Narmada

मां नर्मदा के तट पर चकवा-चकवी का नया बसेरा, प्रेम और विरह का प्रतीक है ये पक्षी

मां नर्मदा के ओंकारेश्वर से मोरटक्का के बीच बहती नर्मदा नदी के तट पर ठंड में अपना बसेरा बनाने वाले चकवा-चकवी जिन्हें बाह्मणी बत्ख भी कहा जाता है ने अपना डेरा जमा लिया है। जिसें मौसम वैज्ञानिक मौसम में होने वाले परिवर्तन के रूप में देखते है। जिसे माना जाता है कि निमाड़ में ठंड बढने से प्रवासी पक्षी भारत की ओर रूख करते है। लेकिन इन पक्षियों में चकवा-चकवी के नर्मदा के तट पर आने के कई अन्य महत्व भी शास्त्रों में मिलते है। जहां यह पक्षी धर्म, कर्म और अपने संस्कार का उदाहरण संसार के लोगों के सामने पेश करते है।
आदिकाल से कविताओं और भजनों में छाए रहने वाले पक्षी
खूबसूरते सुनहरे रंग का यह जोड़ा चकवा-चकवी पक्षी का है। सर्दियों शुरु होते ही ये बड़ी संख्या में उत्तरी सीमाओं से प्रवास पर नर्मदा के तट पर आते है। मार्च आते-आते ये वापस लौट जाते हैं। इसे ब्राम्हणी डक भी कहा जाता है। हंस वर्ग का यह पक्षी लगभग 2 फीट का होता है।

प्रेम वियोग का प्रतिक
चकवा-चकवी दिन भर साथ रहते हैं, लेकिन सूर्यास्त के बाद बिछड़ जाते हैं और फिर सूर्योदय पर ही मिलते है। रात में चकवा तेज आवाज में चकवी के लिये पुकारता रहता है। इसी विरह को कई कवियों ने शब्दों में उकेरा है।

आत्मा से परमात्मा के मिलने का उदाहरण
अमीर खुसरो की कविताओं में चकवा-चकवी पक्षी के माध्यम से कहते है कि जिस प्रकार चकवा चकवी पक्षी दिन में तो मिल जाते हैं लेकिन रात आते ही दोनों बिछुड़ जाते हैं ठीक वैसे ही आत्मा और परमात्मा अलग-अलग होते है और फिर एक हो जाते है। दो विरही (चकवा-चकवी पक्षी) जनो की पीड़ा के माध्यम से आत्मा परमात्मा के बिछुड़ने का संकेत दिया है।

चकवा चकवी दो जने… रैन बिछोही होय॥
अमीर खुसरो कहते हैं। कोई इन चकवा-चकवी पक्षी को न मारे, क्योंकि इन्हें तो पहले ही ईश्वर ने रात में बिछुड़ने की मार दे रखी है। ये पक्षी चकवा-चकवी आदिकाल से हमारी संस्कृति के कहानी किस्सों में शामिल है। यह पक्षी कहानियों में अपने जीवन से कई संदेश देते है। जहां यह इनके प्रेम और विरह के साथ ही आत्मा- परमात्मा के संबंध बनाने की बात का संदेश देते है।

यहीं यह पक्षी आज के आधुनिक युग को भी संदेश देते है । यह पक्षी अपने जीवनकाल में एक ही जोड़ा बनाते है। जहां जोड़ा पूरी रात विरह झेलता है लेकिन किसी ओर अपना साथी नहीं बनाता। पक्षी का यह कर्म बताता है कि यह इनके जीवन में चली आ रही परंपरा का निर्वहन करते है। यह पक्षी अपने जोड़े के प्राण त्याग देने के बाद स्वयं भी प्राण त्याग देते है। यह अपने साथी की मौत के बाद खाना-पीना छोड़ देते है। धार्मिक कथाओं में इस पक्षी को शिवभक्त बताया गया है। जो एक ऋषि से  श्राप मिलने के कारण अपने जीवन में प्रेंम विरह झेलते है। नर्मदा के तट पर ऐसे पक्षियों का आना जैसे यह बताता है कि वह भी अपने श्राप से मुक्त होने के लिए नर्मदा के किनारे रहता है। मां नर्मदा के किनारे तपस्या करता है। खैर यह भी एक रिसर्च का विषय है जिस पर अभी कोई रिसर्च शुरू नही हुई है ना है इन पक्षियों के अंधेरा होते है अलग-अलग होने का कोई वैज्ञानिक कारण भी अब तक सामने नहीं आया है। कि आखिर क्यों चकवा-चकवी रात होते है अलग हो जाते है।

Shares:
Leave a Reply