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भोलेनाथ की आराधना किसी भी रूप में करें, हमेशा कल्याणकारी रहेगी

भोलेनाथ की आराधना किसी भी रूप में करें, हमेशा कल्याणकारी रहेगी

तिलक नगर क्षेत्र के कृषि विहार उद्यान में चल रहे शिवपुराण ज्ञान यज्ञ में पं. शिवेंद्र कृष्ण शास्त्री के आशीर्वचन

इंदौर । जीवन में श्रद्धा और विश्वास के बिना किसी प्रार्थना, पूजा या अनुष्ठान की सार्थकता नहीं हो सकती। शिव और पार्वती श्रद्धा और विश्वास के प्रतीक हैं। भोलेनाथ की आराधना कहीं भी, कैसे भी करें, हमेशा कल्याणकारी फल देती है। शिव सबसे सरल देव हैं जो केवल जल के अभिषेक से ही प्रसन्न हो जाते हैं। जब तक प्रत्येक व्यक्ति में नारायण का अंश मानने की दृष्टि नहीं आती, हमारी साधना अधूरी ही रहेगी।

तिलक नगर क्षेत्र के कृषि विहार उद्यान स्थित श्री पीपलेश्वर महादेव मंदिर पर चल रही शिव महापुराण कथा में श्रीधाम वृन्दावन के प्रख्यात आचार्य पं. शिवेंद्र कृष्ण शास्त्री ने विभिन्न प्रसंगों की व्याख्या के दौरान उक्त दिव्य विचार व्यक्त किए। कथा में शुक्रवार को पार्वती जन्मोत्सव का प्रसंग मनाया गया। कथा शुभारंभ के पूर्व यजमान समूह की ओर से पिंटू नामदेव-नीता मिश्रा, प्रवीण-कृष्णा पुरोहित, अनीश-पिंकी पाण्डेय, विजय-सीमा मिश्रा, अनिल-सुनीता देशमुख, अनिल-भावना जाट, अभिनय-रचना सोनकर आदि ने व्यासपीठ का पूजन किया। विद्वान वक्ता की अगवानी एमआईसी सदस्य राजेश उदावत, छत्रपाल सोलंकी, संजय खादीवाला एवं विजय मिश्रा सहित सैकड़ों श्रद्धालुओं ने की और शिवपुराण का पूजन भी किया।

संयोजक पिंटू नामदेव ने बताया कि पं. शिवेंद्र कृष्ण शास्त्री 25 अगस्त तक यहाँ प्रतिदिन दोपहर 3 से शाम 6 बजे तक शिवपुराण कथामृत की वर्षा करेंगे। कथा के दौरान शिव-पार्वती विवाह, कार्तिकेय जन्म प्रसंग, तुलसी-जालंधर कथा, शिवरात्रि व्रत कथा, जप का महात्यम सहित भगवान शिवाशिव की आराधना से जुड़े विभिन्न प्रसंगों की संगीतमय व्याख्या होगी। कथा में विभिन्न उत्सव भी मनाए जाएँगे। कथा के दौरान नीता मिश्रा के मनोहारी भजनों पर भक्तों के थिरकने का सिलसिला पहले दिन से ही चल रहा है।

पं. शास्त्री ने पार्वती जन्मोत्सव प्रसंग की व्याख्या करते हुए कहा कि देश, धर्म और ईश्वर के लिए बलिदान देने वाला अमर हो जाता है इसलिए धर्म और ईश्वर के प्रति दृढ़ता का भाव होना चाहिए। हम सब खाली हाथ आए हैं और वैसे ही जाएंगे भी। ईश्वर और धर्म हमेशा हमारे साथ रहते हैं। और कोई साथ दे या न दे, ईश्वर और धर्म मृत्यु के बाद भी हमारे ही साथ रहते हैं। संसार की किसी कामना के लिए धर्म का हनन हो तो वह पाप होता है लेकिन यदि ईश्वरीय कर्म करते हुए मर्यादा का उल्लंघन या ऐसा कुछ हो तो वह पुण्य बन जाता है। पाप का फल दुख है और पुण्य का सुख। पापकर्म भोगते समय मीठा होता है, जबकि पुण्य कर्म भोगते समय कड़वा।

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