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सोना-चांदी छोड़ “श्रीनाथ जी” आज लगा मिट्टी के बर्तन में भोग

विश्व प्रसिद्ध श्रीनाथ मंदिर नाथद्वारा में विशेष पुण्यदायी महिनों में कई तरह के मनोरथ होते है। जिनका उद्देश्य भगवान श्रीनाथ जी को रिझाना है। भक्तों के द्वारा की गई तरह-तरह की पुजा से श्रीनाथ जी प्रसन्न होते है। श्रीनाथ जी मंदिर में विशेष मनोरथ होते है। इसी क्रम में आज(24 दिंसबर) को मंदिर में कुंडवारा मनोरथ किया गया। इस मनोरथ को करने के लिए कई नियमों का पालन किया जाता है। तो आइए जानते है वह नियम क्या है।

जय गोपाल मनोरथ
मंदिर में सेवारत्त राहुल पुरोहित ने बताया कि श्रीजी में कुंडवारा मनोरथ हुआ। जिसको जय गोपाल मनोरथ भी कहते है। नाम से ही स्पष्ट है कि कुंड वारा यानी मिट्टी के कुंड जैसे बर्तन में प्रभु भोग आरोगते हैं।

तीन विशेष ध्यान देन योग्य बात
1. जिस दिन कुंडवारा मनोरथ हों उस दिन ग्वाल दर्शन खोलने ही पड़ते है निश्चित है इसी कारण मंगला के बाद श्रृंगार दर्शन नहीं खोले जाते ताकि समय की बचत हो और प्रभु श्रृंगार धारण करके सुख पूर्वक समय पर भोग आरोग कर ग्वाल के समय तक दर्शन खोले जा सकें
2. कुंडवारा बिना तिलकायत महाराज श्री की आज्ञा के नहीं हो सकता जब कुंडवारा मनोरथ हो ओर यह करवाने वाला मनोरथी कोई भी हो लेकिन भेट राशि जमा करवाने के बाद समाधान विभाग के चोपड़ा में ओर रसीद पर नाम तिलकयत महाराज श्री का ही लिखवाया जाता हे
3. जिस दिन कुंडवारा हो उस दिन महाप्रभु वल्लभाचार्य के वंश का वल्लभ कुल के कोई बालक उपस्थित होने ही चाहिए वही कुंडवारा का भोग धर सकते है अन्यथा कुंडवारा नहीं हो सकता है।
4. श्रीजी व पुष्टिमार्ग के अन्य मंदिरों में परम्परानुसार कुंडवाय मनोरथ कभी भी किसी भी माह की षष्ठी, द्वादशी, मंगलवार व रविवार को नहीं होता.

दो भाव से होता है कुंडवारा
निकुंजनायक प्रभु श्रीजी के मंदिर में गौलोक की भावना से कुंडवारा का भोग गोपीवल्लभ (ग्वाल) भोग के साथ अरोगाया जाता है जबकि अन्य घरों (मंदिरों) में नंदालय के भाव से यह ग्वाल के पश्चात राजभोग के साथ अरोगाया जाता है. इसी कारण से सेवा प्रकार में कुछ अंतर होते है।

हल्दी से बनाते है मांडने
श्रीजी के निज-मंदिर भी कुंडवारा का भोग रखा जाय वहां हल्दी में भीगी सूती डोरी से आड़ी व खड़ी लकीरें छांटी जाती है. इन लकीरों से वर्ग बनाये जाते हैं जिनके मध्य कुंडवारा के भोग साजे जाते हैं. यह वर्ग 4 के गुणक में होते हैं अर्थात 4, 8, 16 अथवा 32 इस प्रकार के वर्गों को गुणा कहा जाता है. हल्दी शुद्धता एवं शुभत्व का प्रतीक है अतः भोग के मिट्टी के बर्तनों को भी हल्दी से लीपा जाता है.

ये लगता है भोग
इस मनोरथ में सीरा, दहीभात एवं खीर सोने-चांदी के बर्तनों के बजाय मिट्टी के बड़े-बड़े मलड़ों में प्रभु को अरोगाये जाते हैं. कुंडवारा मनोरथ में ठाकुरजी को अनसखड़ी में गेहूं की सेव (पाटिया) के लड्डू, कठोर मठड़ी (ठोड़), चून का सीरा (गेहूं के आटे का हलवा), गेहूं के आटे की सेवई की खीर और सखड़ी में दहीभात आदि सामग्रियां अरोगायी जाती हैं.

ठाकुरजी को लगते है मुख्यत पांच सामग्रियां के भोग
1 – पाटिया (गेहूँ के आटे की सेव) के लड्डू 2 – मठड़ी (कड़क ठोड़) 3 – चून (गेहूँ के आटे) का सीरा 4 – पाटिया (गेहूँ के आटे की सेव) की खीर 5 – दहीभात

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