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बाबा अमरनाथ का समय से पहले पिघलना प्रकृति की गंभीर चेतावनी, अब सभी धर्मों, संतों, कवियों और कलाकारों को पर्यावरण संरक्षण का जनजागरण करना होगा : कृष्णा गुरुजी

बाबा अमरनाथ का समय से पहले पिघलना प्रकृति की गंभीर चेतावनी, अब सभी धर्मों, संतों, कवियों और कलाकारों को पर्यावरण संरक्षण का जनजागरण करना होगा : कृष्णा गुरुजी

अंतरराष्ट्रीय आध्यात्मिक चिंतक, कलियुग पुराण के रचयिता एवं दिव्य एस्ट्रो हीलिंग के संस्थापक कृष्णकांत मिश्रा ‘कृष्णा गुरुजी’ ने कहा कि बाबा अमरनाथ के प्राकृतिक हिमलिंग का समय से पहले पिघलना समाज के लिए प्रकृति की ओर से एक गंभीर चेतावनी है। इसे किसी एक धर्म या आस्था तक सीमित न मानकर संपूर्ण मानव समाज के लिए प्रकृति का संदेश समझने की आवश्यकता है। यदि आज भी मानव प्रकृति संरक्षण के प्रति गंभीर नहीं हुआ, तो आने वाली पीढ़ियों को इसके और भी गंभीर परिणाम भुगतने पड़ सकते हैं।

उन्होंने कहा कि ऋग्वेद पंचमहाभूत—पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु और आकाश—के संरक्षण का संदेश देता है। प्रकृति की रक्षा ही सबसे बड़ा धर्म, सबसे बड़ी सेवा और मानवता के प्रति सबसे बड़ी जिम्मेदारी है।

गोस्वामी तुलसीदास की चौपाई का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा—

“संत बिटप सरिता गिरि धरनी। परहित हेतु सबन्ह कर करनी॥”

अर्थात संत, वृक्ष, नदियाँ, पर्वत और धरती का अस्तित्व परोपकार के लिए है। बसंत आता है तो प्रकृति मुस्कुराती है और संत आते हैं तो संस्कृति मुस्कुराती है। अब समय आ गया है कि प्रकृति और संस्कृति को पुनः एक सूत्र में जोड़ा जाए।

कृष्णा गुरुजी ने कहा कि देश का संत समाज, विभिन्न धार्मिक संस्थाएँ, आश्रम, गुरुद्वारे, चर्च, मस्जिदें तथा अन्य धार्मिक संगठन शिक्षा, स्वास्थ्य, भोजन और सेवा के अनेक कार्य कर रहे हैं। अब समय की आवश्यकता है कि पर्यावरण संरक्षण को भी हर धार्मिक और सामाजिक अभियान का अभिन्न हिस्सा बनाया जाए।

उन्होंने कहा कि कथा, प्रवचन, सत्संग, नमाज़, कीर्तन, गुरुबाणी, उपदेश, प्रार्थना सभा या किसी भी धार्मिक आयोजन से यदि वृक्षारोपण, जल संरक्षण, नदी स्वच्छता और “एक पेड़ माँ के नाम” का संदेश भी दिया जाए, तो करोड़ों लोगों तक प्रकृति संरक्षण की चेतना पहुँच सकती है।

कृष्णा गुरुजी ने कहा कि आज अधिकांश लोग अपनी अगली पीढ़ी के लिए धन-संपत्ति छोड़ने की चिंता करते हैं, लेकिन प्रकृति की संपत्ति बढ़ाने की चिंता बहुत कम करते हैं। आने वाली पीढ़ियों को सबसे बड़ी विरासत धन नहीं, बल्कि स्वच्छ जल, शुद्ध वायु, हरे-भरे वृक्ष और सुरक्षित पर्यावरण मिलना चाहिए।

उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के “एक पेड़ माँ के नाम” अभियान का स्वागत करते हुए कहा कि यदि सभी धर्मों के धर्मगुरु, संत, कथा-वाचक, कवि, साहित्यकार, कलाकार और समाज के प्रभावशाली लोग इस अभियान को अपने-अपने मंचों से जन-जन तक पहुँचाएँ, तो यह विश्व का सबसे बड़ा पर्यावरण जनआंदोलन बन सकता है।

कृष्णा गुरुजी ने बताया कि उन्होंने सोशल मीडिया मंच X के माध्यम से देश के प्रमुख संतों, विभिन्न धर्मों के धार्मिक नेताओं, कथा-वाचकों, कवियों, साहित्यकारों और फिल्म कलाकारों को टैग कर तथा पत्र एवं ईमेल भेजकर विनम्र आग्रह किया है कि वे अपने-अपने मंचों से प्रकृति संरक्षण का संदेश समाज तक पहुँचाएँ।

उन्होंने कहा, “जब सत्ता लड़खड़ाती है तो कवि की कलम उसे संभालती है। आज प्रकृति लड़खड़ा रही है। इसलिए संतों की वाणी, धर्मगुरुओं का मार्गदर्शन, कवियों की कलम और कलाकारों की लोकप्रियता—सभी को मिलकर पृथ्वी को बचाने का अभियान चलाना होगा।”

अंत में कृष्णा गुरुजी ने कहा—

“बाबा अमरनाथ का समय से पहले पिघलना समाज के लिए प्रकृति की ओर से एक गंभीर चेतावनी है। अब समय आ गया है कि धर्म, समाज, साहित्य, कला और विज्ञान—सभी मिलकर प्रकृति संरक्षण को मानवता का साझा अभियान बनाएँ। प्रकृति बचेगी तो संस्कृति बचेगी, संस्कृति बचेगी तो मानवता बचेगी। आज के युग में सबसे बड़ा दान है—’एक पेड़ माँ के नाम’। यही आने वाली पीढ़ियों के प्रति हमारी सबसे बड़ी जिम्मेदारी है।”

 

— कृष्णकांत मिश्रा ‘कृष्णा गुरुजी‘

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