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अब वाकई अलविदा कह गए बल्लभ डोभाल

अब वाकई अलविदा कह गए बल्लभ डोभाल….

आचार्य अरुण

 

करीब आधी सदी निरंतर सृजनरत रहने वाले यायावर साहित्यकार बल्लभ डोभाल 29 अगस्त को फानी दुनिया को अलविदा कह गए। अपनी साहित्यिक यात्रा में उन्होंने बंधन मुक्त जीवन जिया और कोई नौकरी स्वीकार नहीं की। बल्लभ डोभाल द्वारा पाठकों को सौंपी 44 पुस्तकें उनकी सृजन साधना की गवाह हैं।

लेकिन विडंबना देखिए कि केंद्रीय प्रकाशन विभाग ने उन्हें पहले ही मृत घोषित कर दिया था। यह संवेदनहीनता की पराकाष्ठा ही कही जाएगी कि कोई साहित्यकार तमाम पारिवारिक दुखों को बर्दाश्त करते हुए, उम्र के दसवें दशक में भी सृजन साधना में लगा हो और सरकार का प्रकाशन विभाग कह दे कि आप दिवगंत हैं। बकायदा विभाग उनके घर पत्र भेजकर कहे कि रायल्टी की धनराशि प्राप्त करने के लिये उनके उत्तराधिकारियों द्वारा साहित्यकार का डेथ सर्टिफिकेट और कोर्ट द्वारा प्रमाणित विल की प्रति विभाग को भिजवा दें ताकि उन्हें रायल्‍टी का भुगतान किया जा सकें ।

व्यापक सृजन करने वाले बल्लभ डोभाल गर्मियों में हिमाचल वाले घर में चले आते रहे हैं और सर्दियों में नोयडा चले जाते हैं। कला-संस्कृति के मर्मज्ञ रचनाकार राजेंद्र शर्मा बताते हैं कि कथाकार बल्‍लभ डोभाल के 97वें जन्‍मदिन के अवसर पर कुछ समय पूर्व कवि, लेखक, पत्रकार उनके नोएडा के सेक्‍टर 12 स्थित आवास पर बधाई देने पहुचें तो पत्‍नी और जवान पुत्र के आकस्मिक निधन से दुखी बल्‍लभ डोभाल ने कहा कि मेरा जन्‍मदिन क्‍यों मना रहे हो, मैं तो सरकारी कागजों में मर चुका हॅू।

वहां बल्‍लभ डोभाल की यह बात सुन सभी स्तब्ध रह गये । कथाकार बल्‍लभ डोभाल ने दुखी मन से बताया कि सूचना और प्रसारण मंत्रालय के तहत प्रकाशन विभाग उनके दो बाल उपन्‍यास चालीस सालों से प्रकाशित कर रहा है किन्‍तु साल 2018 में प्रकाशन विभाग से उनके पते पर पत्र आया कि उक्‍त दो बाल उपन्यासों की रायल्टी देय है। चूंकि बल्‍लभ डोभाल की मृत्यु हो चुकी है, अत: रायल्टी की धनराशि प्राप्त करने के लिये उनके वारिसान बल्‍लभ डोभाल का मृत्यु प्रमाणपत्र और अदालत द्वारा प्रमाणित बल्‍लभ जी की वसीयत की प्रति प्रकाशन विभाग को भेज दें तभी उनकी पुस्तकों की रायल्‍टी का भुगतान देने संभव होगा।

जीवन भर कहानियां-उपन्यास आदि विधाओं में लिखने वाले बल्‍लभ डोभाल प्रकाशन विभाग के इस रवैये से गहरे तक क्षुब्‍ध हुए। यही वजह है कि आज तक उस पत्र का जवाब तक नहीं दिया और प्रकाशन विभाग ने भी इस संबध में आगे कोई कार्यवाही करना मुनासिब नहीं समझा । प्रकाशन विभाग आज भी उनके उपन्‍यास प्रकाशित कर बिक्री कर रहा है ।

दिल्ली में सेवारत कंप्यूटर इंजीनियर व एक साहित्यिक संस्था डब्ल्यू.बी,एस फाउंडेशन के संस्थापक नीरज जैन घटना से गहरे आहत हुए। नीरज जैन ने महसूस किया कि यह सूचना बेहद कष्टकारी है । बल्‍लभ डोभाल जी की साहित्य के क्षेत्र में व्यापक प्रतिष्ठा है। उनकी कहानियां प्रेमचंद के पुत्र और ’कहानी पत्रिका’ के संपादक श्रीपतराय प्रमुखता से प्रकाशित करते रहे हैं। आखिर कोई संस्थान कैसे जीते जी किसी रचनाकार को मृत घोषित कर सकता है। निश्चय ही यह विभाग की सवेंदनहीनता की पराकाष्‍ठा है ।

इस घटना ने नीरज जैन को उद्वेलित किया। वे बल्लभ डोभाल के घर पहुंचे और जीवनोपयोगी वस्तुओं के साथ उनकी आर्थिक मदद की। उन्होंने प्रतिमाह उन्हें आर्थिक मदद देने की वायदा किया। विडंबना यह है कि डोभाल जी के पास एटीएम कार्ड व बैंक सुविधा नहीं है। अतः नीरज जैन ने हर माह उनकी मदद के लिये उनके पास जाने का फैसला किया। वे नियमित रूप से खाने पीने व अन्य जीवन उपयोगी वस्तुएं देने उनके घर जाते हैं। साहित्यिक आयोजनों और साहित्यकारों की मदद के लिये नीरज जैन ने डब्ल्यू.बी.एस फाउंडेशन की स्थापना की। संस्था का उद्देश्य भारतीय कला,साहित्य व संस्कृति को बढ़ावा देना है। साथ ही शिक्षा,स्वास्थ्य,रोजगार और अन्य सामाजिक क्षेत्रों में उच्चतम मूल्यों का पालन करते हुए योगदान देने की कोशिश करना है।वे गाहे-बगाहे साहित्यकारों की मदद के लिये आगे आते हैं।

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