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गलती का बोध होते ही स्वयं को बदल लेना चाहिए, गलती पर अड़े रहना व्यक्ति को पतन की ओर ले जाता है-सुधासागर म.सा.

गलती का बोध होते ही स्वयं को बदल लेना चाहिए, गलती पर अड़े रहना व्यक्ति को पतन की ओर ले जाता है-सुधासागर म.सा.

दलाल बाग पर सकल दिगम्बर जैन धर्म प्रभावना समिति के तत्वावधान में चल रही चातुर्मासिक धर्मसभा में आशीर्वचन

 

इंदौर। धर्म का उद्देश्य मनुष्य को निरंतर भयभीत रखना नहीं बल्कि उसे अपनी भूलों का बोध कराकर सुधार के मार्ग पर ले जाना है। अपनी गलती स्वीकार करना कमजोरी नहीं बल्कि आत्मबल का प्रमाण है। गलती का बोध होते ही स्वयं को बदल लेना चाहिए। गलती पर अड़े रहना व्यक्ति को पतन की ओर ले जाता है। वह स्वयं पर भी विश्वास खोने लगता है। उसे लगता है कि संसार में कोई ईमानदार नहीं है और स्वयं उसके भीतर भी कोई गुण नहीं है लेकिन याद रखें कि दुःख और निराशा के अनुभवों से वैराग्य पैदा होना अलग बात है और संसार के प्रत्येक व्यक्ति को बुरा मान लेना अलग बात है।

ये दिव्य और प्रेरक विचार हैं संत शिरोमणि प.पू. विद्यासागर म.सा. के परम प्रभावक शिष्य और राष्ट्रसंत मुनि पुंगव प.पू. श्री सुधासागर महाराज के, जो उन्होंने गुरुवार को सकल दिगम्बर जैन धर्म प्रभावना समिति के तत्वावधान में वीआईपी रोड स्थित किला मैदान, दलाल बाग परिसर में निर्मित विद्या-सुधा मंडप में चल रहे चातुर्मास महोत्सव में आयोजित नियमित धर्मसभा में संबोधित करते हुए व्यक्त किए।

धर्मसभा का शुभारंभ मंगलाचरण एवं पाद प्रक्षालन के साथ हुआ। राष्ट्रसंत ने अपने प्रवचन में सज्जन और दुर्जन व्यक्ति के स्वभाव, कर्मों के प्रभाव तथा जीवन में आत्मपरिवर्तन के महत्व को समझाते हुए कहा कि सज्जन व्यक्ति गलती समझते ही खुद को बदल लेता है। जब उसे समझ में आ जाता है कि वह जिस मार्ग पर चल रहा है उसका परिणाम अच्छा नहीं होगा तो वह समय रहते उस मार्ग को छोड़ देता है। उसे अपने अहंकार से अधिक सत्य और आत्म कल्याण की चिंता होती है। सच्चा आत्म चिन्तन मनुष्य को अपने दोष देखने की प्रेरणा देता है लेकिन उसे विवेकहीन निराशा में नहीं धकेलता। बार-बार दुःख और धोखा मिलने पर मनुष्य कभी-कभी इतना निराश हो जाता है कि उसे संसार में कुछ भी अच्छा दिखाई नहीं देता। इसके विपरीत दुर्जन व्यक्ति बार-बार समझाने और प्रतिकूल हालात सामने आ जाने और अपने कर्मों के दुष्परिणाम दिखाई देने पर भी अपनी गलती स्वीकार करने को तैयार नहीं होता। वह कहता है कि मुझे जो करना है, करूँगा ही चाहे उसे परिणाम कुछ भी हों। कुछ व्यक्ति संकेत मिलते ही अपनी गलती सुधार लेते हैं जबकि कुछ हठी व्यक्ति कई बार परिणाम भुगतने के बाद भी अपनी गलती समझने को तैयार नहीं होते। कुछ व्यक्ति थोड़ी सी चेतावनी से समझ जाते हैं जबकि अनेक व्यक्ति तो परिस्थितियां विनाशकारी हो जाने के बाद भी नहीं बदलते।

धर्मसभा में देशभर से आए साधकों की अगवानी महोत्सव के चक्रवती अध्यक्ष नवीन गोधा, सामाजिक संसद के अध्यक्ष आनंद गोधा, चक्रवर्ती मनीष गोधा, महोत्सव समिति के अध्यक्ष अशोक डोसी, महामंत्री हर्ष जैन, आकाश कोयला, प्रिंसपाल टोंग्या, गिरीश गिन्नी, संजय पाटोदी, सौरभ बडजात्या, राहुल सेठी एवं भूपेंद्र भोपाली सहित अनेक सहयोगी बंधुओं ने की। राष्ट्रसंत के प्रवचन नियमित रूप से प्रतिदिन सुबह 8 से 9.30 तक धर्मसभा में जारी हैं।

 

 

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