मां नर्मदा की परिक्रमा करने के दौरान कुछ नियमों का पालन करना अनिवार्य होता है। यदि मां नर्मदा की परिक्रमा के दौरान नियमों का पालन नहीं किया जाता है तो परिक्रमा से मिलने वाला पुण्य का क्षय हो जाता है। मां नर्मदा के दक्षिण तट से उत्तर की ओर परिक्रमा करनी चाहिए। इसके साथ ही मां नर्मदा नदी को कभी भी पार नहीं करना चाहिए। नर्मदा की परिक्रमा मां नर्मदा को दाहिनी ओर रख कर करना चाहिए इसके साथ ही नर्मदा परिक्रमा में इन नियमों का पालन किया जाता है।
मां नर्मदा की पूजा से करें शुरूआत
नर्मदा परिक्रमा पवित्र नर्मदा नदी के तट पर किसी भी विशिष्ट स्थान से शुरू की जा सकती है, लेकिन यात्रा शुरू करने से पहले परिक्रमावासी को माँ नर्मदा की पूजा करनी चाहिए और उनसे प्रार्थना करनी चाहिए कि वे उसकी रक्षा करें। परिक्रमा आरंभ् करने के पूर्व नर्मदा जी में संकल्प करें। माई की कडाही याने हलुआ जैसा प्रसाद बनाकर कन्याओं, साधु-ब्राह्मणों तथा अतिथि अभ्यागतों को यथाशक्ति भेजन कराना चाहिए।
मां नर्मदा के नाप का जप
मां नर्मदा का दूसरा नाम ‘रेवा’ है। परिक्रमावासी को यात्रा के दौरान मन में सदैव ‘रेवा’ शब्द का उच्चारण करते रहना चाहिए। या मां नर्मदा के नाम का जप करना चाहिए हमेशा नर्मदा नदी के किनारे चलने का प्रयास करना चाहिए और नदी को अपने दाहिने हाथ की ओर रख कर चलना चाहिए। उसे नदी से बहुत दूर नहीं जाना चाहिए, लेकिन भौगोलिक कारणों से ऐसा करना संभव नहीं है। दक्षिण तट की प्रदक्षिणा नर्मदा तट से 5 मील से अधिक दूर और उत्तर तट की प्रदक्षिणा साढे सात मील से अधिक दूर से नहीं करना चाहिए। यदि किसी परिक्रमावासी को पवित्र नर्मदा नदी से दूर जाने की आवश्यकता हो, तो उसे पवित्र नदी के जल को लोटे में लेकर उसकी पूजा करनी चाहिए। और साथ में रख कर परिक्रमा करनी चाहिए।
नंगे पांव करते है मां की परिक्रमा
नर्मदा परिक्रमा के दौरान परिक्रमावासी को नंगे पैर चलना चाहिए और दो दिन से ज़्यादा का खाना साथ नहीं रखना चाहिए। उसे अपना सामान खुद उठाना चाहिए। किसी भी ढोने वाले या मज़दूर को उसकी मदद करने की अनुमति नहीं है।
रास्ते में एक आतिथ्य स्वीकार करना
नर्मदा परिक्रमा के दौरान ऐसा कहा गया है कि परिक्रमावासी को जो भी लोग आतिथ्य के रुप में बुलाएं उसे उसका आतिथ्य स्वीकार करना चाहिए। इसके साथ ही यह भी कहा गया है कि परिक्रमावासी को भिक्षा मांग कर अपनी यात्रा को करना चाहिए। ऐसा करने से परिक्रमा वासी के अपने अभिमान को त्यागने में सहायता मिलती है। अहम का भाव खत्म होता है।
नर्मदा के जल ही पीना चाहिए
नर्मदा परिक्रमा के दौरान प्रतिदिन नर्मदा जी में ही स्नान करना चाहिए। नर्मदा जल का ही जलपान करना चाहिए। व्यर्थ का वाद-विवाद, पराई निदा, चुगली नही करना चाहिए। वाणी का संयम बनाए रखना चाहिए सदैव सत्यवादी रहना चाहिए।
भजन कीर्तन और पूजा करना चाहिए
परिक्रमा वासियों को प्रतिदिन गीता, रामायणादि का पाठ भी करते रहना उचित है। इसके साथ ही जप भी करते रहना चाहिए।
चातुर्मास में नहीं करें परिक्रमा
चतुर्मास में परिक्रमा न करें। देवशयनी आषाढ शुक्ल एकादशी से कार्तिक शुक्ल एकादशी तक सभी गृहस्थ चतुर्मास मानते हैं।इस दौरान नर्मदा के किनारे ही रह कर पूजा पाठ करने का विधान है।
बह्मचर्य का पालन करें
परिक्रमा काल के दौरान बाल न कटवायें। नख भी बारंबार न कटावें। वानप्रस्थी का व्रत लें, ब्रह्मचर्य का पूरा पालन करें। सदाचार अपनायें रहें। श्रृंगार की दृष्टि से तेल आदि कभी न लगावें। साबुन का प्रयोग न करें। शुद्ध मिट्टी का सदा उपयोग करें।
शिव अभिषेक करके पूर्ण होती परिक्रमा
परिक्रमा अमरकंटक से प्रारंभ करे या ओंकारेश्वर से भी परिक्रमा शुरू करने का महत्व है। परिक्रमा वापस जहां से शुरू की है वही पूर्ण की जाती है। परिक्रमा परिपूर्ण हो जाए तब किसी भी एक स्थान पर जाकर भगवान शंकर जी का अभिषेक कराए। मुण्डनादि कराकर विधिवत् पुनः स्नानादि, नर्मदा मैया की कढाई उत्साह और सामर्थ्य के अनुसार करें। इस तरह की गई परिक्रम से ही मां नर्मदा की परिक्रमा पूर्ण की जाती है।


