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विफलता को जीवन का स्वभाव मान लेना ही सबसे बड़ी नकारात्मक सोच,जीवन में हमेशा सकारात्मक सोच रखकर आगे बढ़ें – सुधासागर म.सा.

विफलता को जीवन का स्वभाव मान लेना ही सबसे बड़ी नकारात्मक सोच,जीवन में हमेशा सकारात्मक सोच रखकर आगे बढ़ें – सुधासागर म.सा.

दलाल बाग पर चल रहे चातुर्मास अनुष्ठान की महती धर्मसभा में राष्ट्रसंत के प्रेरक आशीर्वचन – 15 से श्रावक संस्कार शिविर

इंदौर। सड़क का निर्माण दुर्घटना के लिए नहीं, हमें अपनी मंजिल तक पहुंचाने के लिए किया जाता है। मनुष्य जीवन भी दुःख और असफलता के लिए नहीं बल्कि सकारात्मक सोच रखकर आगे बढ़ने के लिए मिला है। हमारी सबसे बड़ी नकारात्मक सोच यही होती है कि “मैं असफल हो जाऊंगा”। विफलता को जीवन का स्वभाव मान लेना ही सबसे बड़ी नकारात्मक सोच है। सृष्टि का स्वभाव धर्म है, विफलता नहीं। धर्म शांति और कल्याण देता है। विफल होने का संदेह मन और आत्मा से निकाल देना ही सफलता के मार्ग पर आगे बढ़ने का संकेत है। रायचंद, ज्ञानचंद और हुकमचंद- ये तीनों बिना मांगे सलाह देने वाले प्राणी होते हैं जिनसे हमेशा सावधान रहना चाहिए।

संत शिरोमणि प.पू. विद्यासागर म.सा. के परम प्रभावक शिष्य और राष्ट्रसंत मुनि पुंगव प.पू. श्री सुधासागर महाराज ने शुक्रवार को सकल दिगम्बर जैन धर्म प्रभावना समिति के तत्वावधान में दलाल बाग के विशाल विद्या-सुधा सत्संग मंडप में चल रहे चातुर्मास के दौरान देशभर से आए श्रद्धालुओं को संबोधित करते हुए उक्त दिव्य और प्रेरक विचार व्यक्त किए। मंगलाचरण के साथ सत्संग सभा का शुभारंभ हुआ। चातुर्मास आयोजन समिति के शिवानी-नवीन गोधा, तृप्ति-हर्ष जैन, सपना-मनीष गोधा, अंतिका-आनंद गोधा एवं दीपिका-आकाश जैन कोयला ने सभी साधकों की अगवानी की। संचालन अर्पित जैन ने किया। पर्यूषण महापर्व पर 15 सितम्बर से श्रावक संस्कार शिविर का आयोजन भी होगा जिसके लिए पंजीयन प्रारम्भ हो गए हैं। दलाल बाग पर प्रतिदिन सुबह 8 से 9.30 बजे तक राष्ट्रसंत की अमृत वर्षा का क्रम जारी है।

राष्ट्रसंत ने कहा कि जीवन में प्रत्येक परेशानी का कारण किसी अदृश्य शक्ति, भूत-प्रेत या बाहरी व्यक्ति को मान लेना कतई उचित नहीं है। कई बार हम अपनी विफलताओं के लिए अपनी क्षमता, प्रयास और जिम्मेदारी को देखने के बजाय बाहर दोष खोजते हैं। याद रखें कि परीक्षाएं बच्चों को फ़ैल करने के लिए नहीं, पास कराने के लिए होती है। असफलता कहाँ से और क्यों आती है, इसका कारण खोजने की आवश्यकता है। दृढ संकल्प और निरंतर प्रयास किए जाएं तो असंभव भी संभव हो सकता है। चिड़िया और समुद्र की कहानी से यह सन्देश देते हुए राष्ट्रसंत ने कहा कि हमारे जीवन का सकारात्मक रूप यही है कि “मैं हारने के लिए नहीं बना हूँ, मेरा स्वभाव आगे बढ़ना, प्रयास करना और अपने लक्ष्य तक पहुंचना है” । जीवन में बिना मांगे सलाह देने वाले रायचंद, ज्ञानचंद और हुकमचंद जैसे लोग हर घडी मिलते ही हैं लेकिन उनसे सावधान रहकर अपने अंतर्मन की आवाज पर निर्णय लेना चाहिए।

 

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