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स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती और माघ मेला प्रशासन के बीच का विवाद हाई कोर्ट पहुंचा, CBI जांच की मांग

स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती और माघ मेला प्रशासन के बीच उत्पन्न विवाद अब इलाहाबाद हाई कोर्ट तक पहुंच गया है। याचिका में 18 जनवरी 2026 को मौनी अमावस्या के दिन घटित घटना की सीबीआई जांच कराए जाने की मांग की गई है। इस मामले में अधिवक्ता गौरव द्विवेदी ने मुख्य न्यायमूर्ति के समक्ष पत्र याचिका (लेटर पिटीशन) दाखिल की है।

मेला अधिकारी को निलंबित करने की मांग
प्रयागराज के कमिश्नर, जिलाधिकारी, पुलिस कमिश्नर और मेला अधिकारी को निलंबित करने के आदेश देने का अनुरोध किया गया है। पुलिसकर्मियों के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज करने की भी मांग भी की गई है।  इसके अतिरिक्त, याचिका में नाबालिग बटुकों को हिरासत में लेकर उनके साथ कथित मारपीट करने वाले पुलिसकर्मियों के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज किए जाने की भी मांग की गई है।

सनातन धर्म का अपमान

याचिकाकर्ता के अनुसार, माघ मेला सनातन धर्म का एक अत्यंत पवित्र और महत्वपूर्ण उत्सव है, जिसमें मौनी अमावस्या का स्नान सर्वोच्च धार्मिक महत्व रखता है। आरोप है कि मौनी अमावस्या के दिन स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती जब अपने शिष्यों के साथ पालकी में सवार होकर संगम स्नान के लिए जा रहे थे, तभी प्रशासन और पुलिस अधिकारियों ने उन्हें जबरन पालकी से उतार दिया और पैदल जाकर स्नान करने का निर्देश दिया।

नाबालिग बटूकों की शिखा को खींचा
याचिका में यह भी कहा गया है कि स्वामीजी के साथ चल रहे 11 से 14 वर्ष आयु के नाबालिग बटुकों को हिरासत में लिया गया, उनके साथ मारपीट की गई और उनकी शिखा (चोटी) पकड़कर घसीटा गया। नाबालिगों के साथ इस प्रकार का व्यवहार जुवेनाइल जस्टिस (केयर एंड प्रोटेक्शन) एक्ट के प्रावधानों का उल्लंघन है और एक दंडनीय अपराध की श्रेणी में आता है। याचिका में यह भी उल्लेख किया गया है कि बटुकों की शिखा खींचना सनातन धर्म की धार्मिक भावनाओं का अपमान है।

शंकराचार्य से प्रमाण मांगना धर्म का अपमान
मेला प्रशासन द्वारा सुप्रीम कोर्ट में लंबित एक मामले का हवाला देते हुए स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती के पद को लेकर प्रश्न उठाए गए हैं। याचिकाकर्ता का कहना है कि शंकराचार्य की नियुक्ति की एक निश्चित और मान्य धार्मिक प्रक्रिया होती है, जो अखाड़ों और काशी विद्वत परिषद के माध्यम से संपन्न की जाती है। प्रशासन को इस धार्मिक प्रक्रिया या पद की वैधता पर प्रश्न उठाने का कोई अधिकार नहीं है।

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