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जीवन में दया, करुणा और परमार्थ जैसे गुण ही हमें मानव से महामानव बना सकते हैं – आचार्य महामंडलेश्वर स्वामी भास्करानंद

दया, करुणा और परमार्थ जैसे गुण ही हमें मानव से महामानव बनाएंगे
गीता भवन में स्वामी भास्करानंद के सानिध्य में धूमधाम से मना श्रीकृष्ण-रुक्मणी विवाह का उत्सव, आज फूलों की होली

इंदौर, भारतीय संस्कृति में विवाह ही वह व्यवस्था है जो समाज को मर्यादा और शालीनता में बांधे हुए है। समाज में कंस प्रवृत्ति द्वापर युग में भी थी, त्रेता युग में भी रही और आज भी है। रुक्मणी विवाह भगवान का नारी के प्रति मंगलभाव का सूचक है। सोना, चांदी और पैसा तो चुराया जा सकता है लेकिन ज्ञान और भक्ति ऐसे अनमोल खजाने हैं, जिन्हें कोई नहीं चुरा सकता। मनुष्य जीवन हमें परमात्मा की ओर से दिया गया दुर्लभ उपहार है। अपनी जिम्मेदारियों से पलायन करना कतई उचित नहीं है। धन का सबसे बड़ा सदुपयोग यही है कि वह जरूरतमंद लोगों की आँखों के आंसू पोछने के काम आए। जीवन में दया, करुणा और परमार्थ जैसे गुण ही हमें मानव से महामानव बना सकते हैं।
ये दिव्य विचार हैं श्रीधाम वृंदावन के आचार्य महामंडलेश्वर स्वामी भास्करानंद के, जो उन्होंने शुक्रवार को गीता भवन सत्संग सभागृह में पुरुषोत्तम मास के उपलक्ष्य में चल रहे श्रीमद भागवत ज्ञान यज्ञ के छठे दिन रुक्मणी विवाह सहित विभिन्न प्रसंगों के दौरान उपस्थित जन सैलाब को आशीर्वचन देते हुए व्यक्त किए। कथा में भगवान श्रीकृष्ण और रुक्मणी के विवाह का जबरदस्त उत्सव मनाया गया। वर-वधू पक्ष ने नाचते-गाते हुए बारात के रूप में एकदूसरे का स्वागत पुष्प वर्षा के बीच किया। साध्वी कृष्णानंद द्वारा के बधाई के मधुर गीतों की प्रस्तुतियों ने इस उत्साह को कई गुना अधिक उल्लास से भर दिया। वर-वधू ने एकदूजे को जैसे ही वरमाला पहनाई, सत्संग सभागृह भगवान के जयघोष से गूंज उठा। कथा शुभारंभ के पहले व्यासपीठ का पूजन प्रमुख संयोजक संजय-किरण मंगल, बिनोद-सुनीता अग्रवाल, समाजसेवी प्रेमचंद गोयल, विष्णु बिंदल, अविरल मंगल, राजेश जैन स्विफ्ट, अशोक ऐरन, गोपाल अग्रवाल, विकास अग्रवाल आदि ने किया। विद्वान वक्ता की अगवानी अवनि-अनंत अग्रवाल, विनीता-अक्षत अग्रवाल, दीपचंद गर्ग मोमबत्ती, चंचल अग्रवाल आदि ने की। संयोजक संजय मंगल ने बताया कि कथा का समापन शनिवार 30 मई को दोपहर 3.30 से शाम 7 बजे तक सुदामा चरित्र प्रसंग के पश्चात फूलों की होली के साथ होगा।
महामंडलेश्वर स्वामी भास्करानंद ने कहा कि दुष्ट व्यक्ति कभी भी और कहीं भी पाए जा सकते हैं। रुक्मणी का विवाह भगवान के मन में नारी के प्रति मंगलभाव का सूचक है। भारतीय सनातन संस्कृति में हमारी विवाह पद्धति दुनियाभर में सबसे श्रेष्ठ मानी गई है अन्यथा पश्चिमी देशों में तो विवाह सात दिन और सात माह में ही टूट जाते हैं। वहां विवाह के नाम पर अनुबंध या सौदा होता है जबकि भारत में विवाह का बंधन सात जन्मों के लिए होता है। यही कारण है कि अनेक विदेशी जोड़े भारत आकर हमारी सनातन पद्धति और परम्परा से विवाह रचाते हैं। शुक्रवार को कथा के दौरान महामंडलेश्वरजी ने एकादशी व्रत की महिमा, हमारे शुद्ध और सात्विक भोजन के फायदों तथा अन्य परम्पराओं पर भी अपने प्रेरक विचार व्यक्त किए। उन्होंने कहा कि एकादशी मन को साधने का पर्व है, भोजन के बदले फलाहार या मिष्ठान का सेवन करने का नहीं। हमारा खानपान शुद्ध और सात्विक होना चाहिए। हम बाहर का भोजन ज्यादा खाने लगे हैं। बाजार में मिलने वाला चायनीज फ़ूड कहीं न कहीं मांसाहार वाला होता है इसलिए अपने आहार को शुद्ध और सात्विक बनाए रखें।

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