पगडंडी कोई भी बना सकता है लेकिन सही रास्ता गुरु और भगवान ही बताएंगे
दलाल बाग में चल रही चातुर्मास की धर्मसभा में राष्ट्रसंत प.पू. सुधासागर म.सा. के प्रेरक और ओजस्वी आशीर्वचन
इंदौर। संसार में पगडंडियाँ अनेक हैं लेकिन मंजिल एक ही है। पगडंडी कोई भी बना सकता है लेकिन सही रास्ता गुरु और भगवान ही बताते हैं। यह भी तय है कि उस रास्ते पर चलना हमें ही पड़ेगा। केवल पूजा-पाठ, मंदिर जाने या धर्मिक क्रियाएँ कर लेने से ही मोक्ष नहीं मिल जाएगा। यदि दिशा गलत है तो बहुत कुछ करने के बाद भी व्यक्ति मंजिल से दूर रह जाता है। संकल्प लें कि यदि हम किसी कमजोरी को नहीं छोड़ पा रहे हैं तो किसी दूसरे को अपने पाप में शामिल नहीं करेंगे। मोक्ष की यात्रा में सबसे पहले अपनी दिशा पहचानना जरुरी है। दिशा की पहचान सच्चे गुरु के मार्गदर्शन से ही संभव है। दिशा सही हो तो गिरकर भी उठ सकते हैं। वहीं सच्चे गुरु मिल जाएं तो भटकने की संभावनाएं शून्य हो जाती हैं। धर्म की सबसे बड़ी विरासत यह होना चाहिए कि हम अपने बच्चों को भी श्रेष्ठ संस्कार प्रदान करें।
ये प्रेरक और ओजस्वी विचार हैं संत शिरोमणि प.पू. विद्यासागर म.सा. के परम प्रभावक शिष्य और राष्ट्रसंत मुनि पुंगव प.पू. श्री सुधासागर महाराज के, जो उन्होंने सकल दिगम्बर जैन धर्म प्रभावना समिति के तत्वावधान में वीआईपी रोड स्थित किला मैदान, दलाल बाग परिसर में निर्मित विद्या-सुधा मंडप में चल रहे चातुर्मास महोत्सव की धर्मसभा में व्यक्त किए। प्रारम्भ में आयोजन समिति की ओर से चक्रवर्ती अध्यक्ष नवीन-शिवानी गोधा, सामाजिक संसद के अध्यक्ष आनंद-अंतिका गोधा एवं आकाश-दीपिका जैन कोयला आदि ने देशभर से आए साधकों की अगवानी की। इस अवसर पर महोत्सव समिति के अध्यक्ष अशोक डोसी, महामंत्री हर्ष जैन, विजय पाटौदी, प्रिंसपाल टोंग्या, इंद्रकुमार-वीणा सेठी, शरद पानोत, सौरभ बडजात्या, मयंक जैन, राजेश गंगवाल, भूपेंद्र भोपाली एवं अभिषेक जैन ने भी सभा की व्यवस्थाओं में सहयोग प्रदान किया। दलाल बाग पर पर्यूषण महापर्व पर 15 सितम्बर से श्रावक संस्कार शिविर का आयोजन भी होगा जिसके लिए पंजीयन प्रारम्भ हो गए हैं। दलाल बाग पर प्रतिदिन सुबह 8 से 9.30 बजे तक राष्ट्रसंत की अमृत वर्षा का क्रम जारी है।
राष्ट्रसंत प.पू. सुधासागर म.सा. ने कहा कि हमारा संकल्प तभी सार्थक होगा, जब हम यह तय करें कि मैं स्वयं भटकूँ तो किसी और को नहीं भटकाऊंगा, मैं स्वयं गिरुं तो किसी और को नहीं गिराऊंगा, मैं अपने दोषों को अपनी अगली पीढ़ी की विरासत नहीं बनाऊंगा और मैं अपने बच्चों को धन सम्पत्ति के साथ धर्म और संस्कार भी दूंगा। अपने जीवनकाल में प्रत्येक व्यक्ति अलग-अलग रास्तों पर चलता है। इस दौरान उसे कई बार आगे बढ़ने अथवा रास्ता समाप्त होने पर वापस लौटने की स्थिति का सामना करना पड़ता है।
सबसे खतरनाक पगडंडी तो यह है कि “मैं अच्छा हूँ और जगत बुरा है”। जब व्यक्ति अपने दोषों को देखना बंद कर दे और हर गलती दूसरे में देखने लगे तो उसके स्वयं के सुधार का मार्ग बंद होने लगता है। दूसरी खतरनाक पगडंडी यह है कि “मैं जैसा हूँ, दुनिया को भी वैसा ही बना दूँ”। स्वयं किसी बुराई में फंस जाना एक बात है लेकिन अपने कारण किसी दूसरे को उसी बुराई में शामिल कर लेना उससे भी ज्यादा खतरनाक है।


