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नर्मदा साहित्य मंथन- भारतीयों को वैचारिक बंटवारे को समझना होगा।

भारत उदय के द्वितीय सत्र में स्तंभकार और लेखक अनुपम मिश्र ने ’दृष्टि ही दृष्टांतः गाजा से कश्मीर’ विषय पर संवाद किया। मिश्र ने कहा, आज के दौर में नेरेटिव ही धारणा बनती है और धारणा अत्यंत शक्तिशाली होती है। जो बात बार-बार दिखाई और सुनाई जाती है, वही धीरे-धीरे समाज की दृष्टि और आदत बन जाती है। गाजा के संदर्भ में भी एक विशेष धारणा गढ़ी गयी है, जिसके आधार पर दुनिया घटनाओं को देखने लगी है। समस्या यह है कि ऐसा दृष्टांत रचा जाता है कि आम व्यक्ति यह समझ ही नहीं पाता कि वास्तव में हो क्या रहा है।

नैरेटिव की कमजोरी एक गंभीर चुनौती
हमारे देश में नैरेटिव की कमजोरी एक गंभीर चुनौती बनती जा रही है। भारत में पिछले कुछ वर्षों के दौरान आर्य आक्रमण सिद्धांत जैसे विचारों को फिर से स्थापित करने का प्रयास हुआ, जिसने देश को वैचारिक रूप से बाँटने का कार्य किया। जबकि डॉ. भीमराव अंबेडकर स्पष्ट रूप से कह चुके थे कि सभी भारतीय मूलतः एक हैं, लेकिन इस तथ्य को लंबे समय तक दबाया गया। आज आवश्यकता इस बात कि है कि भारतीय वैचारिक आधार पर किये जा रहे बंटवारे को समझे। वर्तमान में बॉलीवुड और लोकप्रिय ओटीटी भी समाज के सामने नयी-नयी धारणा प्रस्तुत कर रही है, जिसका सीधा प्रभाव जनमानस पर पड़ रहा है।

इतिहास की किताबें सोच को आकार देती
इतिहास की किताबें इस संदर्भ में अत्यंत महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं, क्योंकि वही पीढ़ियों की सोच को आकार देती हैं। आज देश को एक मजबूत और सक्रिय सूचना-प्रसारण तंत्र की आवश्यकता है। सरकार द्वारा किए जा रहे सकारात्मक कार्यों को प्रभावी ढंग से समाज तक नहीं पहुँचाया जा पा रहा है, जिसके कारण एक सशक्त और सकारात्मक नैरेटिव का अभाव दिखता है। लोग सतर्क रहें, पढ़ें, स्वयं तथ्यों को समझें और यह पहचानें कि आज की आभासी दुनिया में दृष्टि और दृष्टांत के बीच अंतर क्या है। बच्चों को भी इस विषय में जागरूक करना समय की आवश्यकता है।

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