रास्ते तो हम बहुत देखते हैं लेकिन मंजिल का पता अब तक नहीं लगा पाए – राष्ट्रसंत सुधासागर म.सा.
छत्रपति नगर स्थित दलाल बाग में चल रही चातुर्मास की धर्मसभा में प्रेरक आशीर्वचन
इंदौर। जीवन निरंतर चलते रहने का ही नाम है। हम अनादि काल से चलते आ रहे हैं। रास्ते खोजते हैं, रास्तों पर चलते हैं लेकिन कभी यह विचार नहीं करते कि वास्तव में हमारी मंजिल क्या है। रेलवे स्टेशन पर टिकिट खिड़कीवाला भी पहले पूछता है कि कहाँ जाना है, फिर टिकिट देता है लेकिन यदि यात्री कहे कि कहीं का भी टिकिट दे दीजिए तो यह संभव नहीं होगा। यह किसी पागल या भटके हुए व्यक्ति की कहानी नहीं बल्कि हम सबके जीवन की सच्चाई है। हम भी अनादि काल से संसार में भटक रहे हैं। रास्ते तो हम बहुत देखते हैं लेकिन मंजिल का पता अब तक नहीं लगा पाए हैं।
ये प्रेरक और दिव्य विचार हैं संत शिरोमणि प.पू. विद्यासागर म.सा. के परम प्रभावक शिष्य और राष्ट्रसंत मुनि पुंगव प.पू. श्री सुधासागर महाराज के, जो उन्होंने सकल दिगम्बर जैन धर्म प्रभावना समिति के तत्वावधान में छत्रपति नगर स्थित, दलाल बाग परिसर में निर्मित विद्या-सुधा मंडप में चल रहे चातुर्मास महोत्सव की धर्मसभा में मंगलवार को सुबह व्यक्त किए। सभा का शुभारंभ मंगलाचरण एवं पाद प्रक्षालन के साथ हुआ। प्रारम्भ में आयोजन समिति की ओर से चक्रवर्ती अध्यक्ष नवीन-शिवानी गोधा, सामाजिक संसद के अध्यक्ष आनंद-अंतिका गोधा, चक्रवर्ती मनीष-सपना गोधा, अध्यक्ष अशोक डोसी, महामंत्री हर्ष-तृप्ति जैन, आकाश जैन कोयला, प्रिंसपाल टोंग्या, संजय पाटोदी, सौरभ बडजात्या, राहुल सेठी एवं भूपेंद्र भोपाली आदि ने साधकों की अगवानी की। धर्मसभा में राष्ट्रसंत के प्रवचनों की अमृत वर्षा सुबह 8 से 9.30 बजे तक नियमित रूप से जारी है।
राष्ट्रसंत प.पू. सुधासागर म.सा. ने जीवन की मंजिल, आत्म कल्याण का मार्ग और सच्चे गुरु की पहचान विषय पर अपने आशीर्वचन में कहा कि रास्ते पर चलना और मंजिल तक पहुंचना, दोनों अलग-अलग बातें हैं लेकिन यह याद रखें कि हर रास्ता मंजिल तक नहीं पहुँचता। पहले मंजिल तय करना पड़ेगी, फिर रास्ते का चयन करना चाहिए। हम लोग चलने की उतावली ज्यादा करते हैं। पहले यह तय करो कि पहुंचना कहाँ है। दुनिया में रास्ते अनेक हैं। कुछ रास्ते सही दिशा में ले जाते हैं और कुछ रास्ते ऐसे भी होते हैं जो हमें भटकाकर जंगलों तक पहुंचा देते हैं। इसी तरह धर्म और अध्यात्म में भी केवल सुनते रहने, पढ़ते रहने और अलग-अलग विचारों को जानने से ही काम नहीं चलेगा। पहले स्वयं से पूछिए कि मैं जीवन में क्या प्राप्त करना चाहता हूँ, मेरी वास्तविक मंजिल क्या है, मुझे अपनी आत्मा का कल्याण करना है या नहीं और क्या मैं मोक्ष मार्ग की ओर बढ़ना चाहता हूँ? जब तक मंजिल तय नहीं होगी तब तक सही रास्ते का चयन भी नहीं होगा।
राष्ट्रसंत ने कहा कि धर्म केवल जानकारी प्राप्त करने का नाम नहीं है। हमारा धार्मिक जीवन भी उस ग्राहक जैसा हो गया है जो दुकान पर पहुंचकर व्यापारी से सारा सामान निकलवा लेता है और फिर कहता है कि मुझे लेना कुछ नहीं है, केवल जानना था कि यहाँ क्या-क्या मिलता है। धर्म का उद्देश्य जीवन में परिवर्तन लाना और आत्मा के वास्तविक स्वरुप को पहचानना है। सच्चे गुरु की पहचान यही है कि उन्हें देखकर हमारा रोम-रोम पुलकित हो जाए, हृदय में श्रद्धा जाग जाए और जिनके श्रीमुख से निकले शब्द मंत्र जैसे प्रतीत हों ऐसे गुरु ही हमारे सच्चे मार्गदर्शन हो सकते हैं। गुरु का आशीर्वाद हमारी भावनाओं को प्रोत्साहित कर सकता है लेकिन आत्म कल्याण का पुरुषार्थ हमें स्वयं ही करना पड़ेगा।

