Rajasthan

महाराणा प्रताप के शोर्य की धरा- अरावली जिसे मुगल गुलाम नहीं बना पाए उसे मिटाने में लगी हैं भाजपा सरकार

उदयपुर सहित पूरे मेवाड़ अंचल में अरावली पर्वतमाला को लेकर जनभावनाएं उफान पर हैं. यह वही पर्वत माला है जिसमें रह कर महाराणा प्रताप ने घास की रोटी खाई लेकिन मुगलों के सामने घुटने नहीं टेके आज उसी अरावली को भाजपा की सरकार विकास के नाम पर मिटाने में लगी है। राजस्थान को ऐसा विकास नहीं चाहिए जो राजस्थान के गौरव को मिटा दे। यह वहीं पर्वत मालाएं है जिनके कारण मेवाड़ कभी मुगलों से हार नहीं पाया आज माइनिंग के लिए इस पर्वत माला की बलि चढ़ाना क्या इतना जरूरी है। यह वह पेड़-पौधे नहीं है जिसे सरकार फिर से उगा सकती है। सरकार यदि इस तरह से पर्यावरण को उजाड़ रही है तो क्या होगा इस देश का यह यक्ष प्रश्न आज हर राजस्थान के वासी पूछ रहा है। सबसे आश्चर्य की बात तो यह है कि यह सब तब हो रहा है जब प्रदेश में भाजपा की सरकार है जो इतिहास का गुणगान करके पूरे देश में तो  वोट बटोर रही है लेकिन राजस्थान को रेगिस्तान बनाने पर तुली है।
पर्यावरण से खेलना मंहगा पड़ेगा हमें
सुप्रीम कोर्ट के हालिया फैसले के बाद आम जनता, इतिहासकार और पर्यावरणविद् एक सुर में अरावली बचाने की मांग कर रहे हैं. लोगों का मानना है कि अरावली केवल ऐतिहासिक धरोहर नहीं, बल्कि राजस्थान को रेगिस्तान बनने से रोकने वाली प्राकृतिक ढाल है. यदि पहाड़ियों की कटाई हुई तो पर्यावरण संतुलन और आने वाली पीढ़ियों पर गंभीर असर पड़ेगा। जो आज प्रकृति हमें मुफ्त दे  रही है उसे हम अपने ही हाथों से उजाड़ रहे है। यह कैसा विकास है इस अब रोक देना ही इस देश को बचाने जैसा है अन्यथा प्रकृति के प्रकोप से हमें कोई नहीं बचा पाएंगा।

शोर्य का प्रतीक है अरावली
अरावली पर्वतमाला केवल पत्थरों और पहाड़ियों का समूह नहीं, बल्कि यह राजस्थान की आत्मा, शौर्य और स्वाभिमान की प्रतीक मानी जाती है. राणा प्रताप, राणा सांगा और शूरवीर चेतक की वीरगाथाओं की साक्षी रही अरावली को लेकर सुप्रीम कोर्ट के हालिया फैसले के बाद उदयपुर सहित पूरे मेवाड़ अंचल में जनभावनाएं उफान पर हैं. शहरवासियों का कहना है कि अरावली का अस्तित्व खत्म हुआ तो राजस्थान धीरे-धीरे रेगिस्तान में तब्दील हो जाएगा. उदयपुर में आम जनता, समाजसेवी, इतिहासकार और पर्यावरण प्रेमी एक सुर में अरावली को बचाने की मांग कर रहे हैं.

