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तपस्थली माने जाते है मां नर्मदा के तट,  मां गंगा भी करती नर्मदा स्नान

आधुनिक युग में मां नर्मदा को चाहे मात्र एक नदी माना जाए लेकिन आज भी नर्मदा का आध्यात्मिक महत्व जानने वाले मां नर्मदा के नदी नहीं शक्ति मानते है। मां नर्मदा के तटो को तपस्थली माना जाता है। नर्मदा के तट पर की गई साधना कई गुना ज्यादा फल देती है। यही कारण है कि नर्मदा के तटों पर लाखों साधु संत तपस्या में लीन है जो दृश्य नहीं है परंतु मान्यता यह है कि इसी के तट पर की गई साधना सफल होती है।

मां गंगा रोज ब्रह्म मुहूर्त में लगाती है डूबकी

ओंकारेश्वर के एक पुजारी ने मां नर्मदा का महत्व बताते हुए कहा कि मां नर्मदा के भगवान शिव के पसीने से प्रकट हुई है इसलिए मां नर्मदा के तट को तपस्थली माना जाता है। जिन संतो को तप करना होता है वह नर्मदा के किनारे आते है। इसी के चलते साधुओं की तपस्थली है मां नर्मदा और जिन साधुओं को मोक्ष प्राप्त करना होता है वह मां गंगा के तटों पर जाते है। नर्मदा की महत्ता इतनी है कि मां गंगा स्वयं मां नर्मदा में डूबकी लगाती है। इनका तो यह तक कहना है कि मां गंगा बुजूर्ग महिला का रूप धारण करके नित्य मां नर्मदा में डूबकी लगाती है। इस घटना को स्वयं एक संत ने अपनी आंखो से देखा है। जब वह नर्मदा के तट पर साधना करते थे तो नित्य एक बुढ़ीं मैया नदी में नहाने आती थी। इस पर संत ने मां के चरणों में गिर कर पूछा कि वह कौन है तो उन्होने कहा मैं गंगा हूं। कलयूग में शुद्दि करण के लिए नर्मदा में डूबकी लगाने आते हूं। ऐसी मां नर्मदा की महिमा है जो संत अपने अपने शब्दों में करते है।

संत करते है तपस्या
मां नर्मदा को वैराग्य प्रदायिनी कहा जाता है। मां नर्मदा के तट पर तपस्या करने के दौरान किसी भी तरह का माया मोह जागृत नहीं होता है इसलिए संत लोग मां नर्मदा के किनारे तपस्या करते है। ऐसा भी माना जाता है कि मां नर्मदा ने काम को जीत लिया था इसलिए मां नर्मदा के तट पर यदि तपस्या की जाए को काम पर स्वतं ही विजयी हो जाती है। मां नर्मदा वैराग्य दे देती है इसलिए संत मां नर्मदा के तट पर तपस्या करते है।

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