संसार की प्रत्येक वस्तु को सीमित समझ के आधार पर नहीं, उसके वास्तविक स्वरूप में समझना चाहिए – सुधासागर म.सा.
दलाल बाग पर सकल दिगम्बर जैन धर्म प्रभावना समिति के तत्वावधान में चल रही अभा युवा विद्वत संगोष्ठी में प्रेरक आशीर्वचन
इंदौर। पुण्य और पाप, दोनों की अपनी कर्मगत व्यवस्था है लेकिन उनके परिणाम भिन्न होते हैं। जैन दर्शन में कर्म और उसके फल की व्यवस्था को विशेष महत्व दिया गया है। वस्तु को समझने के लिए अपनी दृष्टि और ज्ञान को विकसित करना चाहिए। सीमित समझ के आधार पर किसी वस्तु के अस्तित्व अथवा उसके विभिन्न पक्षों को नकार देना उचित नहीं है। संसार की प्रत्येक वस्तु को उसके वास्तविक स्वरूप में समझना चाहिए।
ये दिव्य और प्रेरक विचार हैं संत शिरोमणि प.पू. विद्यासागर म.सा. के परम प्रभावक शिष्य और राष्ट्रसंत मुनि पुंगव प.पू. श्री सुधासागर महाराज के, जो उन्होंने बुधवार को सकल दिगम्बर जैन धर्म प्रभावना समिति के तत्वावधान में वीआईपी रोड स्थित किला मैदान, दलाल बाग परिसर में निर्मित विद्या-सुधा मंडप में चल रहे चातुर्मास महोत्सव में आयोजित अभा युवा विद्वत संगोष्ठी में उपस्थित प्रतिनिधियों को संबोधित करते हुए व्यक्त किए। राष्ट्रसंत ने जैन दर्शन के गूढ़ सिद्धांतों पर प्रवचन देते हुए दृव्य, गुण, पर्याय, निमित्त-उपादान, अनेकान्तवाद, पुण्य-पाप, आत्मा की स्वतंत्र सत्ता और भगवान के अकर्तापन जैसे गंभीर विषयों को अनेक उदाहरणों के माध्यम से समझाया। प्रारम्भ में मुख्यरूप से चक्रवती अध्यक्ष नवीन गोधा, सामाजिक संसद के अध्यक्ष आनंद गोधा, चक्रवर्ती मनीष गोधा, महोत्सव समिति के अध्यक्ष अशोक डोसी, महामंत्री हर्ष जैन, आकाश जैन कोयला, प्रिंसपाल टोंग्या, संजय पाटोदी, सौरभ बडजात्या, राहुल सेठी एवं भूपेंद्र भोपाली सहित अनेक सहयोगी बंधुओं ने देशभर से आए विद्वतजनों की अगवानी की। राष्ट्रसंत के प्रवचन नियमित रूप से प्रतिदिन सुबह 8 से 9.30 तक धर्मसभा में जारी हैं।
राष्ट्रसंत ने अपने आशीर्वचन में कहा कि किसी वस्तु की सत्ता को स्वीकार करना और उसके परिणामों का मूल्यांकन करना, दोनों अलग-अलग विषय हैं। पुण्य और पाप दोनों की अपनी कर्मगत व्यवस्था है लेकिन उनके परिणाम भिन्न होते हैं। जैन दर्शन में भगवान को ज्ञाता, दृष्टा और वीतराग माना गया है न कि संसार के प्रत्येक कार्य का कर्ता। प्रत्येक जीव अपने भावों और कर्मों के अनुसार परिणमन करता है इसलिए आत्मा का पुरुषार्थ सम्यक दर्शन, सम्यक ज्ञान और सम्यक चरित्र मोक्ष मार्ग के प्रमुख आधार हैं। मिट्टी और घड़े का उदाहरण देते हुए राष्ट्रसंत ने कहा कि मिट्टी घड़े का उपादान है जबकि कुम्हार और उसके उपकरण निमित्त हैं। इस उदाहरण से स्पष्ट है कि प्रत्येक वस्तु अपने स्वभाव और सामर्थ्य के अनुसार परिणमन करती है। निमित्त की भूमिका सहायक होती है लेकिन वस्तु की अपनी सत्ता और स्वभाव का महत्व समाप्त नहीं होता।
—

