Eternal Hinduism

जगद्गुरु रामानंदाचार्य की 726 वीं जयंती पर हंसदास मठ में वैदिक मंत्रोच्चार के साथ पूजन के बाद पुष्पांजलि अर्पित की

इंदौरी(विनोद गोयल)  ‘जात पात पूछे नहीं कोई, हरि को भजे जो हरि को होई’ जैसी कालजयी मान्यता के संस्थापक जगद्गुरु स्वामी रामानंदाचार्य की 726 वीं जयंती के उपलक्ष्य में शनिवार को पीलियाखाल एयरपोर्ट रोड स्थित प्राचीन हंसदास मठ पर महामंडलेश्वर श्रीमहंत रामचरण दास महाराज के सानिध्य में वैदिक मंत्रोच्चार के बीच पूजन एवं आरती कर उनके चित्र पर पुष्पांजलि समर्पित की गई। इस मौके पर महामंडलेश्वर जी ने कहा कि जगद्गुरु स्वामी रामानंदाचार्य ऐसे महान संत थे जिन्होंने काशी में मुग़ल शासकों को नाकों चनें चबवा दिए थे। उनके शौर्य के सामने मुगल शासकों को शरण लेकर माफ़ी भी मांगना पड़ी थी।

प्रेरक जीवन चरित्र पर डाला प्रकाश 
हंसदास मठ पर आयोजित इस कार्यक्रम में मुख्य रूप से महामंडलेश्वर भगवानदास महाराज, महंत यजत्रदास, महंत अमित दास, चुनमुन बाबा, अनिकेत पाठक, राजेश शास्त्री, मनमोहन स्थापक सूरज तिवारी सहित अनेक संत विद्वान मौजूद थे जिन्होंने वैदिक मंत्रोच्चार के बीच जगद्गुरु रामानंदाचार्य के चित्र का पूजन एवं आरती कर उन्हें पुष्पांजलि समर्पित की। मठ के महामंडलेश्वर पवनदास महाराज ने भी जगद्गुरु के प्रेरक जीवन चरित्र पर प्रकाश डाला और कहा कि रामानंदाचार्यजी प्रभु राम की भक्ति में जीवंत पर्यन्त लीन रहे। उन्होंने रामानंद सम्प्रदाय की स्थापना ऐसे समय में की जब लोग धर्म से दूर हो रहे थे। उन्होंने सामाजिक समरसता का सन्देश फैलाया और महिलाओं सहित संत कबीरदास, सूरदास एवं रविदास जैसे संतों को भी अपना शिष्य बनाया।

मुस्लिमों ने माफ़ी मांगी
मुग़ल शासकों ने तो काशी में घंटे घडियाल बजाने पर मंदिरों में रोक लगा दी, तब रामानंदाचार्य जी ने पंचगंगा गुफा में से नमाज के समय मुस्लिमों को फटकारा तो मुस्लिमों ने माफ़ी मांगी और घंटे घड़ियाल बजाने की अनुमति प्रदान की। उल्लेखनीय है कि तत्कालीन समाज में जो तीन प्रमुख धर्मगुरु हुए हैं उनमें जगद्गुरु रामानंदाचार्य को सनातन धर्म का संस्थापक और संरक्षक माना जाता है। कार्यक्रम में हंसदास विद्यापीठ के वेदपाठी बटुक भी बड़ी संख्या में शामिल हुए। प्रसाद वितरण के साथ समापन हुआ।

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