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पृथ्वी से लगभग 500 जंतुओं की प्रजातियां होने वाली है विलुप्त!

‘प्रकृति हमसे नाराज है और पृथ्वी खतरे में’ इस लेख में मौसम केंद्र भोपाल के सेवानिवृत्त मौ.वि.अ डॉ. जी.डी. मिश्रा ने प्रकृति में होने वाले परिवर्तन पर गहन अध्ययन किया है। जिसके द्वारा ये आज की पीढ़ी को आगाह कर रहे है कि अब जल्द ही हमें पर्यावरण संरक्षण को लेकर कोई ठोस उठाना चाहिए। अन्यथा वह दिन दूर नहीं जब इस पृथ्वी पर जीवन यापन मुश्किल हो जाएगा।-

“एक ओर दिन प्रतिदिन मनुष्यों की संख्या बढ़ती जा रही है और आगे चलकर शीघ्र यह 8 अरब से भी अधिक हो जाएगी पर दुख इस बात का है कि पृथ्वी पर शेष प्रजातियां खतरे में है और उनकी संख्या दिन प्रतिदिन घटती जा रही है| पक्षियों ,मछलियों ,उभयचर और सरीसृप वर्ग के जंतुओं में वर्ष 1970 से 2018 के बीच दो तिहाई की कमी आ गई है। यही सब चलता रहा तो अगले 20 वर्षों के दौरान पृथ्वी से लगभग 500 जंतुओं की प्रजातियां विलुप्त हो जाएगी।
वर्ल्ड वाइल्डलाइफ  फंड और जूलॉजिकल सोसाइटी ऑफ़ लंदन द्वारा संयुक्त रूप से एक रिपोर्ट प्रकाशित की है। लिविंग प्लैनेट रिपोर्ट के अनुसार दुनिया भर में जंतुओं की संख्या पिछले वर्षों के दौरान औसतन 69 प्रतिशत कम हो गई है इसका सबसे बड़ा कारण जंगलों को बड़े पैमाने पर काटा जाना है, जबकि मनुष्य की उपभोक्तावाद आदते और सभी तरह के प्रदूषण, दूसरे मुख्य कारण है ।

हम ही है ग्लोबल वार्मिंग के जिम्मेदार
भीषण गर्मी के लिए भी भले हम ग्लोबल वार्मिंग को जिम्मेदार मानते रहे परंतु सच्चाई यह है कि कंक्रीट की भरमार वनों की कटाई, भूस्खलन और औद्योगीकरण गतिविधियां जीवाश्म ईंधन के बेतहाशा प्रयोग के प्रति हम कभी भी गंभीर नहीं रहे|  अधिक लालच से प्रेरित होकर मानवीय गतिविधियों ने धरती के सामान्य तापमान में 1.1 डिग्री सेल्सियस की वृद्धि कर दी है, जिसका प्रभाव न केवल भारत, बल्कि दुनिया भर में महसूस किया जा रहा है| भीषण गर्मी से जंगलों में लगने वाली आग एवं पिघलते ग्लेशियर इस समस्या को और अधिक गंभीर बना रहे हैं | भीषण गर्मी मानव स्वास्थ्य, बिजली, पानी, खाद उत्पादन आदि समस्याओं को बढ़ा रही है| निर्माण एवं अन्य क्षेत्रों में कार्य करने वाले श्रमिकों एवं कृषि में संलग्न आबादी को कई घंटे गर्मी के संपर्क में रहना पड़ता है जिससे उनकी उत्पादकता घटकर आधी रह गई है| अंतर्राष्ट्रीय श्रम संगठन के अनुसार उच्च तापमान के कारण वर्ष 2020-2021 में वैश्विक स्तर पर 470 बिलियन श्रम घंटे की हानि हुई है|

