अखिलेश यादव को चुनाव लड़ने की जरूरत ही क्या है, जब मुख्यमंत्री की कुर्सी पहले से सपनों में आरक्षित है-डॉ. संतोष वाधवानी
खुली आंखों से स्वप्न देखने की पराकाष्ठा भी पार कर दी सपा प्रमुख ने
इंदौर। भाजपा नेता एवं सांसद प्रतिनिधि डॉ. संतोष वाधवानी ने समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव के उस बयान पर व्यंग्यात्मक प्रतिक्रिया व्यक्त की है, जिसमें उन्होंने कहा है कि वे 2027 का विधानसभा चुनाव नहीं लड़ेंगे, बल्कि सीधे मुख्यमंत्री पद की शपथ लेंगे।
डॉ. वाधवानी ने कहा कि अखिलेश यादव का राजनीतिक आत्मविश्वास देखकर लगता है कि अब लोकतंत्र में चुनाव लड़ना और जनता से वोट मांगना शायद एक पुरानी परंपरा हो गई है। जब मुख्यमंत्री बनने का सपना सीधे देखा जा सकता है, तो फिर जनता के बीच जाकर चुनाव लड़ने की मेहनत क्यों की जाए!
उन्होंने कटाक्ष करते हुए कहा कि अभी चुनाव की तारीखें भी तय नहीं हुई हैं, जनता ने अपना फैसला भी नहीं सुनाया है, लेकिन मुख्यमंत्री पद की शपथ का कार्यक्रम पहले ही मन में तय हो चुका है। ऐसा आत्मविश्वास तो शायद शेयर बाजार में भी नहीं मिलता, जहां बिना निवेश किए मुनाफे की गारंटी दी जा रही हो!
डॉ. वाधवानी ने कहा कि लोकतंत्र कोई पारिवारिक विरासत या निजी संपत्ति नहीं है, जहां पद और कुर्सियां अपनी इच्छा से तय कर ली जाएं। मुख्यमंत्री बनने का सपना देखना हर किसी का लोकतांत्रिक अधिकार है, लेकिन उस सपने को साकार करने के लिए जनता का विश्वास और बहुमत आवश्यक होता है।
उन्होंने व्यंग्य करते हुए कहा कि अखिलेश यादव को चाहिए कि वे अपने कार्यकर्ताओं को भी बता दें कि वे चुनाव प्रचार की तैयारी छोड़कर सीधे शपथ ग्रहण समारोह की तैयारियां शुरू कर दें। आखिर जब नेता जी ने मुख्यमंत्री बनने का संकल्प ले ही लिया है, तो कार्यकर्ताओं को भी इस सपने में सहभागी बनना चाहिए!
डॉ. वाधवानी ने कहा कि भारतीय लोकतंत्र में जनता ही सर्वोच्च है। यहां मुख्यमंत्री की कुर्सी किसी नेता की व्यक्तिगत इच्छा से नहीं, बल्कि संवैधानिक प्रक्रिया और जनादेश से मिलती है। इसलिए राजनीति में आत्मविश्वास अच्छी बात है, लेकिन अति आत्मविश्वास कभी-कभी जनता के वास्तविक मूड से दूरी भी पैदा कर देता है।
लोकतंत्र में मुख्यमंत्री बनने का सपना देखना आसान है, लेकिन जनता के दिल में जगह बनाना और उसका जनादेश प्राप्त करना ही असली राजनीति है।

