इंदौर(विनोद गोयल) हमारी संस्कृति में नारी को पहले जगह दी गई है। राम के पहले सीता, कृष्ण के पहले राधा, शंकर के पहले गौरी का नाम लिया जाता है। भारतीय नारी का सच्चा आभूषण उसकी मर्यादा है। हमारा समाज मर्यादा की लक्ष्मण रेखा से जुड़ा है। पश्चिम में मर्यादा नाम की कोई व्यवस्था नहीं होने से घर-परिवार टूटते-बिखरते देर नहीं लगती, लेकिन भारत भूमि की विशेषता यह है कि यहां रिश्ते सात जन्मों के लिए बनते हैं, सात दिनों के लिए नहीं। राम मर्यादा पुरूषोत्तम हैं तो सीता भारतीय आदर्श नारी का प्रतिबिंब। मर्यादा के कारण ही आज हमारा भारतीय समाज न केवल बचा हुआ है बल्कि पूरे विश्व में ऐसे परिवार कहीं और नहीं मिलते। उक्त प्रेरक वाक्य –
बर्फानी धाम के पीछे स्थित गणेश नगर में माता केशरबाई रघुवंशी धर्मशाला परिसर के शिव-हनुमान मंदिर की साक्षी में चल रही रामकथा में शनिवार को प्रख्यात मानस मर्मज्ञ पं. मनोज भार्गव ने राम सीता विवाह प्रसंग की व्याख्या के दौरान व्यक्त किए।

श्रीराम जानकी विवाह का उत्सव मनाया
कथा के दौरान प्रभु श्रीराम जानकी विवाह का उत्सव भी धूमधाम से मनाया गया। जैसे ही वरमाला की विधि संपन्न हुई, कथा पंडाल जय जय सियाराम के उद्घोष से गूंज उठा। ब्रह्मऋषि स्वामी बर्फानी दादा महाराज की प्रेरणा से हो रहे इस अनुष्ठान में आज नर्मदातट गंगा खेड़ी आश्रम से संत रामकिशोर शरणदास अयोध्या वाले के सानिध्य में आयोजन समिति की ओर से तुलसीराम रघुवंशी एवं संयोजक रेवतसिंह रघुवंशी, पार्षद सुनीता-संतोष चोखंडे, राजू तिवारी, राजेश सोलंकी, सिद्धार्थ सिंह सिसोदिया, सारांश रघुवंशी, अरुण शर्मा, गुंजन गंगवाल, रजत शाक्य, पं. कुणाल शर्मा, ज्ञान प्रकाश यादव, बंटी सिंह ठाकुर आदि ने व्यास पीठ का पूजन किया।
कई प्रेरक प्रसंगों का होगा वर्णन
संयोजक रेवतसिंह रघुवंशी के अनुसार कथा में सोमवार 5 जनवरी को श्रीराम वन गमन एवं केवट संवाद, 6 को भरत चरित्र, 7 को पंचवटी निवास, गिद्धराज एवं शबरी चरित्र, 8 को श्रीराम–सुग्रीव मित्रता, 9 को रावण वध एवं रामराज्याभिषेक प्रसंगों की संगीतमय कथा प्रतिदिन दोपहर 1 से 5 बजे तक होगी। विद्वान वक्ता की अगवानी नरेन्द्र मिश्रा, रामचंद्र पाटीदार, रामसिंह राजपूत, मलखान सिंह कुशवाह, देवकरण यादव आदि ने की। संध्या को आरती में सैकड़ों भक्तों ने भाग लिया।
बच्चों के नाम भगवान के नाम पर रखे
पं. भार्गव ने कहा कि हमारे पूर्वजों ने बच्चों के नाम देवी-देवताओं, नदियों और धर्मस्थलों के नाम पर रखे थे, ताकि उनके स्मरण मात्र से ही भगवान के नाम जाप की साधना होती रहे, लेकिन अब ऐसे नाम रखे जाते हैं, कि खुद बच्चों को भी उनके नाम का मतलब पता नहीं होता। अब तो नए-नए नाम ढूंढे जा रहे रहे हैं। नाम भी ऐसे कि न बोलने में अच्छे लगते हैं, न सुनने में लेकिन कुछ नया नाम रखने की जुगाड़ के कारण कई दिनों तक पति-पत्नी में ही विवाद होते रहते हैं। नामकरण के लिए गुरु के बजाय गूगल की मदद ली जा रही है। नाम की महिमा का उदाहरण अजामिल है, जिसको अपने बच्चे नारायण के नाम के कारण घोर पापकर्मों से मुक्ति मिल गई, इसलिए पालकों को चाहिए कि वे बच्चों के नाम ऐसे रखें कि उन्हें पुकारने वाले प्रत्येक व्यक्ति को पुण्य लाभ मिल सके।


