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जल ही शक्ति, एक-एक बूँद का सदुपयोग करना हीभीसच्ची सेवा, नर्मदा अमृतधारा देने वाली संजीवनी

जल ही शक्ति, एक-एक बूँद का सदुपयोग करना हीभीसच्ची सेवा, नर्मदा अमृतधारा देने वाली संजीवनी

खजराना गणेश मन्दिर पर चल रहे नर्मदा चिंतन ज्ञान यज्ञ में तपोनिष्ठ संत दादागुरु भगवान ने हजारों भक्तों को दिलाया संकल्प

इंदौर। भारत वह देवभूमि है जो माटी से जुड़कर जीना जानती और सिखाती है। दुनिया में सबसे पहले माटी की महत्ता भारत ने ही जानी और पहचानी है। हम सबके जाति और धर्म भले ही अलग-अलग हों, मिटटी तो एक ही है। मिटटी के बिना हमारा कोई अस्तित्व नहीं हो सकता। माटी से जुड़कर जीने की बात पूरे विश्व को केवल भारत ने ही सिखाई है। माँ नर्मदा केवल नदी या जलधारा नहीं, जीवन का ऐसा प्रवाह है जो हमें जीने की शक्ति, ऊर्जा और प्रकृति से जुड़े रहने की प्रेरणा देती है। माँ नर्मदा भगवती का ऐसा स्वरुप है, जहाँ कदम-कदम पर आज भी देवताओं का वास और निवास माना जाता है। यह जल नहीं, अमृत की धारा देने वाली संजीवनी है जिसकी महत्ता को शब्दों में व्यक्त करना संभव नहीं। यह ऐसा चलित तीर्थ है, जो प्रवचन नहीं, बल्कि अनुभूति का विषय है। देवी अहिल्या की यशगाथा ने मालवा को पूरे देश का समृद्ध और शक्तिशाली शहर बना दिया जिसमें माँ नर्मदा का सबसे बड़ा योगदान है। खजराना गणेश की प्रतिमा भी जल से निकली हुई प्रतिमा है जिसमें कहीं ना कहीं जल की ऐसी शक्ति है जो अनेक रोगों और समस्याओं को दूर करने में मददगार हो सकती है।

ये दिव्य विचार हैं देश के तपोनिष्ठ संत दादागुरु भगवान के, जो उन्होंने खजराना गणेश मन्दिर स्थित सत्संग सभागृह पर अ.भा. दादा गुरु परिवार इंदौर नर्मदा मिशन की मेजबानी में गत 5 मई से चल रहे नर्मदा चिंतन ज्ञान यज्ञ में सोमवार को माँ नर्मदा की महिमा और माँ से जुड़े प्रेरक संस्मरणों का उल्लेख करते हुए व्यक्त किए। दादागुरु पिछले 2034 दिनों से केवल माँ नर्मदा के जल पर आश्रित रहने वाले ऐसे संत हैं जो शहरी क्षेत्र में रात्रि विश्राम नहीं करने लेकिन जहाँ कहीं भगवती नर्मदा के चिंतन का प्रसंग होता है, वहां जरुर रुक जाते हैं। इंदौर प्रवास में उन्होंने रविवार की रात को खजराना गणेश मंदिर के भक्त निवास में रात्रि विश्राम किया और इस दौरान मंदिर से जुड़े विभिन्न प्रसंगों के बारे में भी जानकारी प्राप्त करने के बाद सोमवार को धर्मसभा में खजराना गणेश से जुड़े प्रसंग भी बताए। प्रारम्भ में नर्मदा परिक्रमावासी आचार्य पं. रविकांत शास्त्री, संयोजक समाजसेवी राजेंद्र बंसल, नित्यम बंसल, प्रेमा बंसल, इशिता जैन, अंकित जैन, गोपाल गोयल, केके गोयल, मनोज अग्रवाल, प्रणीत बंसल, शिव जिंदल, ज्योति बंसल, इधिका बंसल, कैलाश बंसल, नीरज अग्रवाल आदि ने उनकी अगवानी की। दादागुरु ने कथा समापन अवसर पर इस ज्ञान यज्ञ के पहले दिन निकली वृक्ष कलश यात्रा में शामिल मातृशक्ति को पौधे भेंटकर जल एवं पर्यावरण संरक्षण का सन्देश भी दिया। इसके पूर्व दादागुरु ने खजराना गणेश मंदिर में पहुंचकर भगवान गणेश एवं अन्य मंदिरों में भी दर्शन पूजन किए। उन्होंने दोपहर में शहर के अन्य नर्मदा मंदिर एवं दर्शनीय स्थलों की भी यात्रा की और कहा कि इंदौर तो मेरा घर है, मैं जहाँ कहीं भगवती नर्मदा का चिंतन होता है वहां शहरी क्षेत्र में भी पहुँच जाता हूँ अन्यथा बाहरी क्षेत्र में ही रात्रि विश्राम करता हूँ।

दादागुरु ने कहा कि जल की एक-एक बूँद अनमोल है। जल की सामर्थ्य देखना है तो मैं स्वयं साक्षी हूँ जिसने पिछले 6 वर्षों में केवल जलशक्ति पर ही अपने जीवन को सहजता से बनाए रखा है। अन्न और जल हमें शक्ति प्रदान करते हैं। अलग-अलग जगह के जल और अन्न का महत्व भी अलग-अलग होता है। हमारी माँ भगवती नर्मदा के जल का गुण ही ऐसा है कि वह जहाँ-जहाँ पहुँचता है समृद्धि और सुख-शांति प्रदान करता है क्योंकि इस जल को ब्रह्माण्ड के सभी देवी-देवताओं का सानिध्य मिला है। भगवान कृष्ण ने माँ यशोदा को मुंह खोलकर मिटटी में ब्रह्माण्ड के दर्शन कराए थे, वह लीला माँ नर्मदा और भारत की देवभूमि से ही जुडी है। नर्मदा जीवन को निर्भय होकर जीने का सन्देश देती है। यह माटी का ही सामर्थ्य है कि हम हर स्थिति में स्वस्थ, प्रसन्न और संतुष्ट बने हुए हैं। पत्थर की मूर्ति में हम परमात्मा के दर्शन करते हैं उसी तरह पेड़, पत्थर, नदी और पहाड़ों में भी परमात्मा की शक्ति निहित है। प्रकृति भी परमात्मा का प्रत्यक्ष प्रमाण है। अब तो वैज्ञानिक भी मानते हैं कि पौधे और प्रकृति भी बातें कर सकते हैं। नर्मदा प्राणशक्ति है। प्राणशक्ति ही हमें विचार, दृष्टि और मार्गदर्शन प्रदान करती है। याद रखें कि पेड़-पौधे और नदी-पर्वत केवल पृथ्वी पर ही मिलेंगे, स्वर्ग में नहीं। दादागुरु ने सभी भक्तों को संकल्प दिलाया कि वे जल की एक-एक बूँद का सदुपयोग कर माँ नर्मदा सहित देश की सभी नदियों को स्वच्छ, सुंदर और पर्यावरण हितैषी बनाकर उनके तटों पर पेड़, पौधों और प्रकृति की सेवा में हमेशा समर्पित रहेंगे। उन्होंने माँ नर्मदा से जुड़े अनेक भावपूर्ण और प्रेरक प्रसंग सुनाए। नर्मदाष्टक के पाठ और महाआरती के साथ इस दिव्य अनुष्ठान का समापन हुआ। इस मौके पर करीब 5 हजार भक्तों ने प्रसाद ग्रहण किया।

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