपरा को एक दिन के संयोग के आधार पर नहीं रोका जा सकता। पहले भी भोजशाला को खाली नहीं किया गया था और इस बार भी ऐसा नहीं होने दिया जाएगा। यदि जरूरत पड़ी तो हिंदू समाज अपने धार्मिक अधिकारों की रक्षा के लिए संगठित और शांतिपूर्ण रूप से आगे आएगा।

इंदौर में हुई प्रेस कांफ्रेंस

यहां हुई प्रेस कांफ्रेस में मीडिया प्रमुख मोहन राठौर ने जानकारी देते हुए बताया कि धार जिले में राजा भोज ने धारानगरी में अपनी आराध्य मां सरस्वती की उपासना के लिए एक विशाल भवन शारदा सदन सरस्वती कंठाभरणम का निर्माण अपने देखरेख में करवाया। जो आज भोजशाला नाम से विख्यात है। सन् 1034 में चालीस दिवसीय सरस्वती जन्मोत्सव के साथ ही माँ सरस्वती वाग्देवी की स्फटिक से निर्मित सुंदर व सौम्य मुद्रा वाली प्रतिमा बनवाकर उसकी प्राण प्रतिष्ठा की। तब से ही भोजशाला में माँ सरस्वती की साधना एवं आराधना सतत् चलती रहीं है। सन्1904 भोजशाला की गौरवशाली ऐतिहासिक व धार्मिक पृष्ठभूमि के कारण तत्कालिन अंग्रेज शासन ने इसे राष्ट्र संरक्षित धरोहर माना। सन् 1952 में इसे भारत की केन्द्र सरकार के पुरातत्व विभाग ने संरक्षित इमारत घोषित किया।

पुरे दिन पूजा करने का है अधिकार
7 अप्रैल 2003 द्वारा दिए गए आदेशानुसार पूरे वर्ष प्रति मंगलवार एवं बसंतपंचमी को दिन भर पूजा का अधिकार हिन्दूओं को प्रदान किया गया है। जिसकी शासन एवं प्रशासन  व्यवस्था करें। विदित हो की हिन्दू समाज बसंत पंचमी के अवसर पर प्रतिवर्ष माँ सरस्वती जन्मोत्सव बसंत पंचमी हर्षोल्लास के साथ मनाता आ रहा है। ध्यान देने में आता है कि जब जब भी माँ का जन्मदिन शुक्रवार को आता है तो कट्टरपंथी मुस्लिम जन्मोत्सव में विघ्न डालने का कुत्सित प्रयत्न करते है।

साथ ही प्रशासन द्वारा मुस्लिमों के द्वारा  नमाज कराने हेतु 7 अप्रैल 2003 के आदेश का उल्लंघन किया जाता है तथा हिन्दूजनों पर बर्बरता कर माँ की पूजा खण्डित की जाती है। ऐसे अवसरो पर पूर्व में प्रशासन द्वारा हिन्दू समाज के प्रति की गई बर्बरता से आज भी आक्रोशित है। इस वर्ष इसकी पुनरावृत्ती न हो मुसलमानों का माँ सरस्वती मंदिर भोजशाला परिसर में प्रवेश पूर्णतः प्रतिबंधित हो। हिन्दू समाज अपनी माँ का जन्मोत्सव निर्विघ्न मनाने लिए कटिबद्ध है।

यदि माँ के जन्मोत्सव में किसी प्रकार का विघ्न आता है तो सम्पूर्ण क्षेत्र का हिन्दू समाज इसे सहन नहीं करेगा। इस पर होने वाली प्रतिक्रिया कि समस्त जवाबदारी शासन और प्रशासन कि होगी। इसी बात को समिति के पदाधिकारी अध्यक्ष सुरेश चंद्र जलोदिया महामंत्री सुमित चौधरी महाप्रबंधक हेमंत दोराया ने दी

 

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