Divinity

दक्षिण का कैलाश है यह ज्योतिर्लिंग… जहां विराजते है भगवान शिव के साथ माता पार्वती

“दक्षिण का कैलाश” कहा जाने वाला यह ज्योतिर्लिंग मल्लिकार्जुन ज्योतिर्लिंग है, जो आंध्र प्रदेश में कृष्णा नदी के तट पर एक पहाड़ी पर स्थित है।, जहाँ भगवान शिव (अर्जुन) माता पार्वती (मल्लिका) के साथ विराजते हैं और शिव-शक्ति की एक साथ पूजा की जाती है।  इस पर्वत को दक्षिण का कैलाश भी कहा जाता है। इस पवित्र स्थान का वर्णन महाभारत, पद्म पुराण, और शिव पुराण आदि ग्रन्थों में भी किया गया है। यह ज्योतिर्लिंग सभी ज्योतिर्लिंगों में सबसे अलग है, क्यूंकि इस ज्योतिर्लिंग में भगवान शिव के साथ माता पार्वती भी विराजमान हैं।
ज्योतिर्लिंग के साथ है शक्ति पीठ
यह 52 शक्ति पीठों में से एक है। देवी भ्रामराम्बा के मंदिर को बावन शक्तिपीठों में से एक माना जाता है। ऐसी मान्यता है कि इस स्थान पर माता सती के होंठ का ऊपरी हिस्सा गिरा था। शक्ति पीठ और ज्योतिर्लिंग एक ही स्थान पर होने के कारण यह स्थान हिंदुओं के लिए और भी अधिक महत्वपूर्ण स्थान है।

ऐसा है मंदिर का इतिहास
सातवाहन राजवंश के शिलालेखों के साक्ष्य हैं जो मंदिर को दूसरी शताब्दी से अस्तित्व में रखते हैं। अधिकांश आधुनिक परिवर्धन विजयनगर साम्राज्य के राजा हरिहर प्रथम के समय में किए गए थे । वीरशेरोमंडपम और पाथलगंगा सीढ़ियों का निर्माण रेड्डी साम्राज्य के समय में किया गया था। मंदिर परिसर 2 हेक्टेयर में फैला है और इसमें चार प्रवेश द्वार हैं जिन्हें गोपुरम के नाम से जाना जाता है। मंदिर में कई मंदिर हैं, जिनमें मल्लिकार्जुन और भ्रमरम्बा के मंदिर सबसे प्रमुख हैं।
मंदिर परिसर में कई हॉल हैं; सबसे उल्लेखनीय विजयनगर काल के दौरान निर्मित मुख मंडप है। मंदिर पूर्व की ओर मुख करके स्थित है। केंद्र के मंडप में कई स्तंभ हैं, जिनमें नादिकेश्वर की एक विशाल मूर्ति है। मन्दिर परिसर में कई मूर्तियां हैं जो एक दूसरे के ऊपर उठी हुई हैं। मुख मंडप, गर्भगृह की ओर जाने वाला हॉल, में जटिल रूप से नक्काशीदार स्तंभ हैं।

एक सहस्र लिंग का मिलता है वर्णन
जिस मंदिर में मल्लिकार्जुन को रखा गया है उसे मंदिर में सबसे पुराना माना जाता है माना जाता है कि यहाँ एक सहस्र लिंग (1000 लिंग) है, जिसे राम ने बनवाया था और पाँच अन्य लिंग हैं जिन्हें पांडवों ने बनवाया था। पहले परिसर में एक दर्पण हॉल में नटराज की छवियाँ हैं ।

मंदिर के दर्शन से नहीं होता पुनर्जन्म
श्रीशैल खंडम् में लिखा है कि ‘श्रीशैल शिखरम् दृष्ट पुनर्जन्म न विध्यते।’ इसका अर्थ है कि श्रीशैल शिखर का दर्शन करने वाले का पुनर्जन्म नहीं होता है। यानी वह जीवन-मृत्यु के चक्र से मुक्ति पा जाता है। कृष्णा नदी को यहां पाताल गंगा कहा जाता है। नदी तक पहुंचने के लिए 852 सीढ़ियां उतरनी पड़ती हैं। इसी नदी के पानी से शिवलिंग को स्नान कराया जाता है।

