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मां नर्मदा की गोद में ‘मरहम’ का खजाना,संरक्षण के लिए नहीं उठे ठोस कदम

मां की गोद में जैसे हर दर्द की दवा होती है वैसे ही मां नर्मदा की गोद में कई औषधियों को भंडार है। नर्मदा के किनारे वनों में कई तरह की औषधियों के पौधे पाए जाते है। जिनके सरंक्षण को लेकर अब तक कोई ठोस कदम नहीं उठाए गए है। नर्मदा अंचल के वन न केवल जैव विधिता की दृष्टि से समृद्ध हैं बल्कि कुछ मायनों में अद्वितीय भी हैं। नर्मदा की आठ बार परिक्रमा कर चुके बरेली के निवासी आर्चाय रजनीश द्विवेदी ने बताया कि उन्होने नर्मदा की आठ बार परिक्रमा की है। जिसमें उन्होने मां नर्मदा के कई तरह के अनुभव प्राप्त किए है। जो कि अदभूद है। इस दौरान उन्होने औषधियों को लेकर जो पाया वह हमें बताया

हिमालय के जैसे वन है यहां
भारत में साल के वनों की दक्षिणी सीमा और सागौन के वन यहाँ एक साथ मिलते हैं । ये वन हिमालय और पश्चिमी घाट के बीच में स्थित जैव विविधता से परिपूर्ण गलियारे जैसे हैं। यहाँ अचानकमार से पेंच तक तथा सतपुडा-बोरी से मेलघाट तक दुर्लभ प्राणी और वनस्पतियाँ आज भी पाए जाते हैं । इन वनों में पाये जाने वाले अनेक औषधीय पौधे आज भी गाँवों की परम्परागत चिकित्सा पद्धति का महत्वपूर्ण अंग हैं ।

गुल-बकावली से भरा अमरकण्टक

अमरकण्टक के वनों में अनेक प्रकार के औषधीय पौधों की भरमार है । यहाँ गुल-बकावली का प्रसिद्ध पौधा भी मिलता है जिसके अर्क को आंखों के रोगों में, विशेषकर मोतियाबिन्द के इलाज में काफी प्रभावशाली बताया जाता है परंपरागत भारतीय तथा चीनी उपचार पद्धति में गुल-बकावली का उपयोग काफी होता है ।

औषधियों से भरे पड़े है वन
मां नर्मदा के किनारे स्थित वनों में औषधिय पौधों की पहचान रखने वाले वैद्य बताते हैं कि इस जंगल में जो जड़ी बूटी पाई जाती है वो नागदामिनी औषधीय पौधा भी है। यहां मिलने वाली जड़ी बूटी में ग्रह दोष नाशक, वात ज्वर नाशक, विष हरण के गुण हैं जिससे दूसरों की जिंदगी बचाई जा सकती है।

ये दुर्लभ औषधियां है मौजूद
यहां के वनों में कालमेघ (चिरैता) त्रिदोष नाशक, कुष्ठरोग नाशक, विदोष ज्वर, रक्त पित नाशक, क्षय रोग व कीटाणु नाशक बताया जाता है। इसी तरह सफेद मूसली, कामराज, काली मूसली, विलराकंद, अगुसा, कालिहारी, वृद्धितकी, चित्रक, अपराजिता, अमलताश, सुदर्शन, कांगिनी, एकांगी समेत सैकड़ों प्रजाति के औषधीय पौधों से नर्मदा तट के जंगल अच्छादित है। ये जड़ी बूटी विभिन्न रोगों को दूर करने के साथ शारीरिक वर्धक, पौरूष शक्ति बढ़ाने में भी अचूक हैं ।

ऐसे है औषधियों के गुण
बरेली के आर्चाय रजनीश द्विवेदी ने नर्मदा के वनों में कुछ जड़ी बूटीयों के नाम और औषधीय गुणों ऐसे है कि –

1.कामराज : धातुवर्धक, वाजीकरण, नपुंसकता, शुक्राणुवर्धक

2.अपराजिता : कुष्ठ रोग, शोध रोग, नष्टावर्त, असभरीहर, यौन दोष

3.सफेद मूसली : वृजवर्धक, शुक्रकारक, वाजीकरण, पुष्टता कारक, हदयरोग, नपुंसकता नाशक

4.काली मूसली : दुग्ध वर्धक, लिंग वर्धक, केश काला

5.विलरा कंद: – शोथहर, हदयबल, रक्तचाप, मूलक, हुदावर्धक, स्मरीनाशक

6.अंकोल : रक्त वर्ग नाशक, त्वचादोष नाशक, रक्त विकार, सर्पविष नाशक, स्थूल नाशक

7.कलिहारी : कुष्ठ रोग, वर्षानाशक, शोथहर
8.चित्रक : पितवर्धक, गांठ, अस्थूल कारक, दर्दनाशक काय गोला

9.वृश्चिकी : रक्तचाप, मूत्रक, रचमा, वात ज्वर नाशक

10.बाराही कंद : कब्जनाशक, बवासीर नाशक, क्षुधावर्धक

11.अमलताश : दस्त, कब्जनाशक, कुष्टनाश, वातनाश

12.सुदर्शन : कप पित्त नाशक, कंठ दोष नाशक

13.कालमेघ (चिरैता): त्रिदोष नाशक, ज्वरनाशक, क्षय रोग नाशक, फीताकृति दोषनाशक, केशवर्धक

14.लांगिनी : सर्वविष नाशक, भूतनाशक, विषहर, कुष्ठनाशक

15.एपोत्री : लक्ष्मीदायक, धनदायक

1200 वनस्पतियां की गई है दर्ज
पंचमढी और छिंदवाडा में देलाखारी के पास पाया जाने वाला साल वन यहाँ की उल्लेखनीय विशेषता है। इस क्षेत्र की एक अन्य विशेषता यह है कि यहां मध्यप्रदेश के प्रमुख वन प्रकारों में से दो, साल तथा सागौन दोनों का मिलन स्थल होता है । साल की विशेष उल्लेखनीय उपस्थिति के साथ-साथ पंचमढी क्षेत्र से लगभग 1200 वनस्पति प्रजातियाँ दर्ज की गई हैं जिनमें से कुछ प्रजातियों की प्रकृति हिमालय पर्वत की वनस्पतियों जैसी है जबकि कुछ अन्य पश्चिमी घाट के वनों जैसी, पंचमढी की वनस्पति में कुछ ऐसे विशिष्ट पौधे भी हैं जिनके वनस्पतिक कुल में वही एक प्रजाति है ।

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