Narmada

मां नर्मदा के पौराणिक महत्व को लील गए बांध, अब नहीं बनते नर्मदा में बाणलिंग!

कलयुग में धर्म खत्म हो जाएगा। यह तो हम कई बार सुनते है लेकिन इस धर्म को खत्म करने वाले भी हम ही होंगे इस पर कभी विचार मंथन किया है। शायद नहीं हमारी ही आंखों के सामने कलयुग ने पैर पसार लिए और हम देखते रह गए। प्रदेश सरकार में बैठे चंद राजनैताओं ने हमारी पुरातन संस्कृति को नष्ट कर दिया और हम कुछ नहीं कर पाए। शायद ऐसा ही कुछ विचार,

नर्मदा के किनारे रहने वाले लोग तो रोज सोचते है लेकिन शायद यह पूरा प्रदेश और देश नहीं सोच पाया हमारी आंखों के सामने ही दो प्राकृतिक धर्म धरोहर नष्ट हो गई और हम विकास की गाथा लिखते रहे। विरोध तो हो रहा था लेकिन उसके विरोध को विकास की बाधा मान कर उसके  खिलाफ जनता  ही खड़ी हो गई थी। आज प्रदेश की सरकार उन प्राकृतिक धर्म स्थलों को नष्ट करके उन्हे पर्यटन स्थल बनाने की बात करती है। लेकिन शायद सरकार यह भूल गई थी कि इसी भाजपा की सरकार ने धर्म के साथ चलने वाली सरकार का लबादा ओढ़ कर विकास के नाम पर हमारी मां नर्मदा को उजाड़ने का कार्य किया है।

मां नर्मदा के धावड़ी कुंड को लील गया विकास
मां नर्मदा के उत्तरी घाट पर स्थित धावड़ी कुंड जो कि देवास जिले के बागली जनपद में अंतिम छोर पर स्थित था जिसे धाराजी के नाम से भी जाना जाता था। अब जलमग्न हो गया है। यह धावड़ी कुंड जिसे धाराजी के नाम से भी जाना जाता था जहां मां नर्मदा की रहस्यमयी शक्तियों का साक्षात अनुभव आम लोग करते थे । वह अब खत्म हो गया। अब  ना तो धाराजी में वह घाट बचे हैं ना ही वह महत्व जो कभी यहा प्राकृतिक धार्मिक स्थल होने का अहसास कराता था।

पुराणों में भी जिसका था महत्व
त्रिपुरी के दग्ध (जलकर नष्ट) होने पर बाणासुर ने भयभीत होकर धाराजी क्षेत्र में भगवान शिव की स्तुति करते हुए घोर तपस्या की थी उसकी तपस्या से प्रसन्न होकर भगवान शंकर ने उसे वरदान दिया था कि मेरी भक्ति के प्रसाद से तुम मेरे समीप ही सपरिवार निवास करोगे और तुम्हारा पुनर्जन्म भी नहीं होगा। तुमने जिन करोड़ों पार्थिव मिट्टी के शिवलिंगों को बनाकर मेरा पूजन किया है। उन्हें नर्मदा नदी में धावड़ी कुंड में स्थित कुण्डों में डाल दो। कालांतर में इन कुण्डों से निकलकर यह शिवलिंग पूरे विश्व में स्थापित होंगे और बाणलिंग कहलायेंगे।

धावड़ी कुंड जहां 50 फूट ऊपर से गिरती थी नर्मदा
यहां संपूर्ण नर्मदाजी  50 फुट से गिरती थी, जिसके फलस्वरूप पत्थरों में 10-15 फुट व्यास के गोल (ओखल के आकार के) गड्ढे हो गए। इन गड्ढों में बहकर आए पत्थर पानी के सहारे गोल-गोल घूमते थे, जिससे घिस-घिसकर ये पत्थर बाणलिंग शिवलिंग का रूप ले लेते थे। यह अदभुत, दुर्लभ व आकर्षक जलप्रपात था। यह दुर्लभ जलप्रपात अब जलमग्न हो गया। जिसस कारण अब यहां पर नर्मदा में बह कर आए पत्थर बाणलिंग का रूप नहीं धर सकते। क्योकि प्रकृति ने जो व्यवस्था बाणलिंग बनाने की थी वह अब खत्म हो चुकी है। जिस कारण अब नर्मदाजी स्वयं अपने आराध्य देव को आकार नहीं देती ना ही अब यहां पर ‘बाण’ या नर्मदेश्वर महादेव बनाने में स्वंय मां नर्मदा भी विहिन हो गई। अब नर्मदाजी के स्वयंभू बाण लिंग का बनना भी शायद असंभव है।

धाराजी का ऐसा था महत्व

धारा जी घाट पौराणिक मान्यता के अनुसार नर्मदा का योनी स्थल है। यहां पर डुबकी लगाने से दोहरी जन्म यानी प्रेत बाधा या अन्य बाहरी बाधा से मुक्ति  मिलती थी।  तांत्रिक जानकारी के अनुसार मां नर्मदा की गोद में स्नान करना पुण्य रहता है लेकिन धाराजी घाट पर स्नान करने से प्रेत बाधा और अन्य मानसिक बाधाओं से मुक्ति मिलती थी। सन २००५ के बाद ओम्कारेश्वर डैम के बैकवाटर में यह धावड़ी कुंड समा गया. अब इसके दर्शन कभी नहीं होंगे. धावड़ी कुंड को ओम्कारेश्वर क्षेत्र में “धाराजी” के नाम से जाना जाता था जिसके महत्व को भी खत्म कर दिया गया।

विकास का भूत धाराजी को ही खा गया
धाराजी जहां मां नर्मदा के महत्व के चलते तांत्रिक क्रियाएं होती थी जहां लगने वाला  ‘भूतों का मेला’ देशभर में प्रसिद्ध था उसको एक दिन विकास का भुत ही खा गया। और यहां पर विकास ने एक हादसे का रूप ले लिया। अप्रैल 2005 में अचानक से बांध से पानी छोड़ा गया। जिस दिन यहां मेला लगता है उसी दिन बांध से पानी छोड़ गया। जिसकी वजह से कई जिंदगी जल में समा गई ।  उसके बाद 2007 से यहां पर अघोषित रूप से धारा 144 लागू कर दी गई थी और स्नान पर प्रतिबंध लगा दिया गया। अब यहां फिर से विकास कार्य के नाम पर घाट बनाए जा रहे है। धाराजी का महत्व खत्म कर दिया गया। अब प्रदेश सरकार यहां पर वापस घाट बना कर धाराजी को धार्मिक पर्यटन स्थल बनाने में लगी है लेकिन इससे पहले वह इस स्थान को प्राकतिक महत्व खत्म कर चुकी है।

Shares:
Leave a Reply