चार राज्यों की 21 पोल्ट्री यूनिट्स की जांच में पशु कल्याण, स्वच्छता और जैव-सुरक्षा से जुड़ी व्यापक चिंताएं सामने आईं
सेंटिएंट की जांच में बैटरी केज में मुर्गियों को बेहद कम जगह में रखने, बड़े पैमाने पर चोटों और चोंच काटने, कचरा प्रबंधन की खराब व्यवस्था और लेयर मुर्गियों की यूनिट्स में सीमित जैव-सुरक्षा का खुलासा
भारत: सेंटिएंट ने आज हरियाणा, पंजाब, मध्य प्रदेश और तमिलनाडु की 21 लेयर-मुर्गी पोल्ट्री यूनिट्स की जांच के निष्कर्ष जारी किए। इसमें जांच की गई सभी यूनिट्स में पशु कल्याण, स्वच्छता, कचरा प्रबंधन और जैव-सुरक्षा से जुड़ी व्यापक चिंताएं सामने आईं।
जांच में बैटरी-केज सिस्टम का इस्तेमाल करने वाली निजी पोल्ट्री यूनिट्स को शामिल किया गया। इन यूनिट्स की अनुमानित क्षमता करीब 3,000 से 2,00,000 मुर्गियों तक थी। कई जगहों पर बार-बार एक जैसी समस्याएं सामने आईं। इससे संकेत मिलता है कि खराब पशु कल्याण और प्रबंधन की स्थिति कुछ अलग-अलग घटनाओं तक सीमित नहीं थी, बल्कि रोजमर्रा के कामकाज का हिस्सा थी।
जांचकर्ताओं ने मुर्गियों को बेहद कम जगह में रखने और उनके बीच लड़ाई की स्थिति दर्ज की। सभी यूनिट्स में बड़ी संख्या में मुर्गियां घायल मिलीं। देखी गई लगभग सभी मुर्गियों की गर्दन के आसपास चोटें थीं, जो संभवत: पिंजरे की धातु की सलाखों से बार-बार रगड़ लगने के कारण हुई थीं। पंखों में चोट, पैर टूटना, खून निकलना, त्वचा संबंधी समस्याएं और गंभीर शारीरिक कमजोरी भी देखी गई। कुछ मुर्गियां खड़ी होने की स्थिति में भी नहीं थीं।
’21 यूनिट्स में हमारे जांचकर्ताओं ने जो स्थिति दर्ज की, उसकी एक जैसी तस्वीर बेहद चिंताजनक है। मुर्गियों को बेहद कम जगह में रखना, नियमित रूप से चोंच काटना, चोटों का इलाज न करना, कचरे का खराब प्रबंधन और कमजोर जैव-सुरक्षा जैसी व्यवस्थाओं को सामान्य कामकाज का हिस्सा नहीं माना जाना चाहिए। ये निष्कर्ष उन मानकों और जमीन पर जानवरों व कर्मचारियों को वास्तव में मिलने वाली परिस्थितियों के बीच एक बड़ी व्यवस्था संबंधी कमी की ओर इशारा करते हैं। पोल्ट्री उत्पादन पशु कल्याण, स्वच्छता या जनस्वास्थ्य की कीमत पर न हो, यह सुनिश्चित करने के लिए सख्त निगरानी, नियमित निरीक्षण और जवाबदेही की जरूरत है,’ सेंटिएंट के सीईओ अभिषेक पांडे ने कहा।
जिन यूनिट्स का दौरा किया गया, उनमें चोंच काटना एक नियमित प्रक्रिया के रूप में सामने आया। देखभाल करने वालों ने बताया कि मुर्गियों की यह प्रक्रिया की जाती है। वहीं, जांचकर्ताओं ने चोंच काटने से जुड़ी चोटें और खून निकलने के मामले भी दर्ज किए। एक यूनिट में एक कर्मचारी को यह प्रक्रिया करते हुए देखा गया और उसने जांचकर्ता को भी इसमें शामिल होने के लिए कहा।
जांच में मुर्गियों के बीच काफी तनाव के संकेत भी सामने आए। लोगों के पास आते ही मुर्गियां लगातार तेज आवाज में बोलतीं और उनमें डर की स्पष्ट प्रतिक्रिया दिखाई देती थी। पिंजरों में सीमित जगह को लेकर उनके बीच प्रतिस्पर्धा और आक्रामकता भी देखी गई। बताया गया कि कमजोर मुर्गियों पर हमला किया जाता था और कुछ मामलों में उन्हें मार भी दिया जाता था। जांचकर्ताओं ने कर्मचारियों द्वारा पक्षियों के साथ रूखे तरीके से पेश आने के मामले भी दर्ज किए। इसमें चूजों को फेंकना और चोंच काटने के बाद उन्हें जोर-जोर से पकड़ना भी शामिल था।


