Eternal Hinduism

हिन्दू सन्तों एवं साधुओं का सर्वोच्च संगठन अखिल भारतीय अखाड़ा परिषद

अखिल भारतीय अखाड़ा परिषद, भारत में हिन्दू सन्तों एवं साधुओं का सर्वोच्च संगठन है। इसमें १४ अखाड़े सम्मिलित हैं जिनमें निर्मोही अखाड़ा (जो रामजन्मभूमि मामले में पक्षकार हैं) तथा श्री दत्तात्रेय अखाड़ा दो प्रमुख अखाड़े हैं।
साधु-संतों का दिव्य संसार, अखाड़ों की रहस्यमयी परंपरा, इतिहास, कब और कैसे  हुई शुरुआत | Jansattaधर्म की रक्षा के लिए बने थे अखाड़े
हिंदू मान्यताओं पर गौर करें, तो आदि शंकराचार्य द्वारा कुछ ऐसे संगठन तैयार किए गए थे, जो शस्त्र विद्या का ज्ञान जानते थे। उन्होंने इन संगठनों को हिंदू धर्म की रक्षा के लिए तैयार किया और इन्हें अखाड़ों का नाम दिया। ऐसे में इन अखाड़ों में शामिल साधु-संत हिंदू धर्म के पवित्र ग्रंथों की रक्षा करने के साथ धार्मिक स्थलों की भी रक्षा करते हैं। साथ ही, उनके द्वारा परंपराओं का भी संरक्षण किया जाता है, जिससे आने वाले पीढ़ी भारतीय संस्कृति और इसके संस्कार को जान सके।

अखाड़ा परंपरा का इतिहास
अखाड़ा परंपरा की शुरुआत प्राचीन भारतीय संस्कृति में तब से मानी जाती है जब साधुओं और तपस्वियों ने ध्यान और साधना के लिए संगठित रूप से ये केंद्र बनाए। माना जाता है कि अखाड़ा परंपरा महाभारत और रामायण काल से जुड़ी हुई है, तब धर्म, तपस्या और साधना के लिए समर्पित समूहों का अस्तित्व था। परंपरागत् रूप से इन अखाड़ों का उद्देश्य साधुओं को एकजुट करना और उन्हें धर्म, योग, और तपस्या के माध्यम से समाज में जागरूकता फैलाने के लिए प्रेरित करना था। ऐसी भी मान्यता है कि अखाड़ा व्यवस्था शंकराचार्य द्वारा स्थापित की गई थी जिसका उद्देश्य सनातन धर्म को पुनर्जीवित करना और उसे एक संगठित रूप में प्रस्तुत करना था।

भारत में कितने हैं प्रमुख अखाड़े
भारत में कुल 13 प्रमुख अखाड़े हैं, जो कि उदासीन, शैव और वैष्णव पंथ के संन्यासियों के हैं। इसमें 7 अखाड़े शैव संन्यासी संप्रदाय के हैं, तो बैरागी वैष्णव संप्रदाय के तीन अखाड़े हैं। वहीं, शेष तीन अखाड़े उदासीन संप्रदाय के हैं। इन अखाड़ों का इतिहास सदियों पुराना बताया जाता है, जो कि भारत की संस्कृति में स्वर्ण की तरह हैं। बड़े-बड़े धार्मिक अनुष्ठानों में इन अखाड़ों की महत्ता देखने को मिलती है। अब एक और अखाड़ा जुड़ गया है जिसमें किन्नर अखाड़ा भी अपना अब इसमें शामिल है।

निरंजनी अखाड़ा-
यह अखाड़ा 826 ईस्वी में गुजरात के मांडवी में स्थापित हुआ माना जाता है। इनके ईष्ट देव भगवान शंकर के पुत्र कार्तिकस्वामी हैं। इनमें दिगम्बर, साधु, महन्त व महामंडलेश्वर होते हैं। इनकी शाखाएं इलाहाबाद, उज्जैन, हरिद्वार, र्त्यंबकेश्वर व उदयपुर में हैं।

जूना अखाड़ा- ऐसी मान्यता है कि यह अखाड़ा 1145 में उत्तराखण्ड के कर्णप्रयाग में स्थापित हुआ। इसे भैरव अखाड़ा भी कहते हैं। इनके ईष्ट देव रुद्रावतार दत्तात्रेय हैं। इसका केंद्र वाराणसी के हनुमान घाट पर माना जाता है। हरिद्वार में मायादेवी मंदिर के पास इनका आश्रम है। इस अखाड़े के नागा साधु माने जाते हैं और वर्तमान में साधू समाज का यही सबसे बड़ा अखाड़ा माना जाता है।महानिर्वाण अखाड़ा- यह अखाड़ा 681 ईस्वी में स्थापित हुआ माना जाता है। कुछ लोगों का मत है कि इसकी स्थापना बिहार-झारखण्ड के बैजनाथ धाम में हुआ था, जबकि कुछ इसका जन्म स्थान हरिद्वार में नील धारा के पास मानते हैं। इनके ईष्ट देव कपिल महामुनि हैं। इनकी शाखाएं इलाहाबाद, हरिद्वार, उज्जैन, त्र्यंबकेश्वर, ओंकारेश्वर और कनखल में हैं।

अटल अखाड़ा- यह अखाड़ा 569 ईस्वी में गोंडवाना क्षेत्र में स्थापित किया गया बताया जाता है। इनके ईष्ट देव भगवान गणेश हैं। यह सबसे प्राचीन अखाड़ों में से एक माना जाता है। इसकी मुख्य पीठ पाटन में है लेकिन आश्रम कनखल, हरिद्वार, इलाहाबाद, उज्जैन व त्र्यंबकेश्वर में भी हैं।

