Narmada

नर्मदा परिक्रमा- जहां भिक्षा मांगना ही सीखाता है जीवन का मूल मंत्र

भिक्षावृत्ति जिसे रोकने के लिए सरकार प्रयास कर रही है। मध्यप्रदेश के एक शहर इंदौर में जहां भिक्षावृत्ति रोकने के लिए विशेष अभियान चलाए जा रहे है। भिक्षावृत्ति को जहां आधुनिक जमाने में अभिशाप माना जाता है। वहीं भिक्षावृत्ति आध्यात्मिक जगत में जीवन का अंहकार खत्म करने वाली मानी जाती है। भिक्षावृत्ति नर्मदा परिक्रमा के दौरान ऐसा ज्ञान देती है जिसे जानकर आप भी हैरान हो जाएंगे।

 एक साधना है भिक्षावृत्ति
नर्मदा परिक्रमा में भिक्षा मांगने का महत्व साधना, सादगी और आत्म-नियंत्रण को बढ़ावा देना माना गया है। परिक्रमा के दौरान आध्यात्मिक साधना का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है भिक्षावृत्ति जो साधक को भौतिक सुखों से दूर रहकर केवल माँ नर्मदा की शरण में रहने की शिक्षा देता है। भिक्षावृत्ति के माध्यम से, परिक्रमार्थी अहंकार को कम करते हैं और निर्भरता की भावना को सीखते हैं, जबकि केवल उतना ही स्वीकार करते हैं जो दिया जाता है।

आध्यात्मिक महत्व रखती है भिक्षा
भिक्षा मांगना अष्टांग योग का एक भाग है और एक कठिन तपस्या मानी जाती है। यह परिक्रमार्थी को अपनी इच्छाओं पर नियंत्रण रखना सिखाती है और भौतिकवादी सोच से दूर करती है। भिक्षा पर निर्वाह करना एक प्रकार की आत्म-शुद्धि है, जिससे व्यक्ति को आंतरिक शक्ति और संतुष्टि मिलती है।
सात्विक जीवन जीना सीखाती है भिक्षावृत्ति
भिक्षा मांगने के दौरान साधक सात्विक भोजन करता है। भूमि पर विश्राम करता है।  जो परिक्रमा को एक शुद्ध और सात्विक अनुभव देती है। जहां इच्छाएं खत्म हो जाती है। यदि कोई श्रद्धालु श्रद्धापूर्वक कुछ खाने को देता है तो उसे स्वीकार किया जाता है लेकिन भिक्षावृत्ति के माध्यम से यह सीख मिलती है कि परिक्रमा करने के दौरान हर परिस्थिति में मन को शांत और स्थिर रखना चाहिए। यह मन की साधना होती है जिसे सबसे कठिन तपस्या माना जाता है।

इंद्रियों और अहंकार पर नियंत्रण
भिक्षा मांगना इसमें इसलिए भी आवश्यक है क्योंकि यह एक साधक को इंद्रियों और अहंकार पर नियंत्रण रखना सिखाता है, सांसारिक मोह से दूर रहकर केवल नर्मदा माँ के भरोसे रहने का अभ्यास कराता है, और सादगी व स्वावलंबन को प्रोत्साहित करता है। जीवन को कम जरूरतो में जीने का अभ्यास कराता है।

भिक्षा मांगना क्यों हैं जरुरी
नर्मदा परिक्रमा के दौरान कई लोग ऐसे होते है जिन्हे अभिमान होता है स्वयं के धन का, किसी की कोई आवश्यकता ना होने का अहम होता है। लेकिन भिक्षा मांगना अहंकार को तोड़ता है। जब साधक दूसरों से भोजन मांगता है, तो यह उसके अहंकार को कम करता है और उसे विनम्र बनाता है। यह दर्शाता है कि व्यक्ति को सांसारिक वस्तुओं की आवश्यकता नहीं है और वह केवल अपनी मूल आवश्यकताओं के लिए ही दूसरों पर निर्भर है, जिससे वैराग्य की भावना बढ़ती है। नर्मदा परिक्रमा के दौरान भिक्षा स्वीकार करना “आकाश वृत्ति” का पालन करने जैसा है, यानी नर्मदा मां के भरोसे रहना चाहे भोजन मिले या ना मिले। अन्य आवश्यकताएँ पूर्ण हो या ना हो सभी परिस्थियों में स्थिर रहना सीखाता है।

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