*चढ़ावे भले कम लो, लेकिन पाप का त्याग अवश्य करो – मुनि प्रशम विजयजी म.सा.*
*संतति का दान धर्मशासन की सबसे बड़ी प्रभावना – मुनि डॉ. सिद्धरत्न विजयजी म.सा.*
*350 से अधिक आयंबिल की आराधना कर श्रावक-श्राविकाओं ने रचा नया कीर्तिमान*
*इंदौर, एयरपोर्ट रोड स्थित श्री केसरी वाटिका में आयोजित *द्विशताब्दी गुरुराज स्पर्श चातुर्मास–2026* के अंतर्गत शाश्वत नवपद ओलीजी आराधना के आठवें दिन चरित्रपद की आराधना श्रद्धा, भक्ति और भावनाओं के विशेष वातावरण में संपन्न हुई। इस अवसर पर मुनि श्री प्रशम विजयजी म.सा. ने धर्मसभा को संबोधित करते हुए कहा कि *जीवन में चढ़ावे भले ही कम लो, लेकिन पापों का त्याग अवश्य करो।* सच्चे धर्म की शुरुआत अपने जीवन की बुराइयों को छोड़ने और सदाचार अपनाने से होती है। वहीं, मुनि डॉ. सिद्धरत्न विजयजी म.सा. ने धर्मशासन की प्रभावना में संतति के योगदान को महत्वपूर्ण बताते हुए कहा कि नई पीढ़ी को धर्म और संस्कारों से जोड़ना शासन की सबसे बड़ी प्रभावना है।
*चरित्रपद की आराधना में भावविभोर हुआ श्रावक समाज*
ओलीजी आराधना के आठवें दिन का दृश्य अत्यंत भावपूर्ण रहा। सैकड़ों श्रावक-श्राविकाओं ने गच्छाधिपति पूज्य श्रीमद् विजय नित्यसेनसूरीश्वरजी महाराज साहब सहित संपूर्ण मुनिमंडल एवं साध्वी मंडल की तीन बार प्रदक्षिणा कर उनके चरित्र, तप, त्याग और संयम की वंदना की। तपस्वी साधु-साध्वियों के प्रति श्रद्धा और समर्पण से ओतप्रोत इस दृश्य ने उपस्थित श्रद्धालुओं को भावविभोर कर दिया। अनेक श्रद्धालुओं की आंखें नम हो गईं। यह दृश्य जैन धर्म में गुरु भक्ति, चारित्रिक साधना और तपस्या के प्रति समाज की गहरी आस्था का प्रतीक बना।
*तप, त्याग और संयम से मिलती है आत्मकल्याण की प्रेरणा*
मुनि श्री ने विश्वपूज्य प्रभु श्रीमद् विजय राजेंद्रसूरीश्वरजी महाराज साहब, मोहनखेड़ा एवं मेंगलवा की तपस्या और आत्मबल का उल्लेख करते हुए कहा कि महान तपस्वियों का जीवन त्याग, सहनशीलता और दृढ़ संकल्प का अनुपम उदाहरण है। भीषण गर्मी और विपरीत परिस्थितियों में भी साधु-साध्वियां अपनी साधना, संयम और चरित्र के प्रति अडिग रहते हैं। उनकी तपस्या हमें आत्मकल्याण के मार्ग पर आगे बढ़ने की प्रेरणा देती है।
उन्होंने कहा कि आचार्य भगवंतों की वास्तविक पहचान उनके आचरण, चरित्र और संयम से होती है। जीवन में श्रद्धा के साथ सम्यक् ज्ञान और सदाचार भी आवश्यक हैं। जिस प्रकार किसी व्यक्ति को मार्ग पर आगे बढ़ने के लिए सही दिशा और प्रकाश की आवश्यकता होती है, उसी प्रकार आध्यात्मिक जीवन में सम्यक् दर्शन के साथ सम्यक् ज्ञान और सदाचार का होना भी जरूरी है।
*पापों का त्याग ही सच्चे धर्म की शुरुआत*
