राम वन गए, इसीलिए बन गए…..– पं श्रीराम प्रपन्नाचार्य
कैट रोड, हवा बंगला स्थित हरिधाम आश्रम पर राम कथा में केवट-राम प्रसंग, हनुमत महायज्ञ में हुई 8 लाख आहुतियाँ
इंदौर। चरित्र मनुष्य की सबसे बड़ी पूंजी होता है। आज हमारी युवा पीढ़ी चरित्र के मामले में भटक रही है। नैतिक मूल्यों और संस्कृति से विमुखता के कारण समाज में अनेक विकृतियाँ आ रही हैं। प्रभु श्रीराम ने अपने वनवास काल में समाज के अंतिम छोर पर खड़े लोगों को गले लगाकर हजारों बरस पहले अन्त्योदय का सन्देश दे दिया था। राम-केवट प्रसंग रामायण का सबसे अनूठा और अनुकरणीय प्रसंग है। भगवान का समूचा चरित्र निर्दोष है इसीलिए उन्हें मर्यादा पुरुषोत्तम कहा गया है। राम वन गए, इसीलिए बन गए।
ये प्रेरक विचार हैं श्रीधाम वृन्दावन के प्रख्यात कथाकार पं. श्रीराम प्रपन्नाचार्य महाराज के, जो उन्होंने हवा बंगला, कैट रोड स्थित हरिधाम आश्रम पर चल रही राम कथा में बुधवार को प्रभु श्रीराम के वनवास गमन के विभिन्न प्रसंगों की व्याख्या के दौरान व्यक्त किए। कथा में राम-केवट संवाद का भावपूर्ण प्रसंग और वृन्दावन से आए भजन गायकों एवं संगीतज्ञों की प्रस्तुतियों ने आज भी हजारो भक्तों को मंत्रमुग्ध बनाए रखा। कथा शुभारंभ के पूर्व आश्रम के अधिष्ठाता महंत शुकदेवदास महाराज के सानिध्य में समाजसेवी विष्णु बिंदल, टीकमचंद गर्ग, दिनेश मित्तल, डॉ. सुरेश चोपड़ा, रेरा के प्रमुख पीसी गुप्ता, न्यायाधीश अर्पित गुप्ता, ललित अग्रवाल, संजय अग्रवाल, सुधीर अग्रवाल, विजय सिंह राणा ने व्यास पीठ का पूजन किया। विद्वान वक्ता की अगवानी सीताराम नरेडी, ओमप्रकाश अग्रवाल, गुमान सिंह ठाकुर एवं गोपाल गोयल आदि ने की। कथा श्रवण के लिए प्रतिदिन शहर के साथ आसपास के 25 गांवों के श्रद्धालु भी आ रहे हैं। हरिधाम पर सुबह 8 से दोपहर 1.30 बजे तक हनुमत महायज्ञ और दोपहर 3 बजे से शाम 6 बजे तक श्रीराम कथा में भक्तों का सैलाब निरंतर बना हुआ है। स्वदेशी जागरण मंच के कार्यकर्ता भी व्यवस्थाएं सँभालने में सहयोग कर रहे हैं।
विद्वान वक्ता ने कहा कि प्रभु श्रीराम का चरित्र अदभुत, अनुपन और अनुकरणीय है। उनके व्यक्तित्व में कहीं से कहीं तक कोई दोष या कमी नहीं है। एक अच्छे पुत्र, भाई, पति, पिता और शासक के रूप में प्रभु श्रीराम की जितनी भूमिकाएँ हम सुनते हैं, उनमें कहीं भी कोई खोट, कमी या दोष नहीं है। पिता की आज्ञा का पालन करते हुए उन्होंने अगले दिन होने वाला राज्याभिषेक छोड़ने में एक क्षण की भी देर नहीं की और वनवास पर चल दिए। वनवास ने ही राजकुमार राम को भगवान राम बनाया। यदि भगवान वन नहीं जाते तो केवल राजा ही बने रहते, भगवान नहीं बन पाते। केवट और शबरी जैसे प्रसंग उनके व्यक्तित्व के अनुकरणीय प्रसंग है जिनमें समाज के संतिम पंक्ति के व्यक्ति को गले लगाने का सन्देश दिया गया है।
हनुमत महायज्ञ – आश्रम पर यज्ञाचार्य पं. ललित पाठक के निर्देशन में 51 विद्वानों ने आश्रम परिसर में निर्मित यज्ञशाला में चल रहे हनुमत महायज्ञ में “कवन सो काज कठिन जग माही, जो नहीं होइ तात तुम पाहीं” महामंत्र से प्रतिदिन 1 लाख 60 हजार आहुतियाँ विद्वानों एवं यजमानों द्वारा समर्पित की जा रही हैं। बड़ी संख्या में श्रद्धालु यजमान के रूप में सपत्निक यहाँ आकर विश्व शांति एवं आत्मकल्याण के उद्देश्य से आहुतियाँ समर्पित कर रहे हैं। प्रतिदिन सुबह 8 से दोपहर 1.30 बजे तक चल रहे हनुमत महायज्ञ में यज्ञ शाला की परिक्रमा करने वालों की संख्या भी निरंतर बढ़ रही है। अब तक यहाँ 11 लाख लक्ष्य के मुकाबले 8 लाख आहुतियाँ समर्पित की जा चुकी हैं। सुबह हनुमत महायज्ञ एवं दोपहर में श्रीराम कथा के दिव्य अनुष्ठान के कारण समूचा हरिधाम क्षेत्र पवित्र श्लोकों की मंगल ध्वनि से गुंजायमान बना हुआ है।