प्रलय के बाद भी रहेगा यह स्थान
श्रीशैलेश्वर लिंग के समान इस भूमंडल में कोई दूसरा लिंग नहीं है। ब्रह्मांड में प्रलय के बाद भी रहने वाला भगवान शिव का एकमात्र धाम श्रीशैल क्षेत्र है। यहां पर कुमार, अगस्त्य, वशिष्ठ, लोपामुद्रा, व्यास महर्षि, गर्ग महर्षि, दुर्वासोमा महर्षि, मन्मधुडु, शंकरचार्युलु जैसे कई ऋषि, तपस्वियों ने साधना की है। भगवान श्री राम, पांडव के अलावा रावण और हिरण्यकश्यप जैसे असुर भी भोलेनाथ की भक्ति के लिए यहां पहुंचे थे।

कैलास जैसा आनंद पाते हैं यहां भोलेनाथ
श्रीशैल खंडम अस्थि में नियतावासः कैलास इति सर्वधा भुवि श्रीपर्वतथो नाम सह सर्वसुरोत्तमै। अत्र मे हृदयं देवी यधा पृथिमापगथम न ठाधा रामथे तत्र कैलासे कामदायनि।

इसका अर्थ है- हे पार्वती, हर कोई जानता है कि मैं केवल कैलास में रहता हूं। लेकिन, पृथ्वी पर एकमात्र स्थान, जो मुझे खुशी देता है वह श्रीशैल की पहाड़ी है। देवी! मेरा हृदय श्रीशैलम में उसी प्रकार आनंद से भर जाता है, जैसे कैलास पर्वत पर आनंद से लहराता है।

पुत्र को मनाने के लिए प्रकट हुए थे भगवान शिव
पौराणिक मान्यता के अनुसार कहा जाता है कि एक बार भगवान गणेश और कार्तिकेय जी के बीच इस बात पर विवाद हो गया कि पहले किसका विवाह किया जाए। इस समस्या के समाधान के लिए हुए भगवान शिव और माता पार्वती के पास गए, तब उन्होंने दोनों को एक कार्य सौंपा, कहा कि जो भी दोनों में से इस संसार की सबसे पहले परिक्रमा कर हमारे पास आएगा उसका विवाह पहले किया जाएगा।

भगवान कार्तिकेय अपने वाहन मोर में सवार होकर पृथ्वी के चक्कर लगाने के लिए चले गए, लेकिन भगवान गणेश जी का वाहन मूसक था, तो वो सोच में पड़ गए कि वह कैसे पृथ्वी के चक्कर कार्तिकेय जी से पहले लगा सकते हैं। इसलिए उन्होंने सोच-विचार किया और माता पार्वती और भगवान शिव को आसन पर बैठने के लिए कहा। जब दोनों आसन पर बैठ जाते हैं तो वह अपने माता-पिता की सात बार परिक्रमा करते हैं और फिर वह अपने माता-पिता को कहते हैं कि मेरे लिए आप ही संसार है, यदि मैं आपकी परिक्रमा कर रहा हूं तो आप समझ लीजिए मैंने संसार की परिक्रमा कर ली। तो इस बात को सुन कर माता पार्वती और भगवान शिव अति प्रसन्न होते हैं और वो भगवान गणेश जी का विवाह पहला करवा देते हैं। लेकिन जब कार्तिकेय जी पृथ्वी की परिक्रमा करके वापस लौटते हैं और वह देखते हैं कि गणेश जी का विवाह हो चुका है तो वह अपने माता-पिता पर क्रोधित होते हैं और क्रोध में आकर हो वहां से दूर क्रोंच पर्वत पर चले जाते हैं। सभी देवी देवताओं के कहने पर भी वह वापस कैलाश नहीं लौटते।

तब माता पार्वती और भगवान शिव पुत्र वियोग में बहुत दुखी हो जाते हैं और माता पार्वती और भगवान शिव क्रोंच पर्वत पर जाने का निर्णय लेते हैं। जैसे ही कार्तिकेय जी को इस बात की खबर लगती है, तो वह उस पर्वत से और दूर चले जाते हैं और फिर भगवान शिव और माता पार्वती अपने पुत्र को देखने के लिए ज्योति का रूप धारण करते हैं, जहां पर उनकी ज्योति विराजमान होती है उसे ही मल्लिकार्जुन ज्योतिर्लिंग के नाम से जाना जाता है।

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