गलत कामों की आलोचना जरुर करें लेकिन अच्छे कार्यों की प्रशंसा भी होना चाहिए – राष्ट्रसंत सुधासागर म.सा.
इंदौर । (दिव्य भूमि)। बुरे कामों की निंदा और अच्छाई की प्रशंसा इसलिए भी जरुरी है कि व्यक्ति के मन में यह भाव आएगा कि मेरे गलत कर्मों से समाज और गुरु के साथ स्वयं अपनी नजरों में भी गिरना पड़ सकता है, वहीं मेरे अच्छे कर्मों की प्रशंसा से दूसरे लोग भी अच्छाई के मार्ग पर चलने के लिए प्रेरित होंगे। कई बार जीवन में ऐसे प्रसंग भी आते हैं जब हमें किसी के भीतर छिपी अच्छाई को पहचानकर बोले गए शब्द उसके जीवन की दिशा बदल देते हैं। समाज में केवल गलतियाँ खोजने की आदत नहीं होना चाहिए। गलत कामों की आलोचना जरुर करें लेकिन व्यक्ति के अच्छे कार्यों की प्रशंसा भी होना चाहिए।
ये दिव्य और प्रेरक विचार हैं संत शिरोमणि प.पू. विद्यासागर म.सा. के परम प्रभावक शिष्य और राष्ट्रसंत मुनि पुंगव प.पू. श्री सुधासागर महाराज के, जो उन्होंने सकल दिगम्बर जैन धर्म प्रभावना समिति के तत्वावधान में छत्रपति नगर स्थित, दलाल बाग परिसर में निर्मित विद्या-सुधा मंडप में चल रहे चातुर्मास महोत्सव की धर्मसभा में शनिवार को सुबह व्यक्त किए। सभा का शुभारंभ मंगलाचरण एवं पाद प्रक्षालन के साथ हुआ। प्रारम्भ में आयोजन समिति की ओर से चक्रवर्ती अध्यक्ष नवीन-शिवानी गोधा, सामाजिक संसद के अध्यक्ष आनंद-अंतिका गोधा, चक्रवर्ती मनीष-सपना गोधा, अध्यक्ष अशोक डोसी, महामंत्री हर्ष-तृप्ति जैन, आकाश जैन कोयला, प्रिंसपाल टोंग्या, संजय पाटोदी, सौरभ बडजात्या, राहुल सेठी एवं भूपेंद्र भोपाली आदि ने साधकों की अगवानी की। धर्मसभा में राष्ट्रसंत के प्रवचनों की अमृत वर्षा सुबह 8 से 9.30 बजे तक नियमित रूप से जारी है।
राष्ट्रसंत प.पू. सुधासागर म.सा. ने ‘आलोचना के साथ प्रोत्साहन भी आवश्यक है’ विषय पर अपने प्रवचन में कहा कि हम दुनिया के बारे में बहुत कुछ जानते समझते हैं। कोई हमें भगवान मानता है, कोई गुरु मानता है लेकिन हमें स्वयं अपने बारे में भी समझना चाहिए। अपने भीतर छिपी अच्छाई को पहचानकर उसे जागृत करना चाहिए। गलत कार्यों के लिए व्यक्ति की आलोचना करना उचित है लेकिन यदि हमेशा ही उसकी आलोचना होती रहेगी और उसके अच्छे कार्यों की कभी प्रशंसा होगी ही नहीं तो वह व्यक्ति आगे बढ़ने का साहस खो देगा। गलत काम के लिए व्यक्ति को दंड मिलना चाहिए लेकिन अच्छे काम के लिए प्रोत्साहन और पुरस्कार भी मिलना चाहिए। आलोचना व्यक्ति को अपनी गलती का अहसास कराती है और प्रशंसा भीतर की अच्छाई को जागृत करती है। प्रोत्साहन व्यक्ति का आत्मविश्वास बढाता है। व्यक्ति को हमेशा उसकी गलतियाँ बताने की बजाय उसकी अच्छाईयां भी बताने का प्रयास करें। हमें आलोचना करने वाला नहीं, अच्छाई को पहचानकर व्यक्ति को सद्कर्मों के लिए प्रोत्साहित करने वाला बनना चाहिए।

