मुकेश नेमा मध्य प्रदेश में एडिशनल कमिश्नर, एक्साइज हैं। हर मुद्दे पर पैनी नज़र बनाए रखने वाले मुकेश नेमा संवेदनशील लेखक भी हैं। अपने दोस्त ओपी श्रीवास्तव जी को नर्मदा यात्रा पर जाते समय यह शुभकामनाएं देने उनके आश्रम पहुंचे। इसके बाद पैदल यात्रा पर प्रकाश डालता यह लेख बहुत ही अर्थ पैदल यात्रा के निकालता तो आइए हम जानते है कि क्या है इस लेख में –
“आप पैदल चलेंगे या नही ,कितना चलेंगे,आमतौर पर ये आपका पेट तय करता है।पेट खाली हो तो चलिए पैदल और ज्यादा खा चुके हों तो भी पैदल चले बिना कोई चारा नही।पर पेट के अलावा और भी वजहें होती है पैदल चलने की। पदयात्रा की बड़ी हैसियत।दुनिया आपकी तरफ तवज्जो नही दे रही।भज नही रही आपकी कही कोई सुनवाई नही।आप विरोध दर्ज करवाना चाहते हैं ,तो पैदल चलना बेहद फ़ायदेमंद होता ही है।पैदल चलना भूख हड़ताल टाईप की चीज।भूख को पैदल चलने से जोड़ते है हम।मान लेते है कि यदि कोई पैदल चल रहा है तो भूखा है।अब भूख बस पेट की तो होती नही।ये पैसे की ,नाम की ,यश और सम्मान की भी हो सकती है।ज़ाहिर है पैदल चलने के मकसद ढेर सारे है।
परमार्थ के लिए भी चला जाता है पैदल।किसी और के हित को विचार कर पैदल चलना यशस्वी करता है यात्री को।अध्यात्मिक ,राजनैतिक,व्यापारिक धार्मिक,तरह तरह की पदयात्राएं होती ही रहती है। तारीख मे कुछ पद यात्राएँ बडी मशहूर हुई। आदि शंकराचार्य ने सनातन धर्म को पुनः प्रतिष्ठित करने के लिए पूरा भारत पाँव पैदल नाप दिया। बुद्ध भी पैदल चले और नानक भी। इन महापुरुषों के पैदल चलने से दुनिया को नया दर्शन मिला।बुद्ध से प्रभावित ढेरों चीनी यात्री पाँव पाँव भारत आए और हमारा बहुत सारा ज्ञान चुरा कर ले गए।ईसा और मोहम्मद साहब भी पैदल चले और दुनिया उनके पीछे चल पडी।बेऔलाद शंहशाह अकबर आगरा से नंगे पाँव पैदल चले फ़तेहपुर सीकरी तक। सलीम चिश्ती जैसे बडे सूफी संत के आगे माथा टेका उन्होंने। संत ने आशीर्वाद दिया भी। नतीजन सलीम पैदा हुए। फिर गांधीजी की दांडी यात्रा कौन भूल सकता है ? एक बूढ़े दुबले पतले आदमी ने पैदल चल कर उस बिट्रिश हुकूमत के पाये हिला दिए जिसके राज मे कभी सूरज नही डूबता था।
कुछ चाहिए तो पैदल चलना बुरा नही। और कुछ न मिले तो अच्छी सेहत और ठीक ठाक ब्लडप्रेशर तो मिल ही जाता है पैदल चलने से। हमारे यहाँ ये भी मान्यता कि पैदल चलने से भगवान प्रसन्न हो जाते हैं ,शंकर जी को जल चढ़ाने के लिए भी लंबी लंबी यात्राएँ करते है भक्त और नर्मदा नदी की परिक्रमा करने का भी बहुत चलन है।
नर्मदा अकेली नदी जिसकी परिक्रमा की जाना शास्त्र सम्मत हैं। नर्मदा वह जिसके दर्शन करने भर से गंगा नहाने का पुण्य प्राप्त होता है। ये शंकर की पुत्री हैं ,ऐसे में भक्त इसके किनारे बसे किसी तीर्थ के एक किनारे से पैदल चलना शुरू करते है। इसे बिना पार किए भडौच तक पहुंचते है ,नर्मदा को सागर में मिलते देखते हैं और फिर नर्मदा के दूसरे किनारे से चलते हुए ,यात्रा प्रारंभ करने के स्थान पर आकर परिक्रमा समाप्त करते है। यह तीन हजार तीन सौ किलोमीटर लंबी दुर्गम और रोमांचक यात्रा है। नर्मदा पदयात्रियों के लिए भोजन आवास की निःशुल्क व्यवस्था समुचित दूरी पर उपलब्ध है ,फिर भी बिरले ही इसे करने का बीड़ा उठाते है।
मुझे इस बात की खुशी है कि मेरे दोस्त ओमप्रकाश श्रीवास्तव आजकल सपत्नीक नर्मदा परिक्रमा कर रहे है। यह पदयात्रा उन्हें और अधिक निर्मल परिष्कृत और छरहरा करे ,वो यात्रा समय प्राप्त अपनी लंबी श्वेत दाढ़ी के साथ यथाशीघ्र वापस लौटें। अपने गरिष्ठ ज्ञान से हमारी बदहजमी का निमित्त बनें। मेरी शुभकामनाएँ हमेशा उनके साथ है।”


