ऊपर उठने के लिए पहले नीचे रहना सीखें – राष्ट्रसंत सुधासागर
दलाल बाग पर चल रहे दिगम्बर जैन समाज के चातुर्मास और पर्युषण महापर्व में उत्तम तप धर्म पर प्रेरक आशीर्वचन
शाम को लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला भी पहुंचे राष्ट्र संत से आशीर्वाद लेने
इंदौर। दुनिया को पीछे छोड़ने और दूसरों को अपने से छोटा समझने की भावना ही हमारे पतन का कारण बनती हैं। मनुष्य को जीवन में ऊँचा उठना है तो सबसे पहले झुकना सीखना चाहिए। विनम्रता कमजोरी नहीं, बल्कि महान बनने की पहली सीढी है। बीज को वृक्ष बनने से पहले मिटटी के अंधकार में जाना पड़ता है, जहाँ वह नीचे दबता है, कठिनाइयों को झेलता है और तब कहीं एक दिन आकाश की ऊँचाइयों तक पहुँच पाता है। मनुष्य को भी इसी तरह ऊपर उठने के लिए पहले नीचे रहना सीखना चाहिए। वास्तविक बडप्पन वही है जिसमें व्यक्ति अपने से छोटे को भी सम्मान प्रदान करे।
ये प्रेरक और दिव्य विचार हैं संत शिरोमणि प.पू. विद्यासागर म.सा. के परम प्रभावक शिष्य और राष्ट्रसंत मुनि पुंगव प.पू. श्री सुधासागर महाराज के, जो उन्होंने सकल दिगम्बर जैन धर्म प्रभावना समिति के तत्वावधान में वीआईपी रोड स्थित किला मैदान, दलाल बाग परिसर में निर्मित विद्या-सुधा मंडप में चल रहे चातुर्मास महोत्सव में पर्युषण महापर्व की धर्मसभा में ने मंगलवार को सातवें दिन उत्तम तप धर्म की व्याख्या के दौरान व्यक्त किए। धर्मसभा में प्रमुख रूप से चक्रवर्ती अध्यक्ष नवीन गोधा, सामाजिक संसद के अध्यक्ष आनंद गोधा, मनीष गोधा एवं शिविर के पुण्यार्जक आकाश जैन कोयला परिवार आदि ने देशभर से आए 10 हजार से अधिक शिविरार्थियों की आत्मीय अगवानी की। सभा का शुभारंभ मंगलाचरण एवं पाद प्रक्षालन के साथ हुआ। इस अवसर पर महोत्सव अध्यक्ष अशोक डोसी, महामंत्री हर्ष जैन, प्रिंसपाल टोंग्या, संजय पाटोदी, हुकमचंद जैन काका, प्रदीप ब्रह्मचारी, विनोद भैया, विजय दुर्रा, सौरभ बडजात्या, राहुल सेठी, राजेश गंगवाल, भूपेंद्र भोपाली, सोनाली बागडिया एवं अर्चना गोधा सहित अनेक सहयोगी बंधुओं ने विभिन्न व्यवस्थाओं में सहयोग प्रदान किया। दलाल बाग पर प्रतिदिन सुबह 9 से 10.30 बजे तक राष्ट्रसंत के प्रवचनों की अमृत वर्षा का क्रम जारी है। यहाँ चल रहे श्रावक संस्कार शिविर और दस लक्षण महापर्ण में देश-विदेश से आए हजारों समाज बंधु पूरे उत्साह के साथ अपनी तप साधना में जुटे हुए हैं।
राष्ट्रसंत ने उत्तम तप धर्म की व्याख्या करते हुए कहा कि व्यक्ति जब कुछ बनने या पाने की इच्छा रखता है तब उसे सबसे अधिक सावधान रहने की जरूरत होती है। दूसरों से तुलना करते समय मनुष्य सोचता है कि दूसरों के पास वह सबकुछ है, जो उसके पास नहीं है। यही भावना हीनता, असंतोष और अहंकार को जन्म देती है। आराम और सुख में अंतर समझना होगा। हम रोटी, पानी, धन, मकान, वाहन और सोफा जैसी वस्तुओं में सुख खोजते हैं, जबकि ये वस्तुएं वास्तविक सुख नहीं, केवल क्षणिक आराम देती हैं। वस्तु चली जाएगी तो आराम भी समाप्त हो जाएगा। जो सुख किसी बाहरी वस्तु पर निर्भर है वह वास्तविक सुख नहीं हो सकता। हम पहले से ही सुखी हैं, हमें सुखी नहीं बनना है क्योंकि मनुष्य को अपने शुद्ध आत्म स्वरुप को पहचानना चाहिए और बार-बार यही भावना करनी चाहिए कि मैं शुद्ध हूँ। बाहरी उपलब्धियों की इच्छा कभी समाप्त नहीं होती। हम धन, पद, प्रतिष्ठा और सुविधाओं के पीछे दौड़ते रहते हैं जबकि वास्तविक आनंद तो हमारे भीतर है। आत्मा के शुद्ध स्वरुप की अनुभूति ही स्थायी आनंद का आधार है।
लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला ने लिए शुभाशीर्वाद – दलाल बाग में चल रहे श्रावक संस्कार शिविर में शाम को लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला ने भी पहुंचकर राष्ट्रसंत प.पू. विद्यासागर म.सा से शुभाशीष प्राप्त किए। राज्य के नगरीय विकास मंत्री कैलाश विजयवर्गीय भी उनके साथ थे। आयोजन समिति की ओर से चक्रवर्ती अध्यक्ष नवीन गोधा, सामाजिक संसद के अध्यक्ष आनंद गोधा, मनीष गोधा एवं शिविर के पुण्यार्जक आकाश जैन कोयला, महोत्सव अध्यक्ष अशोक डोसी, महामंत्री हर्ष जैन, प्रिंसपाल टोंग्या, संजय पाटोदी आदि ने उनकी अगवानी कर उन्हें परम्परागत पगड़ी पहनाकर उनका अभिनन्दन किया।
प.पू. राष्ट्रसंत ने कहा कि भगवान की वन्दना उनके वैभव को प्राप्त करने के लिए नहीं बल्कि उनके बताए मोक्ष मार्ग पर चलने के लिए होनी चाहिए। तीर्थंकर हमारे लिए उपकारी हैं क्योंकि उन्होंने संसार से निकलकर मोक्ष का मार्ग दिखाया है। उनकी वन्दना का उद्देश्य तीर्थंकर बनना नहीं बल्कि उनके बताए मार्ग पर चलकर आत्म कल्याण करना होना चाहिए। तीर्थंकर के वैभव पर ललचाने के बजाय उनके उपदेशों और संदेशों पर हमारा जीवन समर्पित होना चाहिए। गुरु के भी पीछे नहीं चलना है बल्कि उनके बताए मार्ग पर चलना है। महाराजश्री ने आत्मा के वास्तविक स्वरुप, आत्म ज्ञान, आगम की दृष्टि, साधक की इच्छाओं और धर्म के लक्ष्य सहित अनेक विषयों पर अपने प्रभावी आशीर्वचन में अनेक प्रेरक बाते कही।


