रणथंभौर त्रिनेत्र गणेशजी का मंदिर प्रसिद्ध रणथंभौर टाइगर रिजर्व एरिया में स्थित है। यहां की प्राकृतिक सुंदरता देखते नही बनती है। बारिश के दौरान यहां कई जगह झरने फूट पड़ते है और पूरा इलाका रमणीय हो जाता है।
यह मंदिर किले में स्थित है और यह किला संरक्षित धरोहर है। इस गणेश मंदिर के तक पहुंचना अब श्रद्धालुओं के लिए आसान नहीं है क्योकि टाइगर रिजर्व एरिया होने के कारण इस क्षेत्र में अब जाना आसान नहीं है। यहां कई बार टाइगर श्रद्दालूओं पर हमला कर चुके है जिसके बाद वन विभाग ने अब इस मंदिर तक पहुंचने के लिए कुछ नियम बना दिए है। साथ ही इस मंदिर क्षेत्र में अब किसी को पैदल या दौपहिया वाहन से नहीं जाने दिया जाता है।
पहले पैदल जाते थे श्रद्धालु
यहां गणेश चतुर्थी पर मेला आयोजित होता है। आसपास के जिलों से कई किलोमीटर की पैदल यात्रा कर भक्त मंदिर के दर्शन के लिए आते थे। लेकिन यहां एक हादसे के बाद पैदल यात्रा बंद कर दी गई है।
स्वयंभू है त्रिनेत्र गणेश
यहां गणेश जी की पहली त्रिनेत्री प्रतिमा विराजमान है। यह प्रतिमा स्वयंभू प्रकट है। यहां विराजे त्रिनेत्र गणेश जी को लेकर कई किवदंती है कि भगवान गणेश ने ऋषि वशिष्ठ को स्वप्न में दर्शन दिए थे और उन्हें पास के जल में डूबी एक दिव्य मूर्ति खोजने का निर्देश दिया था। ऋषि ने दिव्य निर्देशों का पालन करते हुए, तीन नेत्रों वाली मूर्ति की खोज की, जो देवता की सर्वव्यापकता का प्रतीक है।भगवान राम ने लंका कूच से पहले गणेशजी के इसी रूप का अभिषेक किया था। एक और मान्यता के अनुसार द्वापर युग में भगवान कृष्ण का विवाह रूकमणी से हुआ था। इस विवाह में वे गणेशजी को बुलाना भूल गए। गणेशजी के वाहन मूषकों ने कृष्ण के रथ के आगे—पीछे सब जगह खोद दिया। कृष्ण को अपनी गलती का अहसास हुआ और उन्होंने गणेशजी को मनाया। तब गणेशजी हर मंगल कार्य करने से पहले पूजते है। कुष्ण ने जहां गणेशजी को मनाया वह स्थान रणथंभौर था। यही कारण है कि रणथम्भौर गणेश को भारत का प्रथम गणेश कहते है।
1579 फीट उंचाई पर स्थित है मंदिर
राजस्थान के सवाई माधोपुर जिले के रणथंभौर में स्थित प्रसिद्ध त्रिनेत्र गणेश जी मंदिर 1579 फीट ऊंचाई पर अरावली और विंध्याचल की पहाड़ियों में स्थित है।

किले में प्रकट हुए थे त्रिनेत्र गणेशजी
महाराजा हम्मीरदेव चौहान व दिल्ली शासक अलाउद्दीन खिलजी का युद्ध 1299-1301 ईस्वी के बीच रणथम्भौर में हुआ। इस दौरान नौ महीने से भी ज्यादा समय तक यह किला दुश्मनों ने घेरे रखा। दुर्ग में राशन सामग्री समाप्त होने लगी तब गणेशजी ने हमीरदेव चौहान को स्वप्न में दर्शन दिए और उस स्थान पर पूजा करने के लिए कहा जहां आज यह गणेशजी की प्रतिमा है। हमीर देव वहां पहुंचे तो उन्हे वहां स्वयंभू प्रकट गणेशजी की प्रतिमा मिली। हमीर देव ने फिर यहां मंदिर का निर्माण कराया।

इंदौर का यह मंदिर याद दिलाता है
इंदौर के एरोड्रम रोड पर स्थित अंबिकापुरी में खाटू श्याम बाबा के मंदिर है। इस मंदिर के अंदर ही एक गणेश मंदिर है जिसे पर रणथंभौर गणेश जी का नाम लिख कर गणेश जी के पुरे परिवार को विराजमान किया गया है। जिस तरह से रणथंभौर में गणेश जी का पुरा परिवार ऋद्धि सिद्धि, उनकी पत्नी और दो पुत्रों शुभ लाभ को स्थापित किया। उनके वाहन मूषक को भी वहाँ स्थापित किया गया है। उसी तर्ज पर यहां भी गणेशजी विराजमान है।