मुनि श्री ने प्रतिज्ञा, नियम और धार्मिक जीवन में नियमितता का महत्व समझाते हुए कहा कि प्रत्येक व्यक्ति को अपनी क्षमता के अनुसार धर्माराधना करनी चाहिए, लेकिन पापों से बचने का दृढ़ संकल्प कभी नहीं छोड़ना चाहिए। धार्मिक अनुष्ठानों के साथ जीवन में सदाचार और नैतिकता को अपनाना आवश्यक है। स्नात्र पूजा का महत्व बताते हुए उन्होंने महाराजा कुमारपाल का उदाहरण दिया और श्रद्धालुओं को धर्माराधना में नियमितता, निष्ठा और समर्पण बनाए रखने की प्रेरणा दी।
*दीक्षा के भाव से जागृत होता है वैराग्य*
दीक्षा और वैराग्य की प्रेरणा का प्रसंग सुनाते हुए मुनि श्री ने बताया कि साधु-साध्वियों के दर्शन तथा दीक्षा समारोहों में सहभागिता से व्यक्ति के भीतर त्याग और संयम के संस्कार जागृत होते हैं। छोटे-छोटे बच्चों को संयम मार्ग अपनाते देखकर भी व्यक्ति अपने जीवन की दिशा बदलने की प्रेरणा प्राप्त कर सकता है। उन्होंने गृहस्थ जीवन में बारह व्रतों को स्वीकार कर धर्ममय जीवन की शुरुआत करने की प्रेरणा दी।
*संतति और संपत्ति का धर्मकार्य में हो सदुपयोग*
मुनि डॉ. सिद्धरत्न विजयजी म.सा. के संदेश के अनुरूप धर्मशासन की प्रभावना में संतति और संपत्ति के सदुपयोग को महत्वपूर्ण बताया गया। नई पीढ़ी में धार्मिक संस्कार विकसित करना, साधु-साध्वियों की सेवा करना तथा उनके बताए मार्ग पर चलना प्रत्येक श्रावक-श्राविका का दायित्व है। महान साधु भगवंतों ने अपने तप, त्याग और संयम से जैन धर्म की गौरवशाली परंपरा को आगे बढ़ाया है। इस परंपरा को अक्षुण्ण बनाए रखना समाज के प्रत्येक सदस्य का कर्तव्य है।
*350 से अधिक आयंबिल की आराधना, लाभार्थियों ने लिया धर्मलाभ*
मीडिया समन्वयक राजेश जैन युवा ने बताया कि चतुर्दशी पर्व पर श्रावक-श्राविकाओं ने तप और त्याग के प्रति अपनी गहरी आस्था व्यक्त करते हुए 350 से अधिक आयंबिल की आराधना की। भोजन समिति के सदस्य गजेंद्र सकलेचा, मनीष संघवी, नरेंद्र राणापुर, मनोज-सनोज जैन एवं संदीप जैन ने बताया कि बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं द्वारा आयंबिल तप करना आयोजन की विशेष उपलब्धि रही। आज के आयंबिल के लाभार्थियों में श्रीमती सुशीलादेवी, भेरूलालजी, नीराजजी, सुषमाजी, नितिनजी, जयाजी एवं सुराणा परिवार शामिल रहे।
*आगामी धार्मिक कार्यक्रम एवं आरती*
आयोजन के अंतर्गत 15 नवंबर को कृतज्ञता समारोह आयोजित किया जाएगा। वहीं, आदिनाथ मांगलिक भवन में रात्रि 9 से 12 बजे तक विशिष्ट आराधना संपन्न हुई, जिसमें केवल बहनों को प्रवेश दिया गया। आज की आरती का लाभ श्री सुभाषजी पोरवाल (रतलाम-इंदौर) ने लिया। चरित्रपद की आराधना के आठवें दिन आयोजित धर्मसभा ने श्रद्धालुओं को तप, त्याग, संयम और सदाचार के मार्ग पर आगे बढ़ने की प्रेरणा दी। *पापों का त्याग, धार्मिक संस्कारों का प्रसार और नई पीढ़ी को धर्म से जोड़ना ही जैन शासन की सच्ची प्रभावना है।*
बहुमान के लाभार्थी राकेजी जैन पार्श्वनाथ ने बागरा राजस्थान से पधारे रमेशजी, नैनावा से हसमुख भाई एवं परतुर महाराष्ट्र से गौतमजी कोचट्टा का बहुमान किया।

