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अहंकार और अभिमान है अनेक बुराइयों की जड़ – प.पू. आदित्य मुनि म.सा.

अहंकार और अभिमान है अनेक बुराइयों की जड़ – प.पू. आदित्य मुनि म.सा.

साधुमार्गी जैन समता संघ के तत्वावधान में बैकुंठ धाम कॉलोनी साकेत नगर की धर्म सभा में हुए प्रेरक आशीर्वचन

इंदौर। हीनता और श्रेष्ठता, दोनों ही आत्मिक प्रगति में बाधक हैं। जीवन में आगे बढ़ने के लिए समता का भाव होना चाहिए क्योंकि समता ही आत्मा का स्वाभाव है और समभाव ही सच्चे सुख का आधार है। जिस दिन मनुष्य को शरीर और आत्मा का वास्तविक भेद समझ में आ जाएगा, उस दिन वह दुःख के मार्ग से हटकर सुख, शांति और आत्मकल्याण के राजपथ पर सरपट दौड़ता चला जाएगा। अहंकार और अभिमान अनेक बुराइयों की जड़ है।

ये दिव्य विचार हैं प.पू. आचार्य रामेश के सुशिष्य शासन दीपक प.पू. आदित्य मुनि महाराज के, जो उन्होंने बुधवार को साकेत नगर, बैकुंठ धाम में साधुमार्गी जैन समता संघ के तत्वावधान में आयोजित धर्मसभा में व्यक्त किए। आचार्य भगवन प.पू. रामलाल म.सा. के शिष्य प.पू. आदित्य मुनि म.सा. एवं अटलमुनि म.सा. अदिठाना द्वारा बैकुंठ धाम कॉलोनी में बड़े गार्डन के सामने नियमित रूप से प्रवचनों की अमृत वर्षा की जा रही है। गुरुवार को भी सुबह 9 से 10 बजे तक मुनिश्री के प्रवचनों की अमृतवर्षा बैकुंठ धाम पर होगी। मीडिया प्रभारी मनीष बोहरा ने बताया कि इंदौर में प.पू. आदित्य मुनि म.सा. के मंगल प्रवेश के पश्चात प्रतिदिन उनके मुख से प्रवाहित हो रही धर्म वाणी का पुण्य लाभ उठाने के लिए बड़ी संख्या में श्रद्धालुजन धर्म, ध्यान एवं आत्मचिंतन से जुड़कर जीवन को श्रेष्ठ दिशा प्रदान कर रहे हैं।

मुनिश्री ने कहा कि धन, परिवार, पद, प्रतिष्ठा और यहाँ तक कि शरीर भी वास्तव में हमारा नहीं है। सम्यकत्व दृष्टि से जीव को यह अनुभूति हो जाती है। आत्मा और भौतिक पदार्थ सर्वथा भिन्न हैं। जब यह भेद ज्ञान प्रकट होता है, तब मनुष्य जीवन के प्रति एक नई दृष्टि प्राप्त करता है। शरीर को होने वाली पीड़ा, मान-अपमान, लाभ-हानि आदि शरीर और संसार से सम्बन्धित हैं, आत्मा से नहीं। जिसे यह ज्ञान हो जाता है, वह व्यक्ति आस्त्य रहित, समभाव युक्त एवं निराभिमानी जीवन जीता है। वह शरीर को मैं नहीं मानता बल्कि स्वयं को शुद्ध आत्मा के रूप में अनुभव करने का प्रयास करता

है।

 

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