आह्वान अखाड़ा- माना जाता है कि यह अखाड़ा 646 में स्थापित हुआ और 1603 में पुनर्संयोजित किया गया। इनके ईष्ट देव श्री दत्तात्रेय और श्री गजानन हैं। इस अखाड़े का केंद्र स्थान काशी है। इसका आश्रम ऋषिकेश में भी है।

आनंद अखाड़ा- इस अखाड़े की स्थापना 855 ईस्वी में मध्यप्रदेश के बेरार में मानी जाती है। इसका केंद्र वाराणसी में है। इसकी शाखाएं इलाहाबाद, हरिद्वार, उज्जैन में भी हैं।

 पंचाग्नि अखाड़ा- ऐसी मान्यता है कि इस अखाड़े की स्थापना 1136 में हुई थी। इनकी इष्ट देव गायत्री हैं और इनका प्रधान केंद्र काशी है। इनके सदस्यों में चारों पीठ के शंकराचार्य, ब्रहमचारी, साधु व महामंडलेश्वर शामिल हैं। परंपरानुसार इनकी शाखाएं इलाहाबाद, हरिद्वार, उज्जैन व त्र्यंबकेश्वर में हैं।

गोरखनाथ अखाड़ा- गोरखपंथियों के अनुसार यह अखाड़ा ईस्वी 866 में अहिल्या-गोदावरी संगम पर स्थापित हुआ। इनके संस्थापक पीर शिवनाथजी हैं। इनका मुख्य दैवत गोरखनाथ है और इनमें बारह पंथ हैं। यह संप्रदाय योगिनी कौल नाम से प्रसिद्ध है और इनकी त्र्यंबकेश्वर शाखा त्र्यंबकमठिका नाम से प्रसिद्ध है।

वैष्णव अखाड़ा- यह बालानंद गैर शैव अखाड़ा ईस्वी 1595 में दारागंज में श्री मध्यमुरारी में स्थापित हुआ। समय के साथ इनमें निर्मोही, निर्वाणी, खाकी आदि तीन संप्रदाय बने। इनका अखाड़ा त्र्यंबकेश्वर में मारुति मंदिर के पास था। 1848 तक शाही स्नान त्र्यंबकेश्वर में ही हुआ करता था। परंतु 1848 में शैव व वैष्णव साधुओं में पहले स्नान कौन करे इस मुद्दे पर झगड़े हुए। श्रीमंत पेशवाजी ने यह झगड़ा मिटाया। उस समय उन्होंने त्र्यंबकेश्वर के नजदीक चक्रतीर्था पर स्नान किया।

उदासीन पंचायती बड़ा अखाड़ा- इस संप्रदाय के संस्थापक श्री चंद्रआचार्य उदासीन हैं। इनमें सांप्रदायिक भेद हैं। इनमें उदासीन साधु, मंहत व महामंडलेश्वरों की संख्या ज्यादा है। उनकी शाखाएं शाखा प्रयाग, हरिद्वार, उज्जैन, त्र्यंबकेश्वर,भदैनी, कनखल, साहेबगंज, मुलतान, नेपाल व मद्रास में है।

उदासीन नया अखाड़ा- इसे बड़ा उदासीन अखाड़ा के कुछ सांधुओं ने विभक्त होकर स्थापित किया। इनके प्रवर्तक मंहत सुधीरदासजी थे। इनकी शाखाएं प्रयाग, हरिद्वार, उज्जैन, त्र्यंबकेश्वर में हैं।

निर्मल पंचायती अखाड़ा- यह अखाड़ा 1784 में अपनी स्थापना मानता है। सन् 1784 में हरिद्वार कुंभ मेले के समय एक बड़ी सभा में विचार विनिमय करके दुर्गासिंह महाराज ने इसकी स्थापना की। इनकी ईष्ट पुस्तक श्री गुरुग्रन्थ साहिब है। इनमें सांप्रदायिक साधु, मंहत व महामंडलेश्वरों की संख्या बहुत है। इनकी शाखाएं प्रयाग, हरिद्वार, उज्जैन और त्र्यंबकेश्वर में हैं।

निर्मोही अखाड़ा- निर्मोही अखाड़े की स्थापना 1720 में रामानंदाचार्य ने की थी। इस अखाड़े के मठ और मंदिर उत्तर प्रदेश, उत्तराखण्ड, मध्यप्रदेश, राजस्थान, गुजरात और बिहार में हैं। पुराने समय में इसके अनुयायियों को तीरंदाजी और तलवारबाजी की शिक्षा भी दिलाई जाती थी

किन्नर अखाड़ा- यह अखाड़ा भारत में एक अनोखा धार्मिक और सामाजिक संगठन है, जो ट्रांसजेंडर समुदाय के अधिकारों और उनकी सांस्कृतिक पहचान को मजबूत करने के उद्देश्य से स्थापित किया गया है। इसकी स्थापना 2015 में आचार्य महामंडलेश्वर लक्ष्मी नारायण त्रिपाठी ने की थी। किन्नर अखाड़ा न केवल ट्रांसजेंडर समुदाय के धार्मिक अधिकारों को मान्यता देने का प्रयास करता है, बल्कि उन्हें समाज में सम्मानजनक स्थान दिलाने के लिए भी काम करता है। इसके माध्यम से किन्नर समुदाय सामाजिक, आध्यात्मिक और सांस्कृतिक स्तर पर अपनी उपस्थिति और योगदान को सामने लाने का प्रयास करता है।

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