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बंटवारे की पीड़ा और इंसानियत को बयान करता उपन्यास*

*पुस्तक परिचय*

 

बंटवारे की पीड़ा और इंसानियत को बयान करता उपन्यास

भारतीय साहित्य की सबसे बड़ी विशेषता उसकी भाषाई विविधता है। हिन्दी, बंगाली, मराठी, तमिल, मलयालम, पंजाबी, उर्दू और सिंधी जैसी अनेक भाषाओं में ऐसा श्रेष्ठ साहित्य रचा गया, जो अपने समय, समाज और मनुष्य की संवेदनाओं का गहरा दस्तावेज है। दुर्भाग्य यह है कि भारतीय भाषाओं के उत्कृष्ट साहित्य का हिंदी में अपेक्षित स्तर पर अनुवाद नहीं हो पाता। ऐसे समय में सिंधी के चर्चित उपन्यास ‘रात्रि का दूसरा पहर’ का हिंदी अनुवाद साहित्य प्रेमियों के लिए स्वागतयोग्य घटना है। साहित्य अकादमी से सम्मानित लेखक हरि हिमथानी के लगभग दो दशक पहले लिखे गए इस उपन्यास को हाल ही में अशोक मनवानी ने हिंदी पाठकों तक पहुंचाया है। राष्ट्रीय सिंधी भाषा विकास परिषद, भारत सरकार के सहयोग से प्रकाशित यह कृति देश के विभाजन की त्रासदी के बीच मानवीय संबंधों और प्रेम की अनश्वरता को अत्यंत संवेदनशीलता से प्रस्तुत करती है।

उपन्यास का कथानक भारत-पाक विभाजन के उस दौर में विकसित होता है, जब दोनों देशों में भय, हिंसा, विस्थापन और असुरक्षा का वातावरण था। लोग धर्म और पहचान के आधार पर बंट रहे थे। लेकिन, मनुष्य के भीतर का प्रेम, अपनापन और भावनात्मक जुड़ाव तब भी समाप्त नहीं हुआ था। यही इस उपन्यास की मूल संवेदना है। लेखक ने बड़ी खूबसूरती से व्यक्त किया कि राजनीतिक सीमाएं इंसानों को अलग कर सकती हैं, दिलों के रिश्तों को नहीं बांट सकती।

कहानी का नायक ऐंशी परिस्थितियों और भावनाओं के द्वंद्व में जीता है। उसके जीवन में दो स्त्रियां आती हैं जुहरा और रेमी। इन तीनों पात्रों के माध्यम से लेखक ने प्रेम के विभिन्न आयामों को बहुत सहजता से उकेरा है। रेमी, ऐंशी और जुहरा के संबंधों को एक भावनात्मक आधार देती है, लेकिन इसी क्रम में ऐंशी रेमी के प्रति भी आकर्षित होने लगता है। यह आकर्षण केवल दैहिक नहीं, बल्कि आत्मीयता और भावनात्मक निकटता से उपजा है। उपन्यास की सबसे बड़ी शक्ति इसके पात्रों की मानवीयता है। यहां संबंधों में कोई कृत्रिम नाटकीयता नहीं दिखाई देती। रेमी अपने पति ओलाफ के साथ ऐंशी के बीच सहज संबंध बनाए रखती है। तीनों के बीच संवाद, हास्य, शायरी और आत्मीयता का वातावरण पाठक को बांधकर रखता है। लेखक ने प्रेम को किसी सामाजिक बंधन या धार्मिक पहचान से ऊपर रखकर प्रस्तुत किया है।

कहानी का सबसे मार्मिक पक्ष तब सामने आता है, जब विभाजन की भयावह परिस्थितियों में ऐंशी को कराची छोड़कर भारत आना पड़ता है। सिंध में हिंसा और असुरक्षा बढ़ चुकी है। ऐसे समय में जान और धर्म बचाना ही सिंधी हिन्दुओं की पहली प्राथमिकता बन जाता है। ऐंशी बिना जुहरा से अंतिम मुलाकात किए भारत रवाना हो जाता है और यही अधूरापन उसके भीतर लंबे समय तक बना रहता है।

वर्षों बाद अजमेर में दोनों की आकस्मिक मुलाकात उपन्यास को एक भावनात्मक ऊंचाई प्रदान करती है। जुहरा अपने पति और परिवार के साथ दरगाह शरीफ आई है और स्टेशन पर उसकी मुलाकात ऐंशी से हो जाती है। इस प्रसंग में लेखक ने अत्यंत सादगी और गरिमा के साथ उन भावनाओं को व्यक्त किया है, जिन्हें शब्दों से अधिक आंखें समझती हैं। दोनों के बीच कोई नाटकीय संवाद नहीं, बल्कि मौन का एक गहरा रिश्ता दिखाई देता है। यही मौन इस उपन्यास की सबसे बड़ी ताकत बन जाता है।

‘रात्रि का दूसरा पहर’ केवल प्रेम कहानी नहीं है, बल्कि यह मानवीय संबंधों की गरिमा, सांप्रदायिक सौहार्द और विभाजन की पीड़ा का संवेदनशील दस्तावेज भी है। लेखक ने यह स्थापित किया कि निःस्वार्थ प्रेम और आपसी सम्मान किसी भी धर्म या सीमा से कहीं अधिक बड़े होते हैं। हिंदी अनुवाद में अशोक मनवानी की मेहनत स्पष्ट दिखाई देती है। भाषा सहज, प्रवाहपूर्ण और मूल संवेदना के अनुरूप है। यह उपन्यास पाठक को अंत तक बांधे रखता है और पढ़ने के बाद लंबे समय तक भीतर एक गहरी उदासी और आत्मीयता छोड़ जाता है

भारत का विभाजन विभिन्न प्रतियोगी परीक्षाओं में शामिल होने वाले विद्यार्थियों के लिए भी अध्ययन का विषय है। इसे पढ़कर तत्कालीन परिस्थितियों को जानना महत्वपूर्ण है।

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पुस्तक : रात्रि का दूसरा पहर (सिंधी)लेखक : हरि हिमथानी

हिंदी अनुवाद : अशोक मनवानी मूल्य : 200 रुपए

प्रकाशक : राष्ट्रीय सिंधी भाषा विकास परिषद, नई दिल्ली

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