पर्यावरण संतुलन की रीढ़ है अरावली
सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर लगातार पोस्ट, वीडियो और अपील के जरिए फैसले के विरोध में आवाज बुलंद की जा रही है. लोगों का मानना है कि अरावली केवल इतिहास का हिस्सा नहीं, बल्कि यह आज भी प्रदेश के पर्यावरण संतुलन की रीढ़ है. इतिहासकार एवं मेवाड़ राजपरिवार से जुड़े डॉ. आज़ाद शत्रु शिवरत्रि का कहना है कि अंग्रेज इतिहासकार कर्नल जेम्स टॉड ने भी अपनी पुस्तक में अरावली पर्वतमाला के महत्व को रेखांकित किया है. उनके अनुसार, अरावली पश्चिमी रेगिस्तान को रोकने वाली प्राकृतिक दीवार है. यदि इन पहाड़ियों को काटा गया तो राजस्थान का पूरा प्राकृतिक तंत्र बिगड़ जाएगा, जिसका असर आने वाली पीढ़ियों को भुगतना पड़ेगा।
शोर्य की गाथा पर यह कैसा विकास
उदयपुर के समाजसेवियों का कहना है कि राणा सांगा से लेकर महाराणा प्रताप तक की शौर्य गाथाएं आज भी अरावली की पहाड़ियों पर अंकित हैं. ऐसे में इन पहाड़ियों को केवल विकास के नाम पर खत्म करना दुर्भाग्यपूर्ण है. उन्होंने बताया कि अरावली की पूरी श्रृंखला आपस में जुड़ी हुई है, जिसका सबसे ऊंचा शिखर गुरु शिखर है. यदि एक कड़ी भी कमजोर की गई तो इसका असर पूरे प्रदेश पर पड़ेगा. वहीं शहरवासियों का कहना है कि राजस्थान की धरती बलिदान की धरती रही है. खेजड़ी के पेड़ की रक्षा के लिए सैकड़ों लोगों ने अपने प्राण न्यौछावर कर दिए थे, तो फिर अरावली जैसी अमूल्य धरोहर के लिए संघर्ष क्यों नहीं किया जाए. लोगों का दावा है कि 90 प्रतिशत से अधिक अरावली पहाड़ियां 90 मीटर से नीचे आती हैं. यदि इन्हें काटने की अनुमति दी गई तो अरावली का अस्तित्व ही समाप्त हो जाएगा.
वन्य संपदा की कमी से बढेंगे मानव-वन्यजीव संघर्ष
पर्यावरणविदों ने यह भी चिंता जताई कि पहले ही वन्य संपदा की कमी के कारण जंगली जानवर आबादी की ओर बढ़ रहे हैं. यदि पहाड़ों की कटाई शुरू हुई तो वन्यजीवों का संकट और गहराएगा, जिससे मानव-वन्यजीव संघर्ष बढ़ना तय है. जनता के बीच यह सवाल भी उठ रहा है कि क्या देश वास्तव में विकास की ओर बढ़ रहा है या विनाश की दिशा में. लोगों का आरोप है कि कुछ माफिया और स्वार्थी तत्व अपने निजी लाभ के लिए प्राकृतिक संपदा को नुकसान पहुंचा रहे हैं, जो शर्मनाक है. जब जापान और चीन 2050 के लक्ष्य के साथ पर्यावरण संरक्षण को प्राथमिकता दे रहे हैं, तो भारत पीछे क्यों जा रहा है.

क्या है सुप्रीम कोर्ट का फ़ैसला
उदयपुर में सोशल मीडिया संगठनों और नागरिक समूहों ने मांग की है कि सुप्रीम कोर्ट के फैसले पर पुनर्विचार किया जाए.साथ ही केंद्र और राज्य सरकार से अपील की गई है कि वह विकास के साथ-साथ प्रकृति संरक्षण को भी समान महत्व दें, ताकि अरावली जैसी ऐतिहासिक और प्राकृतिक धरोहर आने वाली पीढ़ियों के लिए सुरक्षित रह सके. सुप्रीम कोर्ट के फैसले के अनुसार, अरावली क्षेत्र की वे पहाड़ियां जो 90 मीटर से कम ऊंचाई की श्रेणी में आती हैं, उन पर खनन और व्यावसायिक गतिविधियों की अनुमति से जुड़ा निर्णय दिया गया है. इस फैसले के बाद पर्यावरण प्रेमियों और आम जनता में चिंता बढ़ गई है, क्योंकि लोगों का मानना है कि अरावली की अधिकांश पहाड़ियां इसी श्रेणी में आती है.

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