तपती गर्मी लोगों के स्वास्थ्य को खतरा
मानव की इच्छाओं और चाहतों का अंतहीन सिलसिला आज मानव के अस्तित्व के लिए संकट खड़ा कर रहा है, अंतर्राष्ट्रीय श्रम संगठन भीषण गर्मी को वैश्विक स्वास्थ्य खतरे के रूप में परिभाषित करता है| एक रिपोर्ट के अनुसार तपती गर्मी लोगों के स्वास्थ्य को समान रूप से प्रभावित नहीं करती, सबसे अधिक प्रभाव महिलाओं, बच्चों, बुजुर्गों, पहले से अस्वस्थ लोगों को पड़ता है, जिनकी प्रतिरक्षा प्रणाली कमजोर होती है| भीषण गर्मी से अनेक प्रकार के बुखार, दिल की बीमारियां, अस्थमा, एलर्जी, ब्रोंकाइटिस, एक्जिमा जैसी समस्याएं बढ़ रही हैं| धूल और प्रदूषण की बढ़ोतरी और जल संबंधी संक्रामक बीमारियों का प्रसार बढ़ने लगा है, मच्छरों की आबादी में वृद्धि से मलेरिया, डेंगू, अन्य कीट जनित संक्रमण रोगो का खतरा बढ़ गया है|
बढ़ते तापमान से बिगड़ता मानसिक स्वास्थ्य
सबसे ज्यादा खराबहालत तो गरीब और झुग्गी में रहने वाले लोगो की हैं क्योंकि उनके पास बिजली की सही उपलब्धता नहीं है ना ही पानी की| कम साफ सफाई के कारण बीमारियों के संक्रमण से मृत्यु दर का जोखिम भी बढ़ रहा है विश्व स्वास्थ्य संगठन की रिपोर्ट के अनुसार जलवायु परिवर्तन के कारण प्रतिवर्ष कम से कम 1 लाख 50 हजार मौत होती है, यह संख्या 2030 तक दुगनी होने की उम्मीद है| स्वास्थ्य विशेषज्ञों का मत है कि अधिक तनाव में जी रहे मनुष्य के मानसिक स्वास्थ्य पर भी तापमान के बढ़ने का प्रभाव पड़ता है|

नियंत्रित करना होगा धरती का तापमान
धरती के बढ़ते तापमान को नियंत्रित करने के लिए ग्रीनहाउस गैसों के उत्सर्जन को कम करने के अलावा अन्य कोई विकल्प नहीं है, इसके लिए आवश्यक अल्पकालिक उपायों,  वनीकरण जैसे दीर्घकालिक उपायों पर एक साथ काम कर, ग्रीनहाउस गैस में जैसे कार्बन डाइऑक्साइड, मेथेन, नाइट्रस ऑक्साइड और क्लोरो कार्बन गैसों के उत्सर्जन को कम करना होगा। ऊर्जा स्रोतों के नवीनीकरण को महत्व देना होगा, स्मार्ट कृषि तकनीक को प्रसारित करना होगा,

लोगों में ग्लोबल उष्णता के विषय में जागरूकता पैदा करनी होगी और सुरक्षित जीवन शैली अपनानी होगी| जलवायु परिवर्तन से संबंधित पेरिस समझौते का लक्ष्य वैश्विक तापमान में होने वाली बढ़ोतरी को 1.5 डिग्रीसेल्सियस तक सीमित रखना था। परंतु इस दिशा में विश्व के देश बहुत गंभीर नहीं है स्वास्थ्य जोखिमों को देखा जाए तो उसको सही ढंग से निपटने के लिए समग्र दृष्टिकोण अपनाना होगा जिससे सभी मंत्रालय की सहभागिता के साथ-साथ राजनीतिक स्वास्थ्य से जुड़े लोगों नीति निर्माता, एन जी ओ आदि को शामिल करना चाहिए| संक्रामक रोगों के संबंध में जानकारी को आदमी तक पहुंचाने के लिए नवीन तकनीकी एवं डिजिटल प्लेटफॉर्म को बढ़ावा देना चाहिए| हमको मानवीय और तकनीकी के सम्मिलित प्रयासों द्वारा नई निगरानी वीडियो विशेषण तरीकों से स्वास्थ्य के लिए काम करनाहोगा, जिससे भीषण गर्मी से प्रभावित आदमी के स्वास्थ्य पर पड़ने वाले नकारात्मक प्रभाव को प्राथमिक स्तर पर सुलझाया जा सके।

