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मन्दिर केवल आने-जाने या घूमने-फिरने की जगह नहीं, भगवान से आत्मीय संवाद और जीवन की दिशा पहचानने का स्थान – सुधासागर म.सा.

मन्दिर केवल आने-जाने या घूमने-फिरने की जगह नहीं, भगवान से आत्मीय संवाद और जीवन की दिशा पहचानने का स्थान – सुधासागर म.सा.

दलाल बाग पर चल रहे चातुर्मास के दिव्य और भव्य आयोजन में कल भगवान पारसनाथ को चढ़ेगा तीन क्विंटल का लाडू

 

इंदौर। मंदिर केवल हमारे लिए आने-जाने या घूमने-फिरने का स्थान नहीं बल्कि भगवान से आत्मीय संवाद करने और अपने जीवन की दिशा पहचानने का स्थान है। जैसे बाँध पानी के नीचे की ओर बहते प्रवाह को रोककर उसकी शक्ति को ऊर्जावान दिशा देता है। वैसे ही संयम भी हमारी नीचे की ओर बहने वाली इन्द्रिय शक्ति और वासनाओं को रोककर आत्मिक ऊर्जा को उर्ध्वमुखी बनाता है।

ये दिव्य विचार हैं संत शिरोमणि प.पू. विद्यासागर म.सा. के परम प्रभावक शिष्य और राष्ट्रसंत मुनि पुंगव प.पू. श्री सुधासागर महाराज के, जो उन्होंने सोमवार को सकल दिगम्बर जैन धर्म प्रभावना समिति के तत्वावधान में दलाल बाग के विशाल विद्या-सुधा सत्संग मंडप में चल रहे चातुर्मास के दौरान उपस्थित देशभर से आए श्रद्धालुओं को संबोधित करते हुए व्यक्त किए। मंच का संचालन अर्चना-दिलीप गोधा ने किया और आभार माना आकाश जैन कोयला ने।

कल भगवान पारसनाथ का निर्वाण दिवस – चातुर्मास आयोजन समिति के शिवानी-नवीन गोधा, तृप्ति-हर्ष जैन, अंतिका-आनंद गोधा एवं सपना-मनीष गोधा ने बताया कि 19 अगस्त को भगवान पारसनाथ का निर्वाण दिवस दलाल बाग पर धूमधाम से मनाया जाएगा। सुबह 8 बजे तीन क्विंटल का निर्वाण लाडू समर्पित किया जाएगा। इस मौके पर महिलाओं के लिए लाडू सजावट स्पर्धा भी रखी गई है। पर्यूषण महापर्व पर 15 सितम्बर से श्रावक संस्कार शिविर का आयोजन भी होगा जिसके लिए पंजीयन प्रारम्भ हो गए हैं। दलाल बाग पर प्रतिदिन सुबह 8 से 9.30 बजे तक राष्ट्रसंत की अमृत वर्षा का क्रम जारी है।

राष्ट्रसंत ने अपने आशीर्वचन में कहा कि भगवान को केवल मंदिर में विराजमान प्रतिमा मानकर मात्र दर्शन करके लौटना पर्याप्त नहीं है। उनके साथ हमें आत्मीय सम्बन्ध बनाना होंगे। भगवान के साथ हमारे भाव ऐसे होना चाहिए कि हे भगवान, आप मेरे है, मैं आपका हूँ। मैं आपके पास आया हूँ, कुछ समय आपके साथ बैठा हूँ और अब जब जा रहा हूँ तो अपने जीवन की दिशा भी आपके सामने स्पष्ट करके जाऊं। यही हमारा मंदिर आने का वास्तविक उद्देश्य होना चाहिए। राष्ट्रसंत ने कहा कि घर से मंदिर आते समय हम बताते हैं कि हम कहाँ जा रहे हैं लेकिन मंदिर से जाते समय हमारे अंदर यह बताने का साहस भी होना चाहिए कि अब हम कहाँ जा रहे हैं क्योंकि भगवान को अपना मानने का अर्थ केवल मंदिर आना नहीं बल्कि अपने जीवन की दिशा भी भगवान के सामने स्पष्ट करना है। संत स्वयं के लिए नहीं समाज के लिए चातुर्मास करते हैं। चातुर्मास केवल एक धार्मिक आयोजन नहीं बल्कि अपने जीवन को बदलने, संयम सीखने और आत्म कल्याण के मार्ग पर आगे बढ़ने का दुर्लभ अवसर है इसलिए संतों के सानिध्य में मिले प्रत्येक क्षण का सदुपयोग करना चाहिए।

 

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