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जब अनाज का अकाल होता है तो मानव मरता है लेकिन जब संस्कारों का अकाल हो तो मानवता मर जाती है – पं. मुखिया

जब अनाज का अकाल होता है तो मानव मरता है लेकिन जब
संस्कारों का अकाल हो तो मानवता मर जाती है – पं. मुखिया

दशा नीमा समाज द्वारा मालगंज धर्मशाला पर भगवान की बाल लीलाओं का जीवंत उत्सव मनाया गया, आज रुक्मणी विवाह

इंदौर। भारतीय समाज सौलह संस्कारों से मर्यादित और अलंकृत समाज है। संस्कारों और मर्यादा का पालन ही सनातन संस्कृति की पहचान है। वर्तमान में समाज संस्कारों और संस्कृति से विमुख होता जा रहा है। समाज में पाश्चात्य संस्कृति जैसी विकृतियाँ पनप रही हैं। इन विकृतियों का मुकाबला तभी संभव है जब हम सनातन संस्कृति को और अधिक समृद्ध बनाएं तथा हमारी नई पौध को संस्कारों के पर्यावरण में ढालें। जब अनाज का अकाल होता है तो मानव मरता है लेकिन जब संस्कारों का अकाल हो तो मानवता मर जाती है। संस्कारों से बड़ी कोई वसीयत नहीं और ईमानदारी से बड़ी कोई विरासत नहीं।
ये दिव्य विचार हैं प्रख्यात भागवताचार्य पं. आदित्य मुखिया के, जो उन्होंने गुरुवार को श्री दशा नीमा पंचायत ट्रस्ट द्वारा मालगंज चौराहा स्थित नवश्रृंगारित धर्मशाला भवन पर ट्रस्ट के हीरक जयंती महोत्सव एवं पुरुषोत्तम मास के उपलक्ष्य में चल रहे भागवत ज्ञान यज्ञ में भगवान की बाल लीला एवं गोवर्धन पूजा प्रसंगों की व्याख्या के दौरान व्यक्त किए। कथा में दशा नीमा पंचायत के ट्रस्टी अशोक नीमा-उर्मिला नीमा, अजय नीमा अलंकार-मंजू नीमा, अनिल के नीमा-शकुन नीमा आदि ने व्यास पीठ का पूजन किया। विद्वान वक्ता की अगवानी अध्यक्ष सत्यनारायण नीमा, कमल-रेखा नीमा, सतीश-अनिता नीमा मालक, महेश सुषमा नीमा आदि ने की। कथा में भगवान की लीलाओं का मनोहारी चित्रण भी किया गया और जीवंत उत्सव भी मनाया गया। फूलफाग मनोरथ से सभी वैष्णव बंधु आल्हादित होकर नाच उठे। संचालन जौहरी अजय नीमा ने किया।
संयोजक सतीश नीमा मालक एवं अध्यक्ष सत्यनारायण नीमा ने बताया कि कथा में शुक्रवार 5 जून को रासलीला एवं रुक्मणी विवाह प्रसंगों की कथा होगी। कथा प्रतिदिन शाम 4 से 7 बजे तक चल रही है। कथा में शनिवार 6 जून को सुदामा चरित्र प्रसंग के साथ पूर्णाहुति होगी। बुरहानपुर के भजन गयल विपिन पुरोहित और शुभम शर्मा के साथ तबला वादक जितेन्द्र बालके, पुष्कर शर्मा और नारायण पाटीदार की संगत ने इस उत्सव का उल्लास कई गुना बढ़ा दिया। भक्तों की बढती संख्या के कारण आज कथा स्थल छोटा पड़ गया और एलईडी स्क्रीन लगाना पड़ी।
भागवताचार्य पं. मुखिया ने कहा कि जिस दिन से हमारा मन दूसरों के लिए अच्छा सोचना प्रारम्भ कर देता हैं उसी दिन से हमारे जीवन में शांति का प्रवेश हो जाता है। जिस दिन हमारे भाग्य की रोटी किसी का पेट भरती है, समझ लेना कि ईश्वर ने आपका भोजन स्वीकार कर लिया है। विचारों से मुक्त होने की कला का नाम ही ध्यान है। पूरी दुनिया में प्रेम, आदर और सम्मान का अकाल पड़ा हुआ है क्योंकि लेना सभी चाहते हैं पर देना कोई नहीं चाहता। सच एक, चेहरे अनेक, जुदा-जुदा अंदाज, जुदा-जुदा मिजाज। क्रोध अगर दिल से निकलकर जिव्हा पर आ जाए तो सारी मर्यादाएं भूल जाता है। वही क्रोध अगर दिमाग में चला जाए तो सिर्फ मंथन से ही उसका आवेग कम हो जाता है। भगवान कृष्ण ने ब्रज क्षेत्र को इंद्र के अहंकार से बचाने के लिए यह लीला की। भगवान की सभी लीलाएँ जीव मात्र के कल्याण के लिए ही होती हैं और उनमें किसी भी तरह का पक्षपात या भेदभाव नहीं होता। आज समाज में हर जगह श्रेय लेने की होड़ मची रहती है लेकिन भगवान ने गोवर्धन पर्वत को एक ऊँगली पर उठा लेने का श्रेय अपने बाल सखा ग्वालों को दिया। इस लीला में यह सन्देश मौजूद है कि श्रेय लेने में अपने साथियों को भी आगे लाने की प्रवृत्ति होना चाहिए।

 

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