कृषि भूमि का विस्तार जैव विविधता प्रभावित
हम बात करें पृथ्वी की जो की एक बहुत बड़े खेत में तब्दील होती जा रही है और कृषि भूमि के विस्तार के कारण जैव विविधता बुरी तरह प्रभावित हो रही है| भूमि उपयोग में परिवर्तन के कारण दुनिया में कार्बन डाइऑक्साइड उत्सर्जन में वृद्धि हो रही है जो तापमान वृद्धि में सहायक है| यूनिवर्सिटी आफ मैरीलैंड के भूगोल विभाग के वैज्ञानिकों के अनुसार पिछलेकेवल20 सालों के दौरान सन 2000 से लेकर 2019 के बीच पृथ्वी पर 10 लाख वर्ग किलोमीटर से अधिक ऐसे भूभाग पर खेती की शुरुआत की गई जहां पहले खेती नहीं होती थी इन नए क्षेत्रों में मुख्य तौर पर गेहूं,धान, मक्का, सोयाबीन और पाम तेल की खेती की जा रही है| खेती के क्षेत्र में अधिकता उत्तरी गरीब देश में हो रही है जहां अमीर देश का पेट भरने के लिए खेती की जा रही है।

अमीर देशों का पेट भर रहे गरीब देश
औद्योगिक देश अपनी जरूरत के लिए गरीब देश में कृषि को बढ़ावा दे रहे हैं, जिससे अमीर देश का पर्यावरण सुरक्षित रहे पानी की बचत हो और महंगे मानव संसाधन से बच सकें| जिन क्षेत्रो में खेती की जा रही है उसमें से आधे से अधिक क्षेत्र वन क्षेत्र या फिर प्राकृतिक स्थिति तंत्र का हिस्सा था, इससे एक तरफ तो जैव विविधता प्रभावित हो रही है वहीँ दूसरी तरफ  तापमान वृद्धि का संकट होता जा रहा है।जिससेपृथ्वी पर मनुष्य के लिए एक बहुत बड़ा संकट खड़ा हो रहा है| दुनिया में कितनी कृषि भूमि है इसका सही आकलन करना कठिन है, क्योंकि अधिकतर अध्ययन केवल छोटे दायरे में किए जाते हैं संयुक्त राष्ट्र संघ का फूड एवं एग्रीकल्चर ऑर्गेनाइजेशन इसके आंकड़े रखता तो है पर इसके लिए हर एक सदस्य देश पर निर्भर करता है हर एक देश में इसका आंकलन अलग तरीके से किया जाता है।

जैविक विनाश की तरफ बढ़ रहे है हम
एक अध्ययन के अनुसार वर्तमान दौर में पृथ्वी अपने इतिहास के छठवें जैविक विनाश की तरफ बढ़ रही है इससे पहले लगभग 44 करोड़  वर्ष पहले,36 करोड़,25 करोड़, 20 करोड़और 30 करोड़ वर्ष पहले ऐसा दौर आ चुका है, पर उस समय सब कुछ प्राकृतिक था और लाखों वर्षों के दौरान हुआ था। इन सब की तुलना में वर्तमान दौर में सब कुछ एक शताब्दी के दौरान ही हो गया वर्तमान दौर में केवल विशेष ही नहीं बल्कि सामान प्रजातियां भी खतरे में है इसका कोई कारण प्राकृतिक नहीं है बल्कि  मानव जनसंख्या का बढ़ता बोझ है और उसके द्वारा प्राकृतिकसंसाधनों का विनाश है| आज हालात यह है कि लगभग सभी प्रजातियों के 50% से अधिक सदस्य पिछले दो  दशकों के दौरान ही  कम हो गए है| अगले 20 वर्षों के दौरान पृथ्वी से लगभग 500 जंतुओं की प्रजातियां विलुप्त हो जाएगी। जबकि पिछली पूरी शताब्दी के दौरान उनकी प्रजातियां विलुप्त हुई थी। वैज्ञानिकों के अनुसार यह सब मनुष्य के हस्तक्षेपके कारण हो रहा है, अपने  सामान्य दौर में इतनी प्रजातियों को विलुप्त होने में लाखों वर्ष बीत जाते हैं ।

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