इंदौर। पुरे प्रदेश में 1 अप्रैल से दुध 5 रूपए प्रति लीटर मंहगा हो गया है। दुध को लेकर एक बड़ा संकट सामने आने वाला है। क्योकि लगातार प्रदेश में दुध का उत्पादन कम हो रहा है। इसका एक प्रमुख कारण ग्रामीण क्षेत्रों में दुध उत्पादन में लगातार कमी आना है। जिसके पीछे कई कारण है। जहां दुध उत्पादकों, दुध विक्रेताओं के बीच भी जहां खींचतान चलती रहती है। दुध विक्रेता जहां दुध में फेट की कमी से जुझते हुए फेट के हिसाब से कीमत तय करते है। दुध उत्पादक इस फेट के अनुसार कीमत तय करने से नाराज ही रहते है।

गर्मी में घट जाती है दुध की मात्रा
गर्मी के दिनों में दुधारू पशुओं से मिलने वाले दुध की मात्रा कम हो जाती है। जहां एक पशु 10 लीटर दुध देता है। वहीं पशु गर्मी में अधिकतम साढ़े सात लीटर दुध देता है। इसके पीछे का कारण यह होता है कि गर्मी के दिनों में पशुओं को खिलाने वाला हरा चारा नहीं मिलता है। गर्मी के दिनों में दुधारू पशुओं को भूसा खिला कर दुध लेने का प्रयास किया जाता है। भूसा खिलाने से पशुओं का दुध नहीं बैठता है। याने कम निकलता है। गर्मी के दिनों में यदि पशुओं को खली, कपास्या खिलाया जाए तो पशुओं का दुध अधिक मिलने के साथ ही दुध का फैट भी अधिक बैठता है। लेकिन खली और कपास्या की कीमत आसमान छू रही है। वर्तमान में खली और कपास्या की कीमत 3 तीन हजार रूपए प्रति बोरी पड़ रही है। एक बोरी में लगभग 70 किलों खली और कपास्या आता है। ऐसे में किसान और दुध उत्पादक दुधारू पशुओं को चापड, भूसा आदि खिला कर ही दुध लेते है। जिससे दुध की मात्रा कम हो जाती है।
प्रदेश में दुध के अलग-अलग रेट
इंदौर-भोपाल में दुध के रेट में भारी उतार चढ़ाव देखने को मिलता है। जिसमें इंदौर की अपेक्षा भोपाल में दुध अधिक मंहगा होता है। इसके पीछे मालवा की काली मिट्टी और भोपाल के आगे लाल मिट्टी का होना भी दुधारू पशुओं की दुध देने की क्षमता को प्रभावित करती है। दुधारू पशुओं का गर्मी से बचाव भी अत्यधिक जरूरी है। गर्म प्रदेशो में दुध का उत्पादन कम होता है। जिससे दुध का भाव अधिक होता है।
अब समझते है फेट का गणित
दुध में जितना अधिक फैट होता है उतना अधिक मावा और घी बैठता है। याने निकलता है। फैट अधिक होने से दुध में गाढ़ा पन होता है और दुध विक्रेता फैट अधिक वाले दुध से जहां ग्राहकों को अधिक मलाई युक्त दे पाते है। वहीं उसमें मुनाफा भी होता है।
दुध उत्पादकों का रजिस्ट्रेशन नहीं
प्रदेश में लगातार दुध उत्पादन से किसानों का मोह छूट रहा है। किसानों का कहना है कि दुध उत्पादन में अब कोई लाभ नहीं है। क्योकि जहां पशुओं की कीमते लगातार बढ़ रही है यहीं पशु लगातार दुध नहीं देते है। पशुओं के दुध देने की क्षमता मात्र 6 महीने ही होती है। इसके बाद पशु दुध देना बंद कर देता है ऐसे में बिना दुध देने वाले पशु को पालन दुध उत्पादकों के लिए संभव नहीं होता। ऐसे में लगातार दुध उत्पादक कम हो रहे है। सबसे बड़ी विंडबना यह है कि प्रदेश सरकार भी अब तक पशुपालन के क्षेत्र में रूचि दिखाने वालों का कोई लेखा-जोखा नहीं रख रही है। इंदौर शहर के आसपास के ग्रामीण क्षेत्रों में तेजी से दुध उत्पादन कम हुआ है। किस गति से दुध उत्पादक कम हो रहे है इसका कोई आंकड़ा भी सरकार के पास नहीं है।
ऐसा है दुध का दाम
इंदौर दूध विक्रेता संघ ने एक अप्रैल से दुध की कीमतों में वृद्धि कर दी है। अब विक्रेता दुध 8.95 पैसे प्रति फैट के हिसाब से क्रय करेगें इसके साथ ही एक रूपए प्रति लीटर के भाव से घर पहुंच सेवा की रूप में वृद्धि कि गई है। अब बंदी का भाव 63 रूपए प्रति लीटर रहेगा और दुकानों डेरियों पर 65 रूपए प्रति लीटर मिलेगा जिसके पीछे कारण पशु आहार के मुल्यों में वृद्धि बताया जा रहा है।
दुध उत्पादकों का हो रजिस्ट्रेशन
दुध उत्पादन की मात्रा गर्मी में कम हो जाती है । इंदौर में जहां लगभग 15 लाख लीटर दुध आता है। वहीं गर्मीयों में मात्रा घट कर 12 लाख लीटर ही रह जाती है। ग्रामीण क्षेत्रों में दुध उत्पादन कम हो रहा है। प्रदेश सरकार को दुध उत्पान बढ़ाने के लिए दुध उत्पादकों का रजिस्ट्रेशन करना चाहिए ताकि उनकी जमीन स्तर की समस्या का निराकरण प्रदेश सरकार के द्वारा किया जा सके।
भारत मथुरावाल
इंदौर दूध विक्रेता